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 मुख्यमंत्री धामी ने मियांवाला में ₹8.64 करोड़ की लागत से विकसित ‘जल सृष्टि पार्क’ का किया लोकार्पण

jal shrishti park miyanwala dehradun, picnic spot


 *पुराने तालाब को नया जीवन देकर विकसित किया गया जल सृष्टि पार्क, प्राकृतिक सौंदर्य और आधुनिक सुविधाओं का सुंदर संगम* 


 *रायपुर क्षेत्र को मिली ‘नैनीताल जैसी फीलिंग’, पार्क में पेडल बोटिंग और आइलैंड बना आकर्षण का केंद्र* 


 *स्वच्छ, स्वस्थ और हरित देहरादून के संकल्प को मिल रही नई गति : मुख्यमंत्री धामी* 


 *जल स्रोतों का संरक्षण केवल पर्यावरण बचाना नहीं, बल्कि अपनी विरासत और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करना है : सीएम* 


 *विकास का अर्थ केवल कंक्रीट के ढांचे नहीं, बल्कि जीवन को आसान बनाना, शहर को सुंदर और पर्यावरण को सुरक्षित रखना : सीएम धामी* 


 *रायपुर क्षेत्र में सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, पार्क, सीवर और बाढ़ सुरक्षा से जुड़े कार्यों को मिल रही गति* 



 *सरकार पार्क बना सकती है, लेकिन उसे स्वच्छ और सुंदर बनाए रखना समाज की भी साझा जिम्मेदारी : मुख्यमंत्री धामी* 





मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने शुक्रवार को मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) द्वारा मुख्यमंत्री की घोषणा के अंतर्गत मियांवाला, देहरादून में लगभग ₹8 करोड़ 64 लाख की लागत से विकसित ‘जल सृष्टि पार्क’ का लोकार्पण किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने क्षेत्रवासियों को नए पार्क की सौगात मिलने पर बधाई दी और इसे स्वच्छ, स्वस्थ एवं हरित देहरादून के संकल्प की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।


मुख्यमंत्री श्री धामी ने कहा कि रायपुर क्षेत्र के लोगों के बीच इस सुंदर पार्क का लोकार्पण उनके लिए प्रसन्नता का विषय है। उन्होंने कहा कि ‘जल सृष्टि पार्क’ आधुनिक सुविधाओं और प्राकृतिक सौंदर्य का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है। पार्क को इस प्रकार विकसित किया गया है कि यहां बच्चों से लेकर बुजुर्गों, महिलाओं और युवाओं तक सभी आयु वर्ग के लोगों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें।


 *पुराने तालाब का पुनर्जीवन कर विकसित किया गया आकर्षक पार्क* 


मुख्यमंत्री ने विशेष रूप से इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि पार्क के निर्माण के दौरान यहां पहले से मौजूद पुराने तालाब को समाप्त करने के बजाय उसका पुनर्जीवन किया गया है। उन्होंने कहा कि तालाब के संरक्षण और उसके आसपास सुविधाओं के विकास से इस स्थान को नई पहचान मिली है। तालाब के मध्य सुंदर आइलैंड विकसित किया गया है तथा लोगों के मनोरंजन के लिए पेडल बोटिंग की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है। उन्होंने कहा कि अब रायपुर क्षेत्र के लोगों को देहरादून में ही एक खूबसूरत प्राकृतिक स्थल के साथ ‘नैनीताल जैसी फीलिंग’ का अनुभव प्राप्त हो सकेगा।


 *जल और जंगल हमारी संस्कृति का हिस्सा, संरक्षण हमारी जिम्मेदारी* 


मुख्यमंत्री ने कहा कि भारतीय संस्कृति में जल और जंगल को केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं माना गया, बल्कि इन्हें जीवन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा समझा गया है। ऐसे में पुराने तालाबों और जल स्रोतों का पुनर्जीवन केवल पर्यावरण संरक्षण का कार्य नहीं है, बल्कि यह हमारी विरासत को बचाने और आने वाली पीढ़ियों के लिए जल एवं प्रकृति को सुरक्षित रखने का भी महत्वपूर्ण प्रयास है।


उन्होंने कहा कि राज्य सरकार विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ने के लिए प्रतिबद्ध है। विकास का अर्थ केवल बड़ी इमारतें और कंक्रीट के ढांचे तैयार करना नहीं है। वास्तविक विकास वही है, जिससे लोगों का जीवन सुगम हो, शहर सुंदर बने, पर्यावरण सुरक्षित रहे और आने वाली पीढ़ियों को बेहतर भविष्य मिल सके। उन्होंने जल सृष्टि पार्क को इसी सोच का एक सुंदर उदाहरण बताया।


 *रायपुर क्षेत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और पेयजल सुविधाओं को मिल रही गति* 


मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में केंद्र और राज्य सरकार के बेहतर समन्वय से उत्तराखंड में विकास की गति को लगातार तेज किया जा रहा है। सरकार का प्रयास है कि विकास का लाभ प्रदेश के प्रत्येक क्षेत्र और प्रत्येक वर्ग तक पहुंचे।


उन्होंने कहा कि इसी क्रम में रायपुर क्षेत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल, पार्क, सीवर और बाढ़ सुरक्षा से जुड़े अनेक कार्य आगे बढ़ाए गए हैं। युवाओं को बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए उच्च शिक्षण संस्थानों में सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है तथा क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाओं को भी मजबूत किया जा रहा है।


मुख्यमंत्री ने बताया कि क्षेत्र में सड़कों के डामरीकरण, नवीनीकरण और चौड़ीकरण के साथ सीवर व्यवस्था को बेहतर बनाने का कार्य भी जारी है। पेयजल की समस्या के समाधान के लिए नए ट्यूबवेल और ओवरहेड टैंक बनाए गए हैं। पुरानी पाइपलाइनों को बदलने तथा नई पेयजल लाइनें बिछाने का कार्य भी निरंतर आगे बढ़ाया जा रहा है।


 *हरित क्षेत्रों के विकास से बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों को मिल रही बेहतर सुविधाएं* 


मुख्यमंत्री ने कहा कि डिफेंस कॉलोनी, सिंयावाला, नेहरू कॉलोनी सहित विभिन्न क्षेत्रों में पार्कों के निर्माण एवं सौंदर्यीकरण के कार्य किए गए हैं। इसका उद्देश्य लोगों को अपने आसपास ही ऐसे सुंदर और हरित स्थान उपलब्ध कराना है, जहां वे स्वस्थ वातावरण में समय बिता सकें।


उन्होंने कहा कि आईटी पार्क से पॉलीटेक्निक होते हुए मंगलूवाला की ओर सड़क व्यवस्था को बेहतर बनाने के कार्य भी आगे बढ़ाए जा रहे हैं। इससे क्षेत्र की कनेक्टिविटी बेहतर होने के साथ यातायात व्यवस्था को भी सुगम बनाने में मदद मिलेगी।


 *सौंग डैम से मजबूत होगी देहरादून की पेयजल व्यवस्था* 


मुख्यमंत्री ने कहा कि देहरादून लगातार विस्तार ले रहा है और बढ़ती आबादी के साथ पानी की आवश्यकता भी बढ़ रही है। ऐसे में सौंग डैम जैसी महत्वपूर्ण परियोजना पर भी कार्य आगे बढ़ाया जा रहा है। इससे भविष्य में देहरादून की पेयजल व्यवस्था को और अधिक मजबूत करने में सहायता मिलेगी।


उन्होंने कहा कि बरसात के दौरान बाढ़ और जलभराव की समस्या से लोगों को राहत दिलाने के लिए रायपुर क्षेत्र में नदियों और बरसाती नालों पर बाढ़ सुरक्षा तथा चैनलाइजेशन के कार्य भी किए जा रहे हैं। सरकार का प्रयास है कि जहां सड़क की आवश्यकता हो वहां सड़क बने, जहां पेयजल की समस्या हो वहां पानी पहुंचे, जहां जलभराव हो वहां उसका स्थायी समाधान हो और जहां हरियाली की आवश्यकता हो वहां सुंदर पार्क विकसित किए जाएं।


 *विकास का उद्देश्य लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को बेहतर बनाना* 


मुख्यमंत्री ने कहा कि विकास किसी एक परियोजना का नाम नहीं है, बल्कि इसका वास्तविक उद्देश्य लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को बेहतर बनाना है। जल सृष्टि पार्क भी इसी व्यापक सोच का हिस्सा है, जहां पर्यावरण संरक्षण के साथ लोगों के लिए मनोरंजन, स्वास्थ्य और प्रकृति से जुड़ने की सुविधाएं विकसित की गई हैं।


उन्होंने इस कार्य के लिए एमडीडीए के अधिकारियों, इंजीनियरों और कर्मचारियों को बधाई देते हुए विश्वास व्यक्त किया कि आने वाले समय में यह पार्क केवल रायपुर क्षेत्र ही नहीं, बल्कि पूरे देहरादून के लोगों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनेगा।


 *पार्क को अपना समझकर स्वच्छ एवं सुंदर बनाए रखने की अपील* 


मुख्यमंत्री श्री धामी ने क्षेत्रवासियों से अपील की कि सरकार पार्क का निर्माण कर सकती है, उसे सुंदर बना सकती है और सुविधाएं उपलब्ध करा सकती है, लेकिन उसे लंबे समय तक स्वच्छ और सुंदर बनाए रखना सभी की साझा जिम्मेदारी है। उन्होंने लोगों से पार्क को केवल सरकारी संपत्ति न मानकर अपना पार्क समझने और अपने घर की तरह इसकी स्वच्छता एवं देखभाल करने का आग्रह किया।


उन्होंने विशेष रूप से बच्चों और युवाओं से पार्क का अधिक से अधिक उपयोग करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि बच्चे और युवा यहां खेलें, दौड़ें, योग करें और प्रकृति के बीच समय बिताएं, लेकिन इसके साथ पार्क और जलाशय की देखभाल की जिम्मेदारी भी समझें। सरकार और समाज के सामूहिक प्रयास से ही कोई विकास कार्य लंबे समय तक सुंदर और उपयोगी बना रह सकता है।


 *आधुनिक सुविधाओं के साथ देहरादून की हरियाली और प्राकृतिक पहचान को बनाए रखने पर जोर* 


मुख्यमंत्री ने कहा कि देहरादून अपनी प्राकृतिक सुंदरता और हरियाली के लिए देशभर में जाना जाता है। विकास की यात्रा में इस पहचान को बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है। सरकार का प्रयास है कि देहरादून में आधुनिक सुविधाओं का विस्तार हो, लेकिन इसके साथ ही शहर के प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यावरण का संरक्षण भी सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने कहा कि यही राज्य सरकार के विकास मॉडल की मूल भावना है।


मुख्यमंत्री ने रायपुर क्षेत्र के लोगों को विश्वास दिलाया कि उनके जीवन को अधिक सुविधाजनक, सुरक्षित और बेहतर बनाने के लिए सरकार इसी प्रकार निरंतर कार्य करती रहेगी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार देवभूमि उत्तराखंड को देश के अग्रणी राज्यों में शामिल करने तथा इसे देश का सर्वश्रेष्ठ राज्य बनाने के अपने ‘विकल्प रहित संकल्प’ को पूरा करने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रही है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस संकल्प को सिद्धि तक पहुंचाने में रायपुर क्षेत्र के लोग भी इसी प्रकार अपना सहयोग और योगदान प्रदान करते रहेंगे।



 *जल सृष्टि पार्क में हर आयु वर्ग के लिए सुविधाएं, प्राकृतिक सौंदर्य बना विशेष आकर्षण* 


