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छिद्दरवाला : 



।उत्तराखण्ड पावर कापोरेशन लिमिटेड  के विद्युत वितरण खंड ऋषिकेश द्वारा जारी सूचना के अनुसार छिद्दरवाला क्षेत्र में 4 अप्रैल 2026 (शनिवार) को विद्युत आपूर्ति अस्थायी रूप से बाधित रहेगी।

विभाग से मिली जानकारी के अनुसार 33/11 केवी         लालतप्पड़ उपसंस्थान से पोषित 11 केवी छिद्दरवाला फीडर पर आरडीएसएस योजना के अंतर्गत आवश्यक निर्माण एवं सुधार कार्य किया जाना प्रस्तावित है। इस कार्य के चलते छिद्दरवाला सम्पूर्ण क्षेत्र में निर्धारित समय के दौरान बिजली आपूर्ति आंशिक अथवा पूर्ण रूप से बाधित रहेगी।

विभाग ने बताया कि 4 अप्रैल 2026 को प्रातः 10:00 बजे से सायं 5:00 बजे तक विद्युत आपूर्ति बंद रहेगी। इस दौरान क्षेत्र के उपभोक्ताओं से अपील की गई है कि वे आवश्यक वैकल्पिक व्यवस्था पहले से कर लें तथा विभागीय कार्य में सहयोग प्रदान करें।

विद्युत विभाग ने उपभोक्ताओं से अपील की है कि किसी भी असुविधा से बचने के लिए निर्धारित समय से पहले आवश्यक कार्य निपटा लें।


विश्व हिंदू परिषद बजरंग दल एवं दुर्गा वाहिनी द्वारा भव्य वीर हनुमान जन्मोत्सव शोभा यात्रा का आयोजन किया गया शोभा यात्रा रेलवे स्टेशन डोईवाला से भानियावाला चौक दुर्गा चौक रानी पोखरी चौक नटराज चौक होते हुए त्रिवेणी घाट में समापन हुआ .

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कार्यक्रम में हनुमान जी की विशाल मूर्ति एवं झांकियां आकर्षण का केंद्र रही कार्यक्रम में सैकड़ो की संख्या में युवा उपस्थित रहे जय श्री राम के नारों के साथ पूरा क्षेत्र गूंज मंत्र कार्यक्रम में मुख्य व्यक्ति *अर्जुन जी विभाग संगठन मंत्री विश्व हिंदू परिषद, नरेश उनियाल प्रांत गोरक्षा प्रमुख बजरंग दल, राखी छेत्री जिला सयोजिका का दुर्गा वाहिनी, प्रदीप राजपूत, प्रखंड अध्यक्ष विक्रम जी, डोईवाला  अध्यक्ष राकेश सिंह जी, जिला संयोजक अजय व्यास जी, जिला सहसंयोजक अविनाश सिंह, अक्षय त्यागी, शुभम नौटियाल, Vipin Kumar, राहुल राजपूत, भारत ठाकुर ,अमित ठाकुर, रोशन कुमार अनिल गुप्ता, आदि कार्यकर्ता लोग उपस्थित है*


 *संत समागम और हरि कथा को जीवन का सर्वोच्च सौभाग्य बताया*

 *सनातन संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए सरकार प्रतिबद्ध* 

 *उत्तराखंड में धार्मिक और सांस्कृतिक परियोजनाओं को मिल रहा नया विस्तार* 

 *समान नागरिक संहिता और धर्मांतरण विरोधी कानून को बताया ऐतिहासिक कदम* 

 *दून विश्वविद्यालय में ‘सेंटर फॉर हिन्दू स्टडीज’ की स्थापना* 

 *राज्य में केदारखंड और मानसखंड के मंदिरों के सौंदर्यीकरण के साथ ही हरिपुर कालसी में यमुनातीर्थ के पुनरुद्धार का कार्य* 

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मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी आज देहरादून स्थित रेंजर्स ग्राउंड में विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में सम्मिलित हुए। इस अवसर पर उन्होंने उपस्थित संतजनों, श्रद्धालुओं एवं गणमान्य नागरिकों का अभिनंदन करते हुए कार्यक्रम की गरिमा को नमन किया।


*मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी से देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज की शिष्टाचार भेंट* 



 *महाराज जी ने चारधाम यात्रा व्यवस्थाओं में सुधार के लिए मुख्यमंत्री की सराहना की* 