   एमडीडीए द्वारा मियांवाला, देहरादून में   ₹8.64 करोड़ की लागत से विकसित यह जल सृष्टि पार्क   एक बहुआयामी हरित एवं मनोरंजन स्थल है, जिसमें पुराने तालाब का पुनर्जीवन करते हुए उसके आसपास आधुनिक सुविधाओं का विकास किया गया है। पार्क में सुबह-शाम भ्रमण एवं दौड़ने के लिए जॉगिंग ट्रैक, योग के लिए योगा डेक, बच्चों के लिए चिल्ड्रन पार्क, फूलों एवं वनस्पतियों की जानकारी देने वाला एजुकेशनल फ्लावर गार्डन, आकर्षक लैंडस्केपिंग, हरित क्षेत्र तथा बैठने की सुविधाएं विकसित की गई हैं। तालाब के मध्य सुंदर आइलैंड बनाया गया है और लोगों के मनोरंजन के लिए पेडल बोटिंग की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है। इस प्रकार एमडीडीए ने पुराने जल स्रोत के संरक्षण को आधुनिक शहरी सुविधाओं के साथ जोड़ते हुए एक ऐसे खूबसूरत पार्क का विकास किया है, जो पर्यावरण संरक्षण, जल स्रोतों के पुनर्जीवन, स्वास्थ्य, मनोरंजन और प्राकृतिक सौंदर्य—सभी को एक स्थान पर समाहित करता है। यह कार्य देहरादून में हरित एवं पर्यावरण अनुकूल शहरी विकास की दिशा में एमडीडीए के प्रयासों का एक उल्लेखनीय उदाहरण है।


कार्यक्रम में विधायक श्री उमेश शर्मा काऊ, मेयर श्री सौरभ थपलियाल, एमडीडीए उपाध्यक्ष श्री बंशीधर तिवारी सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी एवं बड़ी संख्या में स्थानीय लोग उपस्थित रहे।


मुख्यमंत्री धामी ने मियांवाला में ₹8.64 करोड़ की लागत से विकसित ‘जल सृष्टि पार्क’ का किया लोकार्पण* 



 *पुराने तालाब को नया जीवन देकर विकसित किया गया जल सृष्टि पार्क, प्राकृतिक सौंदर्य और आधुनिक सुविधाओं का सुंदर संगम* 


 *रायपुर क्षेत्र को मिली ‘नैनीताल जैसी फीलिंग’, पार्क में पेडल बोटिंग और आइलैंड बना आकर्षण का केंद्र* 


 *स्वच्छ, स्वस्थ और हरित देहरादून के संकल्प को मिल रही नई गति : मुख्यमंत्री धामी* 


 *जल स्रोतों का संरक्षण केवल पर्यावरण बचाना नहीं, बल्कि अपनी विरासत और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करना है : सीएम* 


 *विकास का अर्थ केवल कंक्रीट के ढांचे नहीं, बल्कि जीवन को आसान बनाना, शहर को सुंदर और पर्यावरण को सुरक्षित रखना : सीएम धामी* 


 *रायपुर क्षेत्र में सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, पार्क, सीवर और बाढ़ सुरक्षा से जुड़े कार्यों को मिल रही गति* 



 *सरकार पार्क बना सकती है, लेकिन उसे स्वच्छ और सुंदर बनाए रखना समाज की भी साझा जिम्मेदारी : मुख्यमंत्री धामी* 


मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने शुक्रवार को मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) द्वारा मुख्यमंत्री की घोषणा के अंतर्गत मियांवाला, देहरादून में लगभग ₹8 करोड़ 64 लाख की लागत से विकसित ‘जल सृष्टि पार्क’ का लोकार्पण किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने क्षेत्रवासियों को नए पार्क की सौगात मिलने पर बधाई दी और इसे स्वच्छ, स्वस्थ एवं हरित देहरादून के संकल्प की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।


मुख्यमंत्री श्री धामी ने कहा कि रायपुर क्षेत्र के लोगों के बीच इस सुंदर पार्क का लोकार्पण उनके लिए प्रसन्नता का विषय है। उन्होंने कहा कि ‘जल सृष्टि पार्क’ आधुनिक सुविधाओं और प्राकृतिक सौंदर्य का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है। पार्क को इस प्रकार विकसित किया गया है कि यहां बच्चों से लेकर बुजुर्गों, महिलाओं और युवाओं तक सभी आयु वर्ग के लोगों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें।


 *पुराने तालाब का पुनर्जीवन कर विकसित किया गया आकर्षक पार्क* 


मुख्यमंत्री ने विशेष रूप से इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि पार्क के निर्माण के दौरान यहां पहले से मौजूद पुराने तालाब को समाप्त करने के बजाय उसका पुनर्जीवन किया गया है। उन्होंने कहा कि तालाब के संरक्षण और उसके आसपास सुविधाओं के विकास से इस स्थान को नई पहचान मिली है। तालाब के मध्य सुंदर आइलैंड विकसित किया गया है तथा लोगों के मनोरंजन के लिए पेडल बोटिंग की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है। उन्होंने कहा कि अब रायपुर क्षेत्र के लोगों को देहरादून में ही एक खूबसूरत प्राकृतिक स्थल के साथ ‘नैनीताल जैसी फीलिंग’ का अनुभव प्राप्त हो सकेगा।


 *जल और जंगल हमारी संस्कृति का हिस्सा, संरक्षण हमारी जिम्मेदारी* 


मुख्यमंत्री ने कहा कि भारतीय संस्कृति में जल और जंगल को केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं माना गया, बल्कि इन्हें जीवन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा समझा गया है। ऐसे में पुराने तालाबों और जल स्रोतों का पुनर्जीवन केवल पर्यावरण संरक्षण का कार्य नहीं है, बल्कि यह हमारी विरासत को बचाने और आने वाली पीढ़ियों के लिए जल एवं प्रकृति को सुरक्षित रखने का भी महत्वपूर्ण प्रयास है।

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ने के लिए प्रतिबद्ध है। विकास का अर्थ केवल बड़ी इमारतें और कंक्रीट के ढांचे तैयार करना नहीं है। वास्तविक विकास वही है, जिससे लोगों का जीवन सुगम हो, शहर सुंदर बने, पर्यावरण सुरक्षित रहे और आने वाली पीढ़ियों को बेहतर भविष्य मिल सके। उन्होंने जल सृष्टि पार्क को इसी सोच का एक सुंदर उदाहरण बताया।

 *रायपुर क्षेत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और पेयजल सुविधाओं को मिल रही गति* 

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में केंद्र और राज्य सरकार के बेहतर समन्वय से उत्तराखंड में विकास की गति को लगातार तेज किया जा रहा है। सरकार का प्रयास है कि विकास का लाभ प्रदेश के प्रत्येक क्षेत्र और प्रत्येक वर्ग तक पहुंचे।


उन्होंने कहा कि इसी क्रम में रायपुर क्षेत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल, पार्क, सीवर और बाढ़ सुरक्षा से जुड़े अनेक कार्य आगे बढ़ाए गए हैं। युवाओं को बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए उच्च शिक्षण संस्थानों में सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है तथा क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाओं को भी मजबूत किया जा रहा है।


मुख्यमंत्री ने बताया कि क्षेत्र में सड़कों के डामरीकरण, नवीनीकरण और चौड़ीकरण के साथ सीवर व्यवस्था को बेहतर बनाने का कार्य भी जारी है। पेयजल की समस्या के समाधान के लिए नए ट्यूबवेल और ओवरहेड टैंक बनाए गए हैं। पुरानी पाइपलाइनों को बदलने तथा नई पेयजल लाइनें बिछाने का कार्य भी निरंतर आगे बढ़ाया जा रहा है।


 *हरित क्षेत्रों के विकास से बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों को मिल रही बेहतर सुविधाएं* 


मुख्यमंत्री ने कहा कि डिफेंस कॉलोनी, सिंयावाला, नेहरू कॉलोनी सहित विभिन्न क्षेत्रों में पार्कों के निर्माण एवं सौंदर्यीकरण के कार्य किए गए हैं। इसका उद्देश्य लोगों को अपने आसपास ही ऐसे सुंदर और हरित स्थान उपलब्ध कराना है, जहां वे स्वस्थ वातावरण में समय बिता सकें।


उन्होंने कहा कि आईटी पार्क से पॉलीटेक्निक होते हुए मंगलूवाला की ओर सड़क व्यवस्था को बेहतर बनाने के कार्य भी आगे बढ़ाए जा रहे हैं। इससे क्षेत्र की कनेक्टिविटी बेहतर होने के साथ यातायात व्यवस्था को भी सुगम बनाने में मदद मिलेगी।


 *सौंग डैम से मजबूत होगी देहरादून की पेयजल व्यवस्था* 


मुख्यमंत्री ने कहा कि देहरादून लगातार विस्तार ले रहा है और बढ़ती आबादी के साथ पानी की आवश्यकता भी बढ़ रही है। ऐसे में सौंग डैम जैसी महत्वपूर्ण परियोजना पर भी कार्य आगे बढ़ाया जा रहा है। इससे भविष्य में देहरादून की पेयजल व्यवस्था को और अधिक मजबूत करने में सहायता मिलेगी।


उन्होंने कहा कि बरसात के दौरान बाढ़ और जलभराव की समस्या से लोगों को राहत दिलाने के लिए रायपुर क्षेत्र में नदियों और बरसाती नालों पर बाढ़ सुरक्षा तथा चैनलाइजेशन के कार्य भी किए जा रहे हैं। सरकार का प्रयास है कि जहां सड़क की आवश्यकता हो वहां सड़क बने, जहां पेयजल की समस्या हो वहां पानी पहुंचे, जहां जलभराव हो वहां उसका स्थायी समाधान हो और जहां हरियाली की आवश्यकता हो वहां सुंदर पार्क विकसित किए जाएं।


 *विकास का उद्देश्य लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को बेहतर बनाना* 


मुख्यमंत्री ने कहा कि विकास किसी एक परियोजना का नाम नहीं है, बल्कि इसका वास्तविक उद्देश्य लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को बेहतर बनाना है। जल सृष्टि पार्क भी इसी व्यापक सोच का हिस्सा है, जहां पर्यावरण संरक्षण के साथ लोगों के लिए मनोरंजन, स्वास्थ्य और प्रकृति से जुड़ने की सुविधाएं विकसित की गई हैं।


उन्होंने इस कार्य के लिए एमडीडीए के अधिकारियों, इंजीनियरों और कर्मचारियों को बधाई देते हुए विश्वास व्यक्त किया कि आने वाले समय में यह पार्क केवल रायपुर क्षेत्र ही नहीं, बल्कि पूरे देहरादून के लोगों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनेगा।


 *पार्क को अपना समझकर स्वच्छ एवं सुंदर बनाए रखने की अपील* 


मुख्यमंत्री श्री धामी ने क्षेत्रवासियों से अपील की कि सरकार पार्क का निर्माण कर सकती है, उसे सुंदर बना सकती है और सुविधाएं उपलब्ध करा सकती है, लेकिन उसे लंबे समय तक स्वच्छ और सुंदर बनाए रखना सभी की साझा जिम्मेदारी है। उन्होंने लोगों से पार्क को केवल सरकारी संपत्ति न मानकर अपना पार्क समझने और अपने घर की तरह इसकी स्वच्छता एवं देखभाल करने का आग्रह किया।


उन्होंने विशेष रूप से बच्चों और युवाओं से पार्क का अधिक से अधिक उपयोग करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि बच्चे और युवा यहां खेलें, दौड़ें, योग करें और प्रकृति के बीच समय बिताएं, लेकिन इसके साथ पार्क और जलाशय की देखभाल की जिम्मेदारी भी समझें। सरकार और समाज के सामूहिक प्रयास से ही कोई विकास कार्य लंबे समय तक सुंदर और उपयोगी बना रह सकता है।


 *आधुनिक सुविधाओं के साथ देहरादून की हरियाली और प्राकृतिक पहचान को बनाए रखने पर जोर* 


मुख्यमंत्री ने कहा कि देहरादून अपनी प्राकृतिक सुंदरता और हरियाली के लिए देशभर में जाना जाता है। विकास की यात्रा में इस पहचान को बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है। सरकार का प्रयास है कि देहरादून में आधुनिक सुविधाओं का विस्तार हो, लेकिन इसके साथ ही शहर के प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यावरण का संरक्षण भी सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने कहा कि यही राज्य सरकार के विकास मॉडल की मूल भावना है।


मुख्यमंत्री ने रायपुर क्षेत्र के लोगों को विश्वास दिलाया कि उनके जीवन को अधिक सुविधाजनक, सुरक्षित और बेहतर बनाने के लिए सरकार इसी प्रकार निरंतर कार्य करती रहेगी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार देवभूमि उत्तराखंड को देश के अग्रणी राज्यों में शामिल करने तथा इसे देश का सर्वश्रेष्ठ राज्य बनाने के अपने ‘विकल्प रहित संकल्प’ को पूरा करने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रही है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस संकल्प को सिद्धि तक पहुंचाने में रायपुर क्षेत्र के लोग भी इसी प्रकार अपना सहयोग और योगदान प्रदान करते रहेंगे।



 *जल सृष्टि पार्क में हर आयु वर्ग के लिए सुविधाएं, प्राकृतिक सौंदर्य बना विशेष आकर्षण* 

   एमडीडीए द्वारा मियांवाला, देहरादून में   ₹8.64 करोड़ की लागत से विकसित यह जल सृष्टि पार्क   एक बहुआयामी हरित एवं मनोरंजन स्थल है, जिसमें पुराने तालाब का पुनर्जीवन करते हुए उसके आसपास आधुनिक सुविधाओं का विकास किया गया है। पार्क में सुबह-शाम भ्रमण एवं दौड़ने के लिए जॉगिंग ट्रैक, योग के लिए योगा डेक, बच्चों के लिए चिल्ड्रन पार्क, फूलों एवं वनस्पतियों की जानकारी देने वाला एजुकेशनल फ्लावर गार्डन, आकर्षक लैंडस्केपिंग, हरित क्षेत्र तथा बैठने की सुविधाएं विकसित की गई हैं। तालाब के मध्य सुंदर आइलैंड बनाया गया है और लोगों के मनोरंजन के लिए पेडल बोटिंग की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है। इस प्रकार एमडीडीए ने पुराने जल स्रोत के संरक्षण को आधुनिक शहरी सुविधाओं के साथ जोड़ते हुए एक ऐसे खूबसूरत पार्क का विकास किया है, जो पर्यावरण संरक्षण, जल स्रोतों के पुनर्जीवन, स्वास्थ्य, मनोरंजन और प्राकृतिक सौंदर्य—सभी को एक स्थान पर समाहित करता है। यह कार्य देहरादून में हरित एवं पर्यावरण अनुकूल शहरी विकास की दिशा में एमडीडीए के प्रयासों का एक उल्लेखनीय उदाहरण है।


कार्यक्रम में विधायक श्री उमेश शर्मा काऊ, मेयर श्री सौरभ थपलियाल, एमडीडीए उपाध्यक्ष श्री बंशीधर तिवारी सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी एवं बड़ी संख्या में स्थानीय लोग उपस्थित रहे।

जल सृष्टि पार्क के लोकार्पण से लौटते समय सीएम धामी ने अचानक रुकवाया काफिला, बच्चों और आमजन के साथ खिंचवाईं सेल्फी* 


 *मुख्यमंत्री को देखने उमड़े लोग, सीएम धामी ने प्रोटोकॉल से इतर आमजन के बीच पहुंचकर साझा की आत्मीयता* 

 *बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक ने मांगी सेल्फी, मुख्यमंत्री धामी ने रुककर हर किसी की इच्छा की पूरी* 


 मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी शुक्रवार को मियांवाला, देहरादून में जल सृष्टि पार्क के लोकार्पण कार्यक्रम से लौट रहे थे। इस दौरान मार्ग में जगह-जगह बड़ी संख्या में स्थानीय लोग और बच्चे मुख्यमंत्री की एक झलक पाने के लिए उत्साहित नजर आए। लोगों का उत्साह और आत्मीयता देखकर मुख्यमंत्री श्री धामी ने अचानक अपना काफिला रुकवाया और स्वयं आमजन के बीच पहुंच गए।



मुख्यमंत्री को अपने बीच पाकर बच्चे और स्थानीय लोग बेहद उत्साहित नजर आए। कई लोगों ने मुख्यमंत्री से उनके साथ फोटो और सेल्फी लेने का आग्रह किया। मुख्यमंत्री श्री धामी ने भी सहजता के साथ उनके आग्रह को स्वीकार करते हुए बच्चों, युवाओं, महिलाओं और अन्य लोगों के साथ तस्वीरें खिंचवाईं और सेल्फी लीं।



इस दौरान मुख्यमंत्री ने बच्चों से बातचीत कर उनका हालचाल भी जाना। लोगों ने मुख्यमंत्री से बातचीत करते हुए अपनी भावनाएं साझा कीं। मुख्यमंत्री ने भी पूरी आत्मीयता के साथ आमजन से संवाद किया और उनकी बातों को सुना।



मुख्यमंत्री की इस सहजता और आत्मीय व्यवहार से मौके पर मौजूद लोगों में खासा उत्साह देखने को मिला। काफिला रुकने और मुख्यमंत्री के स्वयं लोगों के बीच पहुंचने का यह दृश्य लोगों के लिए यादगार बन गया। बच्चों के चेहरे पर खुशी और स्थानीय लोगों के उत्साह ने माहौल को और भी आत्मीय बना दिया।


मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि " *जनता से मिलना और उनके बीच रहना उनके लिए हमेशा सुखद अनुभव रहा है। प्रदेश की जनता का स्नेह और आशीर्वाद ही उन्हें निरंतर जनसेवा के लिए प्रेरित करता है।"*


दिनांक: 18 सितंबर 2026


जनपद पौड़ी गढ़वाल के थाना थलीसैंण क्षेत्रान्तर्गत बैजरों में लापता चल रहे व्यक्ति की तलाश हेतु SDRF की डीप डाइविंग टीम द्वारा लगातार सर्च अभियान चलाया जा रहा है।


इसी क्रम में आज दिनांक 18/09/26 को SDRF टीम द्वारा उक्त डूबे हुए व्यक्ति की तलाश में बैजरों से चौकी बीरोंखाल तक नदी क्षेत्र में संभावित स्थानों पर गहन सर्चिंग की गई। टीम के कुशल गोताखोरों द्वारा विभिन्न स्थानों पर डाइविंग करने के साथ-साथ रेस्क्यू कांटे एवं डग्गी के माध्यम से भी तलाशी अभियान चलाया गया।


टीम द्वारा नदी क्षेत्र में काफी दूरी तक गहन सर्चिंग किए जाने के बावजूद अभी तक लापता व्यक्ति का कोई सुराग नहीं मिल पाया है। सर्चिंग रिपोर्ट शून्य रही।

 दिनांक - 18/09/2026


स्थान - श्री भरत मंदिर इंटर कॉलेज गंगा नगर ऋषिकेश देहरादून।

जिलाधिकारी  के निर्देशों के क्रम में  

 दिनांक 18/09/2026 को जनपद देहरादून ऋषिकेश में जिला प्रोबेशन अधिकारी द्वारा ऋषिकेश चाइल्ड हेल्पलाइन टीम सदस्य व डी.सी.पी. यूं टीम सदस्य द्वारा श्री भरत मंदिर इंटर कॉलेज ऋषिकेश देहरादून में महिला और बच्चों के विषय में 1098 चाइल्ड हेल्पलाइन जागरूकता कैंप का आयोजन किया गया जिसमें डी.सी.पी.यू. सदस्य व चाइल्ड हेल्पलाइन द्वारा स्कूल में उपस्थित सभी बच्चों और अध्यापको  को 1098 की विस्तृत जानकारी दी और बताया गया कि यह एक आपातकालीन निशुल्क फोन सेवा है जो मुसीबत में फंसे बच्चों की मदद करती है। 




यह रात और दिन 24 × 7 काम करती है चाइल्ड हेल्पलाइन टीम द्वारा अनाथ, गरीब और बेसहारा बच्चों, खोये पाये बच्चों को भिक्षावृत्ति और बाल श्रम वाले बच्चों, बाल विवाह रोक तथा बच्चों को शिक्षित करने आदि के विषय में जानकारी दी गई। साथ ही बच्चों को गुड टच और बेड टच और पोकसो व साइबर क्राइम की जानकारी दी और सभी बच्चों व अध्यापकों को बाल कल्याण समिति के  विषय में बताया गया टीम द्वारा महिलाओ और बच्चों की संस्थाओ के विषय में भी अवगत कराया गया और बताया कि महिला से संबंधित कोई भी समस्या है आप 181 पर कॉल करें और बच्चों से संबंधित कोई भी समस्या होती है तो आप 1098 या 112 पर कॉल कर सकते हैं या फिर नजदीकी चाइल्ड हेल्पलाइन कार्यालय आ सकते हैं। इस कैंप में सुपरवाइजर  मीना  खरोला व रंजना उनियाल और केस वर्कर अनिल बिष्ट DCPU सदस्य सम्पूर्णा भट्ट व कविता पांडे, रेलवे चाइल्ड हेल्पलाइन टीम सदस्य सविता गोगिया भिक्षावृत्ति टीम कार्डिनेटर राहुल सती ,मिनाक्षी नाथ थे ,जिसमें कुल उपस्थित बच्चों की संख्या 900 और अध्यापक  की संख्या 18  है इस  के बाद कैंप का समापन किया गया। कैंप का बाद  टीम द्वारा तीन बच्चों को कुडा भिनते हुए तपोवन से रेस्क्यू किया गया।  ये बच्चे  नटराज चौक के रहने वाले हैं उसके बाद तपोवन चौकी में बच्चों की  जी डी कराई गई। और मेडिकल कराने हेतु लेकर जा रहे ।


देहरादून:





भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI), देहरादून एयरपोर्ट में हिंदी पखवाड़ा–2026 के अंतर्गत आज हिंदी भाषा के प्रति जागरूकता, रुचि एवं कार्यालयीन कार्यों में हिंदी के प्रयोग को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से हिंदी प्रश्न मंच का आयोजन किया गया।


यह कार्यक्रम एयरपोर्ट निदेशक श्री बी.एच. नेगी के कुशल मार्गदर्शन एवं अध्यक्षता में आयोजित किया गया। हिंदी प्रश्न मंच का आयोजन श्री शुभम वत्स द्वारा किया गया, जबकि कार्यक्रम का संचालन श्री अजित कुमार, राजभाषा अधिकारी द्वारा किया गया।


हिंदी प्रश्न मंच में AAI के अधिकारियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रतियोगिता में श्री नितिन वर्मा, प्रबंधक (वित्त) ने प्रथम स्थान, श्री नितिन कादियान, संयुक्त महाप्रबंधक ने द्वितीय स्थान, श्री शैलेंद्र जंगपांगी, प्रबंधक (मानव संसाधन) ने तृतीय स्थान तथा श्री सक्षम सिंघल, कनिष्ठ अभियंता (वित्त) ने चतुर्थ स्थान प्राप्त किया।


प्रश्न मंच में हिंदी भाषा, साहित्य, व्याकरण, सामान्य ज्ञान तथा राजभाषा से संबंधित विभिन्न प्रश्न पूछे गए। प्रतिभागियों ने पूरे उत्साह एवं सक्रियता के साथ प्रश्नों का उत्तर देते हुए कार्यक्रम को रोचक एवं ज्ञानवर्धक बनाया।


इस अवसर पर एयरपोर्ट निदेशक श्री बी.एच. नेगी ने हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग पर जोर देते हुए कहा कि हिंदी हमारी राजभाषा होने के साथ-साथ देश की विविध भाषाई एवं सांस्कृतिक विरासत को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी है। कार्यालयीन कार्यों में हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग से प्रशासनिक कार्यों को सरल, प्रभावी एवं जनसुलभ बनाने में सहायता मिलती है।


हिंदी पखवाड़े के दौरान देहरादून एयरपोर्ट पर हिंदी के प्रचार-प्रसार तथा कार्यालयीन कार्यों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न प्रतियोगिताओं एवं गतिविधियों का आयोजन किया जा रहा है।


कार्यक्रम का समापन प्रतिभागियों के उत्साहवर्धन तथा कार्यालयीन कार्यों में हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग के संकल्प के साथ हुआ।

हरिद्वार;





शिव शक्ति वेलनेस फाउंडेशन द्वारा माननीय वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों आदरणीय डॉ. ललित नारायण मिश्र , मुख्य विकास अधिकारी, हरिद्वार एवं श्री जितेंद्र कुमार , अपर जिलाधिकारी, हरिद्वार के सफल मार्गदर्शन में हरिद्वार दीपोत्सव प्रज्वलन स्थल के सुसज्जित कार्य में सहभागिता की गई। 