 *सीएम धामी के नेतृत्व में यात्रा हुई अधिक सुव्यवस्थित और सुरक्षित* 



 *श्रद्धालुओं की सुविधाओं में उल्लेखनीय सुधार पर जताई संतुष्टि* 



 *केदारनाथ व हेमकुंड साहिब रोपवे परियोजनाओं की प्रशंसा* 


 *सनातन संस्कृति और आध्यात्मिक जागरण पर हुई सार्थक चर्चा* 





मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी से आज मुख्यमंत्री आवास में प्रसिद्ध कथा वाचक एवं आध्यात्मिक गुरु देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने शिष्टाचार भेंट की।


इस अवसर पर दोनों के बीच सनातन संस्कृति के संरक्षण, आध्यात्मिक जागरूकता के प्रसार तथा समाज में नैतिक मूल्यों के सुदृढ़ीकरण को लेकर विस्तृत चर्चा हुई। मुख्यमंत्री ने महाराज जी के आध्यात्मिक और सामाजिक कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि उनके प्रयासों से समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो रहा है और युवाओं को भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं से जोड़ने में महत्वपूर्ण योगदान मिल रहा है।


मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि उत्तराखंड, जिसे देवभूमि के नाम से जाना जाता है, सदियों से आध्यात्मिक साधना और धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र रहा है। राज्य सरकार इस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और संवर्धन के लिए निरंतर प्रयासरत है। उन्होंने कहा कि राज्य में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ श्रद्धालुओं के लिए आधुनिक सुविधाओं का विकास भी प्राथमिकता में रखा गया है।


इस दौरान देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज ने मुख्यमंत्री के नेतृत्व में राज्य में हो रहे विकास कार्यों एवं सांस्कृतिक संरक्षण के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने विशेष रूप से चारधाम यात्रा की व्यवस्थाओं में किए गए सुधारों की प्रशंसा करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में यात्रा पहले की अपेक्षा अधिक सुव्यवस्थित, सुरक्षित और सुदृढ़ हुई है।


महाराज जी ने कहा कि श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए किए गए प्रयास अत्यंत सराहनीय हैं और इससे देश-विदेश से आने वाले यात्रियों को बेहतर अनुभव प्राप्त हो रहा है। उन्होंने केदारनाथ एवं हेमकुंड साहिब रोपवे परियोजनाओं के लिए मुख्यमंत्री द्वारा किए जा रहे प्रयासों की भी सराहना की और इसे श्रद्धालुओं के लिए एक महत्वपूर्ण पहल बताया।


मुख्यमंत्री ने यह भी उल्लेख किया कि प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन में देश में सनातन संस्कृति और धार्मिक स्थलों के विकास की दिशा में ऐतिहासिक कार्य हो रहे हैं, जिनसे पूरे विश्व में भारत की सांस्कृतिक पहचान और मजबूत हुई है। इसी क्रम में राज्य सरकार भी केदारनाथ, बद्रीनाथ सहित अन्य धार्मिक स्थलों के पुनर्विकास एवं सौंदर्यीकरण के लिए व्यापक कार्य कर रही है।


महाराज जी ने अपने विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक अभियानों की जानकारी भी साझा की और राज्य में भविष्य में आयोजित होने वाले आध्यात्मिक कार्यक्रमों के संबंध में चर्चा की।


मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आश्वस्त किया कि राज्य सरकार ऐसे सभी प्रयासों में सहयोग प्रदान करेगी, जो समाज में सकारात्मक परिवर्तन और आध्यात्मिक चेतना के प्रसार में सहायक हों।

मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने संबोधन में कहा कि श्रीमद्भागवत कथा जैसे आध्यात्मिक आयोजनों में सम्मिलित होना जीवन का अत्यंत सौभाग्यपूर्ण क्षण होता है। उन्होंने संतों के सानिध्य और उनके मार्गदर्शन को जीवन के लिए प्रेरणास्रोत बताते हुए कहा कि ऐसे अवसर व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति और आत्मिक शांति की ओर अग्रसर करते हैं।

 मुख्यमंत्री ने  कथा व्यास ‘धर्मरत्न’ परमपूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए उनके जीवन को भक्ति, साधना और समर्पण का अद्वितीय उदाहरण बताया। मुख्यमंत्री ने कहा कि महाराज जी ने अल्पायु में ही श्रीमद्भागवत महापुराण को कंठस्थ कर समाज को आध्यात्मिक दिशा देने का कार्य प्रारंभ कर दिया था, जो अत्यंत प्रेरणादायक है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि महाराज जी का अनुशासन और तपस्या समाज के लिए अनुकरणीय है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा किए जा रहे सेवा कार्य मानवता के कल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। विशेष रूप से “प्रियाकांत जू विद्या धन योजना” के माध्यम से बेटियों की शिक्षा के लिए किए जा रहे प्रयास सराहनीय हैं और समाज को नई दिशा प्रदान करते हैं।