कार्यक्रम में फाउंडेशन के पदाधिकारियों एवं सदस्यों ने निष्ठा एवं सेवाभाव के साथ अपनी सहभागिता सुनिश्चित की।


कार्यक्रम का संचालन फाउंडेशन की अध्यक्षा श्रीमती शिप्रा गुप्ता जी, उपाध्यक्ष श्री भूपेश चंद्र पांडेय  एवं सचिवा श्रीमती पूनम पांडेय जी के नेतृत्व में किया गया। इस अवसर पर उपस्थित सभी वरिष्ठ पदाधिकारियों एवं सदस्यों ने दीप प्रज्वलन कार्यक्रम में उत्साहपूर्वक सहभागिता करते हुए सामाजिक सेवा एवं जनकल्याण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की।


इस अवसर पर सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रवक्ता आदरणीय श्रीमती रेणुका श्रीवास्तव  ने कहा कि दीप प्रज्वलन एक सुंदर एवं सकारात्मक संदेश है। यह व्यक्ति के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हुए उसे जीवन में निरंतर उन्नति एवं श्रेष्ठ कार्यों के लिए प्रेरित करता है।


वहीं श्री विनय श्रीवास्तव , वरिष्ठ प्रबंधक, पंजाब नेशनल बैंक, रानीपुर बीएचईएल, हरिद्वार ने कहा कि दीप प्रज्वलन अपने आप में एक सांकेतिक संदेश है, लेकिन वास्तविक स्वावलंबन के लिए प्रत्येक व्यक्ति को निष्ठा, परिश्रम एवं निरंतर सार्थक प्रयासों के साथ आगे बढ़ना चाहिए।


फाउंडेशन की सचिवा श्रीमती पूनम पांडेय जी एवं उपाध्यक्ष श्री भूपेश चंद्र पांडेय जी ने दीपोत्सव कार्यक्रम को सराहनीय एवं प्रेरणादायी पहल बताते हुए कहा कि ऐसे आयोजन समाज में सकारात्मक सोच, सेवा भावना एवं सामाजिक दायित्व की भावना को मजबूत करते हैं।


कार्यक्रम के दौरान सचिन गांधी जी, मनीषा गुप्ता जी एवं मनीषा वर्मा जी सहित उपस्थित सदस्यों ने समाज के उत्थान एवं कल्याण के लिए निरंतर निष्ठावान प्रयास करने का संकल्प लिया।


माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के जन्मदिवस के अवसर पर आयोजित इस दीप प्रज्वलन कार्यक्रम के माध्यम से सेवा, सकारात्मक ऊर्जा, स्वावलंबन एवं सामाजिक उत्तरदायित्व का संदेश दिया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य समाज में सकारात्मक सोच का प्रसार करते हुए लोगों को सेवा एवं जनकल्याण के कार्यों के लिए प्रेरित करना रहा।


शिव शक्ति वेलनेस फाउंडेशन ने कार्यक्रम को सफल बनाने में सहयोग एवं मार्गदर्शन प्रदान करने वाले सभी प्रशासनिक अधिकारियों, पदाधिकारियों, सदस्यों एवं सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया।


— शिव शक्ति वेलनेस फाउंडेशन, हरिद्वार

 लैंगिक न्याय को आधी सदी तक नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता


50 years of ICDS


हम आज भी किसी भी नीति को न्यायालय में चुनौती नहीं दे सकते। क्या इसका अर्थ यह है कि यह लैंगिक अन्याय अगली सदी तक भी जारी रहेगा?

भारत को आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 की आवश्यकता क्यों है?

इसके पीछे सभी वैध और संवैधानिक कारण तथा तर्क मौजूद हैं। कानून के समक्ष समानता और लैंगिक आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव न होना हमारे संविधान द्वारा हमें दिया गया वचन है।

समावेशी लोकतांत्रिक भावना को प्रत्येक कल्याणकारी सरकार द्वारा महत्व दिया जाना और कायम रखा जाना चाहिए।

निरंतर सकारात्मक सुधार तथा लैंगिक दृष्टि से विशिष्ट और सशक्त कानूनों का निर्माण हमारे राष्ट्र को और मजबूत बनाएगा।


भारत के भविष्य की नींव रखने वाली महिलाओं को सम्मान देना कोई दान या कृपा नहीं है—यह संवैधानिक न्याय है।


लगभग पाँच दशकों से भारत की आंगनवाड़ी व्यवस्था कुपोषण, विकासात्मक असमानता, मातृ स्वास्थ्य की समस्याओं और शैक्षिक वंचना के विरुद्ध देश की लड़ाई में अग्रिम पंक्ति में खड़ी रही है। एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) की शुरुआत 1975 में एक महत्वाकांक्षी उद्देश्य के साथ की गई थी—हर बच्चे को जीवन की एक समान और बेहतर शुरुआत देना तथा मानव विकास के सबसे महत्वपूर्ण चरणों में माताओं और परिवारों को सहायता प्रदान करना।


पचास वर्ष बाद आंगनवाड़ी कार्यकर्ता भारतीय कल्याणकारी राज्य के सबसे अधिक दिखाई देने वाले चेहरों में से एक बन चुकी हैं।


फिर भी इस व्यवस्था के केंद्र में एक गंभीर विरोधाभास मौजूद है।


भारत आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं से महत्वपूर्ण सार्वजनिक जिम्मेदारियाँ निभाने की अपेक्षा करता है, लेकिन आज तक उन्हें उनके अधिकारों, दर्जे, गरिमा और सामाजिक सुरक्षा को मान्यता देने वाला कोई व्यापक वैधानिक ढाँचा नहीं दिया गया है।


इस विरोधाभास को तत्काल दूर किया जाना आवश्यक है।


अब भारत को आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 की आवश्यकता है।


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भारत की दिखाई देने वाली कल्याण व्यवस्था के पीछे अदृश्य कार्यबल


आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएँ केवल पूरक पोषण वितरित करने या रजिस्टर बनाए रखने का कार्य नहीं करतीं। दशकों के दौरान उनकी जिम्मेदारियों में अत्यंत व्यापक विस्तार हुआ है।


वे निम्नलिखित कार्यों में योगदान देती हैं:


- प्रारंभिक बाल देखभाल और शिक्षा;

- पोषण एवं बच्चों की वृद्धि की निगरानी;

- मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य;

- टीकाकरण तथा स्वास्थ्य संबंधी जन-जागरूकता;

- पूर्व-प्राथमिक शिक्षा;

- सामुदायिक जागरूकता;

- संवेदनशील एवं असुरक्षित बच्चों की पहचान;

- गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली महिलाओं को सहायता;

- सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन;

- आँकड़ों का संग्रह एवं रिपोर्टिंग;

- आपदा एवं आपातकालीन परिस्थितियों में सामुदायिक सेवाएँ; तथा

- बच्चों के शारीरिक, संज्ञानात्मक, भावनात्मक और सामाजिक विकास की मजबूत नींव तैयार करना।


व्यवहार में, किसी कमजोर या वंचित परिवार के बच्चे या माँ के लिए आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अक्सर राज्य और नागरिक के बीच पहला संस्थागत संपर्क-बिंदु होती हैं।


राज्य अपनी नीतियों को जमीनी स्तर तक पहुँचाने और लागू करने के लिए इन महिलाओं पर निर्भर करता है। लेकिन राज्य और इन कार्यकर्ताओं के बीच कानूनी संबंध आज भी अत्यंत अपर्याप्त है।


यह केवल रोजगार नीति का मुद्दा नहीं है।


यह लैंगिक न्याय, सामाजिक न्याय और संवैधानिक शासन का प्रश्न है।


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पचास वर्षों की सेवा का अर्थ पचास वर्षों की असुरक्षा नहीं होना चाहिए


ICDS की प्रयोगात्मक यात्रा अब आधी सदी पार कर चुकी है। इस अवधि में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की कई पीढ़ियाँ इस व्यवस्था में आईं, अपने समुदायों की सेवा की और सेवानिवृत्त हुईं या व्यवस्था से बाहर चली गईं—लेकिन उन्हें उस प्रकार की वैधानिक मान्यता नहीं मिली, जो सामान्यतः दीर्घकालीन सार्वजनिक सेवा से जुड़ी होती है।


जिस कार्यकर्ता से राज्य के प्रति जवाबदेह रहने की अपेक्षा की जाती है, वह राज्य की कानूनी संरचना में अदृश्य नहीं रहनी चाहिए।


मूल प्रश्न बहुत सरल है:


“यदि राज्य किसी महिला को महत्वपूर्ण सार्वजनिक जिम्मेदारियाँ सौंपता है, तो फिर वही राज्य उसे उस गरिमा, सुरक्षा और कानूनी मान्यता से क्यों वंचित करे, जो सार्वजनिक कार्य से जुड़ी होती है?”


ऐसी कार्यकर्ताओं को “मानदेय आधारित”, “स्वैच्छिक” या “अंशकालिक” कहना मात्र इस प्रश्न का उत्तर नहीं हो सकता, जबकि उनके वास्तविक कार्य व्यापक, निरंतर और सरकारी कार्यक्रमों के लिए अनिवार्य हैं।


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लैंगिक प्रश्न को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता


आंगनवाड़ी कार्यबल में महिलाओं की संख्या अत्यधिक है। इसलिए पर्याप्त वैधानिक मान्यता का लगातार अभाव एक स्पष्ट लैंगिक आयाम रखता है।


जब आवश्यक सार्वजनिक जिम्मेदारियाँ व्यवस्थित रूप से महिलाओं को सौंपी जाती हैं, लेकिन उनके कार्य को औपचारिक रोजगार से कमतर माना जाता है, तो समाज एक पुरानी व्यवस्था को दोहराने का जोखिम उठाता है:


जब समाज को महिलाओं के श्रम की आवश्यकता होती है, तब उनके काम को आवश्यक माना जाता है; लेकिन जब महिलाएँ उसी काम के अधिकार माँगती हैं, तब उसके मूल्य को कम आँका जाता है।


यही कारण है कि आंगनवाड़ी सुधार को केवल वेतन या प्रशासनिक व्यय के दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए।


इसे लैंगिक-संवेदनशील शासन के दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए।


एक आधुनिक कल्याणकारी राज्य एक ओर महिला सशक्तीकरण की बात नहीं कर सकता और दूसरी ओर लाखों महिलाओं से अनिवार्य सार्वजनिक कार्य करवाते हुए उनके दर्जे, पारिश्रमिक, सामाजिक सुरक्षा, कार्यस्थल की गरिमा और शिकायत निवारण के लिए व्यापक वैधानिक ढाँचा उपलब्ध कराने से पीछे नहीं हट सकता।


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“मानदेय” से अधिकार-आधारित सार्वजनिक सेवा की ओर


प्रस्तावित कानून के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों में से एक यह है कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को परिभाषित करने के लिए किस प्रकार की भाषा का इस्तेमाल किया जाता है।


मानदेय-आधारित मॉडल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि हो सकती है, लेकिन भारत की कल्याणकारी जिम्मेदारियाँ पिछले दशकों में नाटकीय रूप से बदल चुकी हैं।


आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं से राज्य की अपेक्षाएँ बढ़ी हैं। उनकी जिम्मेदारियाँ बढ़ी हैं। रिपोर्टिंग की आवश्यकताएँ बढ़ी हैं। डिजिटल जिम्मेदारियाँ बढ़ी हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा प्रारंभिक बाल विकास से संबंधित जिम्मेदारियाँ बढ़ी हैं।


इसलिए कानूनी ढाँचे को भी उसी के अनुरूप विकसित होना चाहिए।


आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 को स्पष्ट वैधानिक दर्जा स्थापित करना चाहिए और न्यूनतम सेवा शर्तों की गारंटी देनी चाहिए, ताकि यह कार्यबल मुख्यतः कार्यपालिका की योजनाओं, सरकारी आदेशों या समय-समय पर लिए जाने वाले नीतिगत निर्णयों पर निर्भर न रहे।


उद्देश्य केवल मानदेय बढ़ाना नहीं होना चाहिए।


उद्देश्य अधिकार-आधारित मान्यता स्थापित करना होना चाहिए।


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अलग आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम क्यों आवश्यक है?


एक व्यापक केंद्रीय कानून एक समान कानूनी आधार प्रदान कर सकता है, साथ ही संघीय ढाँचे का सम्मान करते हुए राज्यों को राष्ट्रीय न्यूनतम स्तर से अधिक लाभ देने की स्वतंत्रता भी दे सकता है।


ऐसा कानून निम्नलिखित प्रावधान स्थापित कर सकता है:


1. वैधानिक मान्यता


प्रत्येक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका को सार्वजनिक कल्याण वितरण प्रणाली के भीतर कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त दर्जा दिया जाना चाहिए।


2. उचित और पारदर्शी पारिश्रमिक


पारिश्रमिक वास्तविक रूप से निभाई जाने वाली जिम्मेदारियों के अनुरूप होना चाहिए और एक पारदर्शी वैधानिक व्यवस्था के माध्यम से समय-समय पर संशोधित किया जाना चाहिए।


3. सामाजिक सुरक्षा


कानून के अंतर्गत निम्नलिखित के लिए लागू करने योग्य व्यवस्था होनी चाहिए:


- पेंशन अथवा सेवानिवृत्ति लाभ;

- भविष्य निधि या इसके समकक्ष सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था;

- स्वास्थ्य बीमा;

- मातृत्व लाभ;

- दिव्यांगता से सुरक्षा;

- दुर्घटना मुआवजा;

- जीवन बीमा; तथा

- अन्य उपयुक्त कल्याणकारी सुरक्षा।


4. कार्य की गरिमा


आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को किसी अस्थायी या आसानी से बदले जा सकने वाले कार्यक्रम-कर्मचारी की तरह नहीं माना जाना चाहिए।


वह प्रशिक्षित सामुदायिक स्तर की कार्यकर्ता हैं, जो भारत की मानव पूंजी के विकास में योगदान देती हैं।


5. सुरक्षित कार्य परिस्थितियाँ


अधिनियम में कार्यस्थल की सुरक्षा, आधारभूत सुविधाओं, स्वच्छता, पेयजल, बाल देखभाल सुविधाओं, उपकरणों तथा व्यावसायिक जोखिमों से सुरक्षा के न्यूनतम मानक निर्धारित किए जाने चाहिए।


6. उत्पीड़न और भेदभाव से सुरक्षा


एक मजबूत शिकायत-निवारण व्यवस्था स्थापित की जानी चाहिए, जिसमें यौन उत्पीड़न, मौखिक दुर्व्यवहार, धमकी, मनमानी अनुशासनात्मक कार्रवाई और भेदभाव से प्रभावी सुरक्षा शामिल हो।


7. उचित कार्यभार


राज्य को यह सिद्धांत स्वीकार करना चाहिए कि अतिरिक्त सरकारी जिम्मेदारियों के साथ संबंधित संसाधन, प्रशिक्षण और पारिश्रमिक भी उपलब्ध कराया जाना चाहिए।


बिना संबंधित संस्थागत सहायता के लगातार जिम्मेदारियाँ बढ़ाते जाना अपने आप में संरचनात्मक शोषण का एक रूप है।


8. प्रशिक्षण और व्यावसायिक विकास


आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को संरचित प्रशिक्षण, प्रमाणन, करियर प्रगति और व्यावसायिक उन्नति के अवसर उपलब्ध होने चाहिए।


9. शोषण के बजाय तकनीक का उपयोग


डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य प्रशासनिक बोझ को कम करना होना चाहिए, न कि पहले से ही अत्यधिक कार्यभार झेल रही कार्यकर्ताओं पर अतिरिक्त बोझ डालना।


अधिनियम में उपयुक्त डिजिटल बुनियादी ढाँचे, तकनीकी सहायता, कनेक्टिविटी और प्रशिक्षण के अधिकार को मान्यता दी जानी चाहिए।


10. लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व


आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिसके माध्यम से उनके प्रतिनिधि उनकी कार्य परिस्थितियों से संबंधित नीतिगत चर्चाओं में भाग ले सकें।


जो लोग नीतियों को लागू करते हैं, उन्हें उन नीतियों के निर्माण में अपनी आवाज रखने का अधिकार भी होना चाहिए।


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प्रारंभिक बाल विकास राष्ट्र निर्माण है


इस कानून का महत्व बताने का एक और महत्वपूर्ण कारण है।


आंगनवाड़ी व्यवस्था केवल एक कल्याणकारी कार्यक्रम नहीं है।


यह भारत की मानव पूंजी में निवेश है।


बच्चे के जीवन के शुरुआती वर्ष उसके स्वास्थ्य, सीखने की क्षमता, संज्ञानात्मक विकास और भविष्य के शैक्षिक परिणामों को गहराई से प्रभावित करते हैं। इसलिए प्रारंभिक बाल देखभाल और शिक्षा का प्रभाव आंगनवाड़ी केंद्र से कहीं आगे तक जाता है।


जो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता किसी बच्चे के पोषण, सीखने, स्वास्थ्य जागरूकता और सामाजिक विकास में सहायता करती हैं, वे भारत के भविष्य के कार्यबल, नागरिकता और लोकतंत्र के निर्माण में भाग ले रही हैं।


कल के लोकतंत्र की गुणवत्ता आंशिक रूप से आज के बचपन की गुणवत्ता पर निर्भर करती है।


यदि भारत एक ज्ञानवान, स्वस्थ और सामाजिक रूप से जिम्मेदार पीढ़ी चाहता है, तो उसे उस पीढ़ी की नींव मजबूत करने वाली महिलाओं को भी मजबूत करना होगा।


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*संवैधानिक प्रश्न* — क्या हम देश की 1.3 करोड़ आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को नज़रअंदाज़ करके लैंगिक न्याय प्राप्त कर सकते हैं?


*आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम की माँग भारत की संवैधानिक दृष्टि* में भी निहित है।


*भारतीय संविधान राज्य को सामाजिक और आर्थिक न्याय, समानता, गरिमा तथा जनता के कल्याण के प्रति प्रतिबद्ध करता है। अनुच्छेद 39, 42 और 47 जैसे नीति-निर्देशक तत्व* - आजीविका, मानवीय कार्य परिस्थितियों, मातृत्व संरक्षण, पोषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति राज्य की जिम्मेदारी को दर्शाते हैं।


यदि आवश्यक सार्वजनिक कार्य करने वाला मुख्यतः महिला कार्यबल संरचनात्मक रूप से कमतर आँका जाता रहे, तो समानता की संवैधानिक प्रतिज्ञा पूर्ण नहीं मानी जा सकती।


इसलिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए:


“क्या भारत आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को वैधानिक अधिकार देने का खर्च वहन कर सकता है?”


अधिक उचित प्रश्न यह है:


“क्या कोई कल्याणकारी राज्य उन्हें वैधानिक अधिकार न देने की कीमत वहन कर सकता है?”


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राष्ट्रीय न्यूनतम मानक, और राज्यों को उससे बेहतर करने की स्वतंत्रता


चूँकि आंगनवाड़ी सेवाएँ केंद्र और राज्य—दोनों स्तरों की सरकारी संरचनाओं के माध्यम से संचालित होती हैं, प्रस्तावित कानून को अधिकारों और सुरक्षा का एक राष्ट्रीय न्यूनतम स्तर निर्धारित करना चाहिए।


राज्यों को इस न्यूनतम स्तर से अधिक लाभ देने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।


केवल इसलिए कि राष्ट्रीय मानक मौजूद है, किसी राज्य को न्यूनतम स्तर पर रुकने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए।


इसके बजाय, अधिनियम सहकारी संघवाद का ऐसा ढाँचा तैयार कर सकता है जिसमें केंद्र लागू करने योग्य राष्ट्रीय मानक स्थापित करे और राज्य उनमें सुधार एवं नवाचार करें।


इससे भारत के अलग-अलग हिस्सों में समान प्रकार की सार्वजनिक जिम्मेदारियाँ निभाने वाली कार्यकर्ताओं की कार्य परिस्थितियों में मौजूद अत्यधिक असमानताओं को भी कम किया जा सकेगा।


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एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता आयोग की स्थापना


प्रस्तावित अधिनियम के अंतर्गत एक स्वतंत्र राष्ट्रीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ता आयोग भी स्थापित किया जा सकता है।


इसके कार्यों में शामिल हो सकते हैं:


- वैधानिक अधिकारों के क्रियान्वयन की निगरानी;

- पारिश्रमिक और सेवा शर्तों की समीक्षा;

- संरचनात्मक शिकायतों की जाँच;

- वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित करना;

- कार्यबल संबंधी नीतियों पर सरकारों को सलाह देना;

- लैंगिक असमानताओं का अध्ययन;

- प्रशिक्षण और आधारभूत सुविधाओं में सुधार की सिफारिश करना; तथा

- यह सुनिश्चित करना कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की आवाज नीति-निर्माताओं तक पहुँचे।


इसी प्रकार की व्यवस्थाएँ राज्य स्तर पर भी स्थापित की जा सकती हैं।


ऐसी संस्था आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को प्रशासनिक निर्णयों की केवल निष्क्रिय प्राप्तकर्ता होने की स्थिति से निकालकर भारत की सामाजिक-विकास व्यवस्था में मान्यता प्राप्त हितधारक के रूप में स्थापित करेगी।


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*मान्यता की लागत बनाम उपेक्षा की कीमत*


कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि वैधानिक मान्यता देने से सरकारों पर भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा।


लेकिन इस तर्क को उन सेवाओं के संदर्भ में देखना आवश्यक है, जो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता पहले से प्रदान कर रही हैं।


पोषण संबंधी हस्तक्षेप, मातृ सहायता, पूर्व-प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य जागरूकता और प्रारंभिक बाल सेवाएँ ऐसी लागत नहीं हैं जिनका कोई प्रतिफल नहीं होता। ये ऐसे निवेश हैं जो भविष्य में सामाजिक और आर्थिक लागतों को कम कर सकते हैं।


जिस बच्चे को उचित पोषण और प्रारंभिक शिक्षा मिलती है, उसे केवल कल्याणकारी सहायता नहीं मिल रही होती; भारत उसके भविष्य की उत्पादकता और नागरिकता में निवेश कर रहा होता है।


इसी प्रकार, उस महिला को सामाजिक सुरक्षा देना, जिसने दशकों तक अपने समुदाय की सेवा की है, कोई उदारता नहीं है।


यह उसके द्वारा पहले लैंगिक न्याय को आधी सदी तक नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता


ICDS के 50 वर्ष, 1.3 करोड़ आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, और फिर भी कोई कानून नहीं


हम आज भी किसी भी नीति को न्यायालय में चुनौती नहीं दे सकते। क्या इसका अर्थ यह है कि यह लैंगिक अन्याय अगली सदी तक भी जारी रहेगा?


भारत को आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 की आवश्यकता क्यों है?


*इसके पीछे सभी वैध और संवैधानिक कारण तथा तर्क मौजूद हैं*। कानून के समक्ष समानता और लैंगिक आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव न होना हमारे संविधान द्वारा हमें दिया गया वचन है।


*समावेशी लोकतांत्रिक* भावना को प्रत्येक कल्याणकारी सरकार द्वारा महत्व दिया जाना और कायम रखा जाना चाहिए।


*निरंतर सकारात्मक सुधार तथा लैंगिक दृष्टि से विशिष्ट और सशक्त कानूनों का निर्माण हमारे राष्ट्र को और मजबूत बनाएगा*।


भारत के भविष्य की नींव रखने वाली महिलाओं को सम्मान देना कोई दान या कृपा नहीं है—यह संवैधानिक न्याय है।


लगभग पाँच दशकों से भारत की आंगनवाड़ी व्यवस्था कुपोषण, विकासात्मक असमानता, मातृ स्वास्थ्य की समस्याओं और शैक्षिक वंचना के विरुद्ध देश की लड़ाई में अग्रिम पंक्ति में खड़ी रही है। एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) की शुरुआत 1975 में एक महत्वाकांक्षी उद्देश्य के साथ की गई थी—हर बच्चे को जीवन की एक समान और बेहतर शुरुआत देना तथा मानव विकास के सबसे महत्वपूर्ण चरणों में माताओं और परिवारों को सहायता प्रदान करना।


पचास वर्ष बाद आंगनवाड़ी कार्यकर्ता भारतीय कल्याणकारी राज्य के सबसे अधिक दिखाई देने वाले चेहरों में से एक बन चुकी हैं।


फिर भी इस व्यवस्था के केंद्र में एक गंभीर विरोधाभास मौजूद है।


भारत आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं से महत्वपूर्ण सार्वजनिक जिम्मेदारियाँ निभाने की अपेक्षा करता है, लेकिन आज तक उन्हें उनके अधिकारों, दर्जे, गरिमा और सामाजिक सुरक्षा को मान्यता देने वाला कोई व्यापक वैधानिक ढाँचा नहीं दिया गया है।


इस विरोधाभास को तत्काल दूर किया जाना आवश्यक है।


अब भारत को आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 की आवश्यकता है।


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भारत की दिखाई देने वाली कल्याण व्यवस्था के पीछे अदृश्य कार्यबल


आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएँ केवल पूरक पोषण वितरित करने या रजिस्टर बनाए रखने का कार्य नहीं करतीं। दशकों के दौरान उनकी जिम्मेदारियों में अत्यंत व्यापक विस्तार हुआ है।


वे निम्नलिखित कार्यों में योगदान देती हैं:


- प्रारंभिक बाल देखभाल और शिक्षा;

- पोषण एवं बच्चों की वृद्धि की निगरानी;

- मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य;

- टीकाकरण तथा स्वास्थ्य संबंधी जन-जागरूकता;

- पूर्व-प्राथमिक शिक्षा;

- सामुदायिक जागरूकता;

- संवेदनशील एवं असुरक्षित बच्चों की पहचान;

- गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली महिलाओं को सहायता;

- सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन;

- आँकड़ों का संग्रह एवं रिपोर्टिंग;

- आपदा एवं आपातकालीन परिस्थितियों में सामुदायिक सेवाएँ; तथा

- बच्चों के शारीरिक, संज्ञानात्मक, भावनात्मक और सामाजिक विकास की मजबूत नींव तैयार करना।


व्यवहार में, किसी कमजोर या वंचित परिवार के बच्चे या माँ के लिए आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अक्सर राज्य और नागरिक के बीच पहला संस्थागत संपर्क-बिंदु होती हैं।


राज्य अपनी नीतियों को जमीनी स्तर तक पहुँचाने और लागू करने के लिए इन महिलाओं पर निर्भर करता है। लेकिन राज्य और इन कार्यकर्ताओं के बीच कानूनी संबंध आज भी अत्यंत अपर्याप्त है।


यह केवल रोजगार नीति का मुद्दा नहीं है।


यह लैंगिक न्याय, सामाजिक न्याय और संवैधानिक शासन का प्रश्न है।

*पचास वर्षों की सेवा का अर्थ पचास वर्षों की असुरक्षा नहीं होना चाहिए*?


ICDS की प्रयोगात्मक यात्रा अब आधी सदी पार कर चुकी है। इस अवधि में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की कई पीढ़ियाँ इस व्यवस्था में आईं, अपने समुदायों की सेवा की और सेवानिवृत्त हुईं या व्यवस्था से बाहर चली गईं—लेकिन उन्हें उस प्रकार की वैधानिक मान्यता नहीं मिली, जो सामान्यतः दीर्घकालीन सार्वजनिक सेवा से जुड़ी होती है।


जिस कार्यकर्ता से राज्य के प्रति जवाबदेह रहने की अपेक्षा की जाती है, वह राज्य की कानूनी संरचना में अदृश्य नहीं रहनी चाहिए।


*मूल प्रश्न बहुत सरल है:*


“यदि राज्य किसी महिला को महत्वपूर्ण सार्वजनिक जिम्मेदारियाँ सौंपता है, तो फिर वही राज्य उसे उस गरिमा, सुरक्षा और कानूनी मान्यता से क्यों वंचित करे, जो सार्वजनिक कार्य से जुड़ी होती है?”


ऐसी कार्यकर्ताओं को “मानदेय आधारित”, “स्वैच्छिक” या “अंशकालिक” कहना मात्र इस प्रश्न का उत्तर नहीं हो सकता, जबकि उनके वास्तविक कार्य व्यापक, निरंतर और सरकारी कार्यक्रमों के लिए अनिवार्य हैं।


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लैंगिक प्रश्न को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता


आंगनवाड़ी कार्यबल में महिलाओं की संख्या अत्यधिक है। इसलिए पर्याप्त वैधानिक मान्यता का लगातार अभाव एक स्पष्ट लैंगिक आयाम रखता है।


जब आवश्यक सार्वजनिक जिम्मेदारियाँ व्यवस्थित रूप से महिलाओं को सौंपी जाती हैं, लेकिन उनके कार्य को औपचारिक रोजगार से कमतर माना जाता है, तो समाज एक पुरानी व्यवस्था को दोहराने का जोखिम उठाता है:


जब समाज को महिलाओं के श्रम की आवश्यकता होती है, तब उनके काम को आवश्यक माना जाता है; लेकिन जब महिलाएँ उसी काम के अधिकार माँगती हैं, तब उसके मूल्य को कम आँका जाता है।


यही कारण है कि आंगनवाड़ी सुधार को केवल वेतन या प्रशासनिक व्यय के दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए।


इसे *लैंगिक-संवेदनशील* शासन के दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए।


एक आधुनिक कल्याणकारी राज्य एक ओर महिला सशक्तीकरण की बात नहीं कर सकता और दूसरी ओर लाखों महिलाओं से अनिवार्य सार्वजनिक कार्य करवाते हुए उनके दर्जे, पारिश्रमिक, सामाजिक सुरक्षा, कार्यस्थल की गरिमा और शिकायत निवारण के लिए व्यापक वैधानिक ढाँचा उपलब्ध कराने से पीछे नहीं हट सकता।


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*“मानदेय” से अधिकार-आधारित सार्वजनिक सेवा की ओर*- 

प्रस्तावित कानून के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों में से एक यह है कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को परिभाषित करने के लिए किस प्रकार की भाषा का इस्तेमाल किया जाता है।


*मानदेय-आधारित मॉडल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि हो सकती है, लेकिन भारत की कल्याणकारी जिम्मेदारियाँ पिछले दशकों में नाटकीय रूप से बदल चुकी हैं*।


आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं से राज्य की अपेक्षाएँ बढ़ी हैं। उनकी जिम्मेदारियाँ बढ़ी हैं। रिपोर्टिंग की आवश्यकताएँ बढ़ी हैं। डिजिटल जिम्मेदारियाँ बढ़ी हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा प्रारंभिक बाल विकास से संबंधित जिम्मेदारियाँ बढ़ी हैं।


इसलिए कानूनी ढाँचे को भी उसी के अनुरूप विकसित होना चाहिए।


आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 को स्पष्ट वैधानिक दर्जा स्थापित करना चाहिए और न्यूनतम सेवा शर्तों की गारंटी देनी चाहिए, ताकि यह कार्यबल मुख्यतः कार्यपालिका की योजनाओं, सरकारी आदेशों या समय-समय पर लिए जाने वाले नीतिगत निर्णयों पर निर्भर न रहे।


उद्देश्य केवल मानदेय बढ़ाना नहीं होना चाहिए।


उद्देश्य अधिकार-आधारित मान्यता स्थापित करना होना चाहिए।


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*अलग आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम क्यों आवश्यक है?*


*एक व्यापक केंद्रीय कानून एक समान कानूनी आधार प्रदान कर सकता है, साथ ही संघीय ढाँचे का सम्मान करते हुए राज्यों को राष्ट्रीय न्यूनतम स्तर से अधिक लाभ देने की स्वतंत्रता भी दे सकता है।*


ऐसा कानून निम्नलिखित प्रावधान स्थापित कर सकता है:


1. वैधानिक मान्यता


प्रत्येक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका को सार्वजनिक कल्याण वितरण प्रणाली के भीतर कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त दर्जा दिया जाना चाहिए।


2. उचित और पारदर्शी पारिश्रमिक


पारिश्रमिक वास्तविक रूप से निभाई जाने वाली जिम्मेदारियों के अनुरूप होना चाहिए और एक पारदर्शी वैधानिक व्यवस्था के माध्यम से समय-समय पर संशोधित किया जाना चाहिए।


3. सामाजिक सुरक्षा


कानून के अंतर्गत निम्नलिखित के लिए लागू करने योग्य व्यवस्था होनी चाहिए:


- पेंशन अथवा सेवानिवृत्ति लाभ;

- भविष्य निधि या इसके समकक्ष सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था;

- स्वास्थ्य बीमा;

- मातृत्व लाभ;

- दिव्यांगता से सुरक्षा;

- दुर्घटना मुआवजा;

- जीवन बीमा; तथा

- अन्य उपयुक्त कल्याणकारी सुरक्षा।


4. कार्य की गरिमा


आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को किसी अस्थायी या आसानी से बदले जा सकने वाले कार्यक्रम-कर्मचारी की तरह नहीं माना जाना चाहिए।


वह प्रशिक्षित सामुदायिक स्तर की कार्यकर्ता हैं, जो भारत की मानव पूंजी के विकास में योगदान देती हैं।


5. सुरक्षित कार्य परिस्थितियाँ


अधिनियम में कार्यस्थल की सुरक्षा, आधारभूत सुविधाओं, स्वच्छता, पेयजल, बाल देखभाल सुविधाओं, उपकरणों तथा व्यावसायिक जोखिमों से सुरक्षा के न्यूनतम मानक निर्धारित किए जाने चाहिए।


6. उत्पीड़न और भेदभाव से सुरक्षा


एक मजबूत शिकायत-निवारण व्यवस्था स्थापित की जानी चाहिए, जिसमें यौन उत्पीड़न, मौखिक दुर्व्यवहार, धमकी, मनमानी अनुशासनात्मक कार्रवाई और भेदभाव से प्रभावी सुरक्षा शामिल हो।


7. उचित कार्यभार


राज्य को यह सिद्धांत स्वीकार करना चाहिए कि अतिरिक्त सरकारी जिम्मेदारियों के साथ संबंधित संसाधन, प्रशिक्षण और पारिश्रमिक भी उपलब्ध कराया जाना चाहिए।


बिना संबंधित संस्थागत सहायता के लगातार जिम्मेदारियाँ बढ़ाते जाना अपने आप में संरचनात्मक शोषण का एक रूप है।


8. प्रशिक्षण और व्यावसायिक विकास


आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को संरचित प्रशिक्षण, प्रमाणन, करियर प्रगति और व्यावसायिक उन्नति के अवसर उपलब्ध होने चाहिए।


9. शोषण के बजाय तकनीक का उपयोग


डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य प्रशासनिक बोझ को कम करना होना चाहिए, न कि पहले से ही अत्यधिक कार्यभार झेल रही कार्यकर्ताओं पर अतिरिक्त बोझ डालना।


अधिनियम में उपयुक्त डिजिटल बुनियादी ढाँचे, तकनीकी सहायता, कनेक्टिविटी और प्रशिक्षण के अधिकार को मान्यता दी जानी चाहिए।


10. लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व


आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिसके माध्यम से उनके प्रतिनिधि उनकी कार्य परिस्थितियों से संबंधित नीतिगत चर्चाओं में भाग ले सकें।


जो लोग नीतियों को लागू करते हैं, उन्हें उन नीतियों के निर्माण में अपनी आवाज रखने का अधिकार भी होना चाहिए।


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प्रारंभिक बाल विकास राष्ट्र निर्माण है


इस कानून का महत्व बताने का एक और महत्वपूर्ण कारण है।


आंगनवाड़ी व्यवस्था केवल एक कल्याणकारी कार्यक्रम नहीं है।


यह भारत की मानव पूंजी में निवेश है।


बच्चे के जीवन के शुरुआती वर्ष उसके स्वास्थ्य, सीखने की क्षमता, संज्ञानात्मक विकास और भविष्य के शैक्षिक परिणामों को गहराई से प्रभावित करते हैं। इसलिए प्रारंभिक बाल देखभाल और शिक्षा का प्रभाव आंगनवाड़ी केंद्र से कहीं आगे तक जाता है।


जो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता किसी बच्चे के पोषण, सीखने, स्वास्थ्य जागरूकता और सामाजिक विकास में सहायता करती हैं, वे भारत के भविष्य के कार्यबल, नागरिकता और लोकतंत्र के निर्माण में भाग ले रही हैं।


कल के लोकतंत्र की गुणवत्ता आंशिक रूप से आज के बचपन की गुणवत्ता पर निर्भर करती है।


यदि भारत एक ज्ञानवान, स्वस्थ और सामाजिक रूप से जिम्मेदार पीढ़ी चाहता है, तो उसे उस पीढ़ी की नींव मजबूत करने वाली महिलाओं को भी मजबूत करना होगा।


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*संवैधानिक प्रश्न — क्या हम देश की 1.3 करोड़ आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को नज़रअंदाज़ करके लैंगिक न्याय प्राप्त कर सकते हैं*?


*आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम की माँग भारत की संवैधानिक दृष्टि में भी निहित है*🇮🇳।


*भारतीय संविधान राज्य को सामाजिक और आर्थिक न्याय, समानता, गरिमा तथा जनता के कल्याण के प्रति प्रतिबद्ध करता है। अनुच्छेद 39, 42 और 47 जैसे नीति-निर्देशक तत्व आजीविका, मानवीय कार्य परिस्थितियों, मातृत्व संरक्षण, पोषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति राज्य की जिम्मेदारी को दर्शाते हैं*।


यदि आवश्यक सार्वजनिक कार्य करने वाला मुख्यतः *महिला कार्यबल संरचनात्मक रूप से कमतर आँका जाता रहे, तो समानता की संवैधानिक प्रतिज्ञा पूर्ण नहीं मानी जा सकती*।


*इसलिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए*-:


*“क्या भारत आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को वैधानिक अधिकार देने का खर्च वहन कर सकता है?*”


*अधिक उचित प्रश्न यह है:*- 


*“क्या कोई कल्याणकारी राज्य उन्हें वैधानिक अधिकार न देने की कीमत वहन कर सकता है* ?”


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*राष्ट्रीय न्यूनतम मानक, और राज्यों को उससे बेहतर करने की स्वतंत्रता*


*चूँकि आंगनवाड़ी सेवाएँ केंद्र और राज्य—दोनों स्तरों की सरकारी संरचनाओं के माध्यम से संचालित होती हैं, प्रस्तावित कानून को अधिकारों और सुरक्षा का एक राष्ट्रीय न्यूनतम स्तर निर्धारित करना चाहिए।*


राज्यों को इस न्यूनतम स्तर से अधिक लाभ देने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।


केवल इसलिए कि राष्ट्रीय मानक मौजूद है, किसी राज्य को न्यूनतम स्तर पर रुकने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए।


इसके बजाय, अधिनियम सहकारी संघवाद का ऐसा ढाँचा तैयार कर सकता है जिसमें केंद्र लागू करने योग्य राष्ट्रीय मानक स्थापित करे और राज्य उनमें सुधार एवं नवाचार करें।


इससे भारत के अलग-अलग हिस्सों में समान प्रकार की सार्वजनिक जिम्मेदारियाँ निभाने वाली कार्यकर्ताओं की कार्य परिस्थितियों में मौजूद अत्यधिक असमानताओं को भी कम किया जा सकेगा।


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एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता आयोग की स्थापना


प्रस्तावित अधिनियम के अंतर्गत एक स्वतंत्र राष्ट्रीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ता आयोग भी स्थापित किया जा सकता है।


इसके कार्यों में शामिल हो सकते हैं:


- वैधानिक अधिकारों के क्रियान्वयन की निगरानी;

- पारिश्रमिक और सेवा शर्तों की समीक्षा;

- संरचनात्मक शिकायतों की जाँच;

- वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित करना;

- कार्यबल संबंधी नीतियों पर सरकारों को सलाह देना;

- लैंगिक असमानताओं का अध्ययन;

- प्रशिक्षण और आधारभूत सुविधाओं में सुधार की सिफारिश करना; तथा

- यह सुनिश्चित करना कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की आवाज नीति-निर्माताओं तक पहुँचे।


इसी प्रकार की व्यवस्थाएँ राज्य स्तर पर भी स्थापित की जा सकती हैं।


ऐसी संस्था आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को प्रशासनिक निर्णयों की केवल निष्क्रिय प्राप्तकर्ता होने की स्थिति से निकालकर भारत की सामाजिक-विकास व्यवस्था में मान्यता प्राप्त हितधारक के रूप में स्थापित करेगी।


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मान्यता की लागत बनाम उपेक्षा की कीमत


कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि वैधानिक मान्यता देने से सरकारों पर भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा।


लेकिन इस तर्क को उन सेवाओं के संदर्भ में देखना आवश्यक है, जो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता पहले से प्रदान कर रही हैं।


पोषण संबंधी हस्तक्षेप, मातृ सहायता, पूर्व-प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य जागरूकता और प्रारंभिक बाल सेवाएँ ऐसी लागत नहीं हैं जिनका कोई प्रतिफल नहीं होता। ये ऐसे निवेश हैं जो भविष्य में सामाजिक और आर्थिक लागतों को कम कर सकते हैं।


जिस बच्चे को उचित पोषण और प्रारंभिक शिक्षा मिलती है, उसे केवल कल्याणकारी सहायता नहीं मिल रही होती; भारत उसके भविष्य की उत्पादकता और नागरिकता में निवेश कर रहा होता है।


इसी प्रकार, उस महिला को सामाजिक सुरक्षा देना, जिसने दशकों तक अपने समुदाय की सेवा की है, कोई उदारता नहीं है।


यह उसके द्वारा पहले से निर्मित मूल्य की मान्यता है।


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लाभार्थी से हितधारक बनने की ओर


आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को अब केवल नौकरशाही व्यवस्था के सबसे निचले स्तर पर खड़ी होकर निर्देशों को लागू करने वाली कर्मचारी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।


उन्हें भारत के विकास में हितधारक के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।


वे उन समुदायों को समझती हैं, जहाँ सरकारी कार्यालय शायद कभी पूरी तरह नहीं पहुँच पाते।


वे जानती हैं कि कौन से बच्चे संवेदनशील या असुरक्षित स्थिति में हैं।


वे माताओं, परिवारों और स्थानीय संस्थाओं के साथ निरंतर संपर्क में रहती हैं।


वे कुपोषण, विकास संबंधी कठिनाइयों और सामाजिक समस्याओं को आधिकारिक आँकड़ों में दिखाई देने से पहले ही देख लेती हैं।


उनका ज्ञान एक राष्ट्रीय संसाधन है।


इसलिए भारत को ऐसी व्यवस्था से आगे बढ़ना चाहिए जिसमें आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को केवल योजनाओं को लागू करने के निर्देश दिए जाते हैं। इसके स्थान पर उन्हें सार्वजनिक नीति में व्यावसायिक रूप से मान्यता प्राप्त साझेदार बनाया जाना चाहिए।


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आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 — एक राष्ट्रीय प्रतिबद्धता


प्रस्तावित कानून अंततः पाँच सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए:


मान्यता।

गरिमा।

सुरक्षा।

समानता।

भागीदारी।


अधिनियम को प्रत्येक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका के लिए न्यूनतम वैधानिक ढाँचे की गारंटी देनी चाहिए तथा राज्यों को उससे बेहतर लाभ प्रदान करने में सक्षम बनाना चाहिए।


इसे इस कार्यबल के विशेष लैंगिक आयाम को मान्यता देनी चाहिए तथा लैंगिक-संवेदनशील बजट व्यवस्था और नीतिगत मूल्यांकन को शामिल करना चाहिए।


इसे सामाजिक सुरक्षा, उचित पारिश्रमिक, सुरक्षित कार्यस्थल, शिकायत निवारण, व्यावसायिक विकास और सेवानिवृत्ति सुरक्षा के लिए प्रभावी व्यवस्थाएँ स्थापित करनी चाहिए।


सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे एक स्पष्ट संदेश देना चाहिए:


*“जो महिलाएँ भारत के बच्चों का भविष्य बनाती हैं, वे कानूनी रूप से अदृश्य नहीं रह सकतीं।*”


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भारत की *महिलाओं के प्रति प्रतिबद्धता* की एक कसौटी


भारत एक मजबूत, विकसित और *सामाजिक रूप से जिम्मेदार राष्ट्र बनने की आकांक्षा* रखता है।


लेकिन किसी राष्ट्र की शक्ति केवल GDP, बुनियादी ढाँचे या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं मापी जाती।


एक मजबूत राष्ट्र वह है जो उन लोगों की गरिमा की रक्षा करता है, जो उसकी कल्याण व्यवस्था को वास्तव में कार्यशील बनाते हैं।


एक लैंगिक रूप से जिम्मेदार राष्ट्र केवल महिला सशक्तीकरण की बात नहीं करता।


वह महिलाओं को लागू किए जा सकने वाले और प्रभावी अधिकारों के माध्यम से सशक्त बनाता है।


और एक कल्याणकारी राज्य केवल नागरिकों के लिए योजनाएँ नहीं बनाता।


वह उन कार्यकर्ताओं की भी रक्षा करता है, जो इन योजनाओं को नागरिकों तक पहुँचाते हैं।


ICDS के पचास वर्ष पूरे होने के बाद अब समय आ गया है कि हम अस्थायी व्यवस्थाओं और बिखरे हुए प्रशासनिक आदेशों से आगे बढ़ें।


भारत को आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 बनाना चाहिए—एक व्यापक, अधिकार-आधारित और लैंगिक-संवेदनशील कानून, जो आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को सार्वजनिक कल्याण तथा राष्ट्र के विकास में अनिवार्य योगदान देने वाली कर्मियों के रूप में मान्यता दे।


हर सुबह भारत के आंगनवाड़ी केंद्रों के दरवाजे पर खड़ी होने वाली महिलाएँ वास्तव में भारत के भविष्य के दरवाजे पर खड़ी हैं।


अब भारत को उनके साथ खड़ा होना होगा।


*माँग सरल है*:


*ICDS के 50 वर्ष एक कानून की दिशा में आगे बढ़ने चाहिए*।

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के *हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल लगभग 13.31 लाख आंगनवाड़ी कार्यकर्ता* hain ,

लाखों महिला कार्यकर्ता वैधानिक मान्यता की हकदार हैं।


*अनिवार्य सार्वजनिक कार्य* के लिए सम्मानजनक सार्वजनिक-सेवा सुरक्षा मिलनी चाहिए।


और *लैंगिक न्याय के प्रति भारत की प्रतिबद्धता कानून में लागू किए जा सकने वाले अधिकारों के रूप में परिवर्तित होनी चाहिए*।

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 लागू करें।


कार्यकर्ता के लिए।

बच्चे के लिए।

महिला के लिए।

संविधान के लिए।

भारत के भविष्य के लिए।


**लेखिका —


*डॉ. रेनू डी. सिंह

पिछले 45 वर्षों से जेंडर राइट्स एक्टिविस्ट**से निर्मित मूल्य की मान्यता है* l


*लाभार्थी से हितधारक बनने की ओर**आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को अब *केवल नौकरशाही व्यवस्था के सबसे निचले स्तर पर खड़ी होकर निर्देशों को लागू करने वाली कर्मचारी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए*।


उन्हें *भारत के विकास में हितधारक के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए*।


*वे उन समुदायों को समझती हैं, जहाँ सरकारी कार्यालय शायद कभी पूरी तरह नहीं पहुँच पाते*।


वे जानती हैं कि कौन से बच्चे संवेदनशील या असुरक्षित स्थिति में हैं।


वे माताओं, परिवारों और स्थानीय संस्थाओं के साथ निरंतर संपर्क में रहती हैं।


वे कुपोषण, विकास संबंधी कठिनाइयों और सामाजिक समस्याओं को आधिकारिक आँकड़ों में दिखाई देने से पहले ही देख लेती हैं।

*उनका ज्ञान एक राष्ट्रीय संसाधन है*।


इसलिए भारत को ऐसी व्यवस्था से आगे बढ़ना चाहिए जिसमें आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को केवल योजनाओं को लागू करने के निर्देश दिए जाते हैं। इसके स्थान पर उन्हें सार्वजनिक नीति में व्यावसायिक रूप से मान्यता प्राप्त साझेदार बनाया जाना चाहिए।


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*आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 — एक राष्ट्रीय प्रतिबद्धता*


*प्रस्तावित कानून अंततः पाँच सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए*


*मान्यता*।

*गरिमा*

*सुरक्षा*।

*समानता*।

*भागीदारी*।


*अधिनियम को प्रत्येक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका के लिए न्यूनतम वैधानिक ढाँचे की गारंटी देनी चाहिए* तथा राज्यों को उससे बेहतर लाभ प्रदान करने में सक्षम बनाना चाहिए।

इसे *इस कार्यबल के विशेष लैंगिक आयाम को मान्यता* देनी चाहिए तथा *लैंगिक-संवेदनशील बजट व्यवस्था* और *नीतिगत मूल्यांकन* को शामिल करना चाहिए।


इसे *सामाजिक सुरक्षा, उचित पारिश्रमिक, सुरक्षित कार्यस्थल, शिकायत निवारण, व्यावसायिक विकास और सेवानिवृत्ति सुरक्षा के लिए प्रभावी व्यवस्थाएँ* स्थापित करनी चाहिए।


सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे एक स्पष्ट संदेश देना चाहिए:


*“जो महिलाएँ भारत के बच्चों का भविष्य बनाती हैं, वे कानूनी रूप से अदृश्य नहीं रह सकतीं।*”


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भारत की *महिलाओं के प्रति प्रतिबद्धता की एक कसौटी*,

*भारत एक मजबूत, विकसित और सामाजिक रूप से जिम्मेदार राष्ट्र बनने की आकांक्षा रखता है*।

लेकिन किसी राष्ट्र की शक्ति केवल GDP, बुनियादी ढाँचे या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं मापी जाती।


एक *मजबूत राष्ट्र* वह है जो उन लोगों की गरिमा की रक्षा करता है, जो उसकी कल्याण व्यवस्था को वास्तव में कार्यशील बनाते हैं।

एक लैंगिक रूप से जिम्मेदार राष्ट्र केवल महिला सशक्तीकरण की बात नहीं करता।

वह महिलाओं को लागू किए जा सकने वाले और *प्रभावी अधिकारों* के माध्यम से सशक्त बनाता है।

और एक कल्याणकारी राज्य केवल नागरिकों के लिए योजनाएँ नहीं बनाता।

वह उन कार्यकर्ताओं की भी रक्षा करता है, जो इन योजनाओं को नागरिकों तक पहुँचाते हैं।


*ICDS के पचास वर्ष पूरे होने के बाद अब समय आ गया है कि हम अस्थायी व्यवस्थाओं और बिखरे हुए प्रशासनिक आदेशों से आगे बढ़ें*।


*भारत को आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026* बनाना चाहिए—एक व्यापक, अधिकार-आधारित और लैंगिक-संवेदनशील कानून, जो आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को सार्वजनिक कल्याण तथा राष्ट्र के विकास में अनिवार्य योगदान देने वाली कर्मियों के रूप में मान्यता दे।


हर सुबह भारत के आंगनवाड़ी केंद्रों के दरवाजे पर खड़ी होने वाली महिलाएँ वास्तव में भारत के भविष्य के दरवाजे पर खड़ी हैं।


*अब भारत को उनके साथ खड़ा होना होगा*।


माँग सरल है:


ICDS के 50 वर्ष एक कानून की दिशा में आगे बढ़ने चाहिए।

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के *हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल लगभग 13.31 लाख आंगनवाड़ी कार्यकर्ता hain* ,

लाखों महिला कार्यकर्ता वैधानिक मान्यता की हकदार हैं।


अनिवार्य सार्वजनिक कार्य के लिए सम्मानजनक सार्वजनिक-सेवा सुरक्षा मिलनी चाहिए।


और लैंगिक न्याय के प्रति भारत की प्रतिबद्धता कानून में लागू किए जा सकने वाले अधिकारों के रूप में परिवर्तित होनी चाहिए।


आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 लागू करें।


कार्यकर्ता के लिए।

बच्चे के लिए।

महिला के लिए।

संविधान के लिए।

भारत के भविष्य के लिए।


**लेखिका*—


*डॉ. रेनू डी. सिंह*

*पिछले 45 वर्षों से *जेंडर राइट्स* *एक्टिविस्ट**. **

*पीएम मोदी के जन्मदिवस पर 2100 दीपों से जगमगाया यमुना तट, सीएम धामी ने 7.52 करोड़ के स्नान घाट का किया लोकार्पण*


एमडीडीए ने बदली हरिपुर कालसी के यमुना तट की तस्वीर, श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए विकसित हुआ सुविधाओं से लैस स्नान घाट*




प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस पर हरिपुर कालसी में माँ यमुना का तट आस्था, संस्कृति और विकास के रंग में नजर आया। ‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम में 2100 दीपों से यमुना तट रोशन हुआ। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने साधु-संतों, श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों के साथ माँ यमुना की आरती में प्रतिभाग किया। इस दौरान माँ यमुना की प्रतिमा का अनावरण और हरिघाट का लोकार्पण किया गया। मुख्यमंत्री ने मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) द्वारा 7.52 करोड़ रुपये की लागत से विकसित स्नान घाट भी जनता को समर्पित किया। इसके साथ ही माँ यमुना कृष्ण मंदिर का शिलान्यास किया गया।


*170 मीटर लंबे घाट से बढ़ीं सुविधाएं*

यमुना नदी के दायीं ओर विकसित स्नान घाट 170 मीटर लंबा और 15 मीटर चौड़ा है। करीब 7.52 करोड़ रुपये की लागत से  एमडीडीए द्वारा तैयार इस परियोजना में श्रद्धालुओं की सुविधा, सुरक्षा और तट के सौंदर्यीकरण पर विशेष ध्यान दिया गया है। देहरादून-चकराता राष्ट्रीय राजमार्ग-507 पर देहरादून से करीब 45 किलोमीटर दूर स्थित हरिपुर कालसी जौनसार-भाबर का प्रमुख प्रवेश द्वार है। क्षेत्र धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। आसपास अशोक शिलालेख, देवस्थल मंदिर और अश्वमेघ यज्ञ स्थल जैसे महत्वपूर्ण स्थल मौजूद हैं।


घाट के नदी की ओर  एमडीडीए द्वारा 170 मीटर लंबी और पांच मीटर ऊंची दो आरसीसी सुरक्षा दीवारें बनाई गई हैं। करीब 2000 वर्गमीटर क्षेत्र में आरसीसी और रेड सैंड स्टोन से दो प्लेटफॉर्म तैयार किए गए हैं। नदी तक सुरक्षित पहुंच के लिए सीढ़ियां बनाई गई हैं, जबकि माँ यमुना की आरती के लिए चार आरसीसी आरती स्थल विकसित किए गए हैं।


*सोलर लाइट और सुरक्षा इंतजाम*

मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) द्वारा घाट पर रात में बेहतर प्रकाश व्यवस्था के लिए 25 सोलर लाइटें लगाई गई हैं। सौंदर्यीकरण के लिए प्लांटर्स और आगंतुकों के बैठने के लिए शेड के साथ 12 बेंच स्थापित की गई हैं। महिला और पुरुष श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए शौचालय और चेंजिंग रूम का रेनोवेशन किया गया है। पेयजल के लिए वाटर स्पाउट की व्यवस्था की गई है। नदी किनारे सुरक्षा के लिए करीब 300 मीटर लंबी एसएस रेलिंग और एसएस चेन लगाई गई है। इससे स्नान और धार्मिक आयोजनों के दौरान श्रद्धालुओं को अधिक सुरक्षित एवं व्यवस्थित वातावरण मिलेगा।


*रोजाना आरती के लिए तैयार हुआ तट*

एमडीडीए सचिव मोहन सिंह बर्निया ने बताया कि हरिपुर कालसी का यमुना तट लंबे समय से धार्मिक आस्था का केंद्र रहा है। यहां पहले साप्ताहिक रूप से माँ यमुना की आरती होती रही है। नए घाट के विकसित होने से अब प्रतिदिन आरती के आयोजन के लिए भी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध हो गई हैं। घाट की सुरक्षा दीवारें यमुना के जलस्तर में वृद्धि के दौरान तटवर्ती क्षेत्र की सुरक्षा में भी सहायक होंगी।


*आस्था के साथ पर्यटन को भी मिलेगा विस्तार*

एमडीडीए उपाध्यक्ष बंशीधर तिवारी ने कहा कि नए घाट के निर्माण से हरिपुर कालसी के यमुना तट को व्यवस्थित स्वरूप मिला है। स्नान, आरती, बैठने, पेयजल, प्रकाश और सुरक्षा जैसी सुविधाओं के एक साथ उपलब्ध होने से श्रद्धालुओं के साथ यहां आने वाले पर्यटकों को भी बेहतर सुविधाएं मिलेंगी। धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व वाले इस क्षेत्र में विकसित आधारभूत ढांचा स्थानीय पर्यटन और सांस्कृतिक गतिविधियों को भी विस्तार देने में सहायक हो सकता है।


*मुख्यमंत्री आवास में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के दीर्घायु एवं स्वस्थ जीवन की कामना के साथ प्रज्वलित किया दीप* 




प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस के अवसर पर 17 सितंबर, गुरुवार रात्रि को मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने मुख्यमंत्री आवास में ‘आशीर्वाद का दीया’ प्रज्वलित कर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के दीर्घायु, स्वस्थ एवं यशस्वी जीवन की कामना की। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और मार्गदर्शन में देश निरंतर विकास एवं प्रगति के पथ पर आगे बढ़ रहा है तथा उत्तराखंड को भी उनके मार्गदर्शन का निरंतर लाभ मिल रहा है।



मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नाम से दीप प्रज्वलित करते हुए उनके उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और निरंतर राष्ट्रसेवा की कामना की। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपने नेतृत्व में देश की विकास यात्रा को नई दिशा और नई गति प्रदान की है। उनके नेतृत्व में भारत वैश्विक स्तर पर अपनी एक अलग पहचान स्थापित कर रहा है तथा देश आत्मनिर्भरता और विकसित भारत के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है।



मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का उत्तराखंड के प्रति विशेष स्नेह रहा है। उनके मार्गदर्शन में राज्य में कनेक्टिविटी, धार्मिक एवं आध्यात्मिक पर्यटन, सीमांत क्षेत्रों के विकास, अवस्थापना सुविधाओं और जनकल्याण से जुड़ी विभिन्न परियोजनाओं को नई गति मिली है। प्रधानमंत्री के विजन और मार्गदर्शन से उत्तराखंड विकास की नई ऊंचाइयों की ओर अग्रसर है।


उन्होंने कहा कि ‘आशीर्वाद का दीया’ केवल एक दीप प्रज्वलन कार्यक्रम नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के प्रति उत्तराखंड की जनता के स्नेह, सम्मान और शुभकामनाओं का प्रतीक है। दीप की यह ज्योति प्रधानमंत्री के स्वस्थ, दीर्घ और यशस्वी जीवन के साथ राष्ट्र की निरंतर प्रगति और समृद्धि की मंगलकामना को भी अभिव्यक्त करती है।



मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस के अवसर पर प्रदेशभर में विभिन्न सेवा एवं जनकल्याणकारी गतिविधियां आयोजित की जा रही हैं। इन आयोजनों के माध्यम से सेवा, समर्पण और जनकल्याण की भावना को और मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है।


मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश ‘विकसित भारत’ के संकल्प को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उत्तराखंड भी ‘विकसित उत्तराखंड’ के लक्ष्य के साथ इस विकास यात्रा में अपनी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित कर रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को जन्मदिवस की शुभकामनाएं देते हुए उनके स्वस्थ एवं दीर्घायु जीवन की कामना की।

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