 मुख्यमंत्री ने श्रीमद्भागवत महापुराण को आध्यात्मिक चेतना का आधार बताते हुए कहा कि यह ग्रंथ भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और धर्म का समन्वय प्रस्तुत करता है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं और उपदेशों के माध्यम से जीवन के गूढ़ रहस्यों का सरल समाधान मिलता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जब भौतिकता की दौड़ में मनुष्य मानसिक रूप से अशांत है, ऐसे में श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण आंतरिक शांति और आत्मबोध का मार्ग प्रशस्त करता है।


मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में सनातन संस्कृति और आध्यात्मिक धरोहरों के संरक्षण की दिशा में अभूतपूर्व कार्य हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण, केदारनाथ और बद्रीनाथ धामों का पुनर्निर्माण, काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर तथा महाकाल लोक जैसी परियोजनाएं भारत की सांस्कृतिक चेतना को पुनर्स्थापित कर रही हैं।

 मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार भी देवभूमि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित और विकसित करने के लिए निरंतर कार्य कर रही है। केदारखंड और मानसखंड के मंदिरों के सौंदर्यीकरण के साथ ही हरिपुर कालसी में यमुनातीर्थ के पुनरुद्धार का कार्य किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त हरिद्वार-ऋषिकेश कॉरिडोर और शारदा कॉरिडोर जैसी परियोजनाओं के माध्यम से श्रद्धालुओं के लिए आधुनिक सुविधाओं का विकास किया जा रहा है

मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि दून विश्वविद्यालय में ‘सेंटर फॉर हिन्दू स्टडीज’ की स्थापना कर भारतीय संस्कृति, दर्शन और इतिहास के अध्ययन को बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार सनातन मूल्यों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और इसी क्रम में धर्मांतरण विरोधी कानून लागू किया गया है। साथ ही समानता और न्याय की स्थापना हेतु समान नागरिक संहिता लागू करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया है।

उन्होंने अंत में कहा कि सरकार समाज में समरसता, सांस्कृतिक गौरव और आध्यात्मिक चेतना को सुदृढ़ करने के लिए निरंतर कार्य करती रहेगी।

इस अवसर पर विभिन्न संत-महात्मा, विश्व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट के पदाधिकारी, जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

  श्री हनुमान जन्मोत्सव 02 अप्रैल विशेष

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हनुमान जी की माता अंजनि के पूर्व जन्म की कहानी

कहते हैं कि माता अंजनि पूर्व जन्म में देवराज इंद्र के दरबार में अप्सरा पुंजिकस्थला थीं। ‘बालपन में वो अत्यंत सुंदर और स्वभाव से चंचल थी एक बार अपनी चंचलता में ही उन्होंने तपस्या करते एक तेजस्वी ऋषि के साथ अभद्रता कर दी थी।

गुस्से में आकर ऋषि ने पुंजिकस्थला को श्राप दे दिया कि जा तू वानर की तरह स्वभाव वाली वानरी बन जा, ऋषि के श्राप को सुनकर पुंजिकस्थला ऋषि से क्षमा याचना मांगने लगी, तब ऋषि ने कहा कि तुम्हारा वह रूप भी परम तेजस्वी होगा।

तुमसे एक ऐसे पुत्र का जन्म होगा जिसकी कीर्ति और यश से तुम्हारा नाम युगों-युगों तक अमर हो जाएगा, अंजनि को वीर पुत्र का आशीर्वाद मिला।

*श्री हनुमानजी की बाल्यावस्था*

ऋषि के श्राप से त्रेता युग मे अंजना मे नारी वानर के रूप मे धरती पे जन्म लेना पडा इंद्र जिनके हाथ में पृथ्वी के सृजन की कमान है, स्वर्ग में स्थित इंद्र के दरबार (महल) में हजारों अप्सरा (सेविकाएं) थीं, जिनमें से एक थीं अंजना (अप्सरा पुंजिकस्थला) अंजना की सेवा से प्रसन्न होकर इंद्र ने उन्हें मनचाहा वरदान मांगने को कहा, अंजना ने हिचकिचाते हुए उनसे कहा कि उन पर एक तपस्वी साधु का श्राप है, अगर हो सके तो उन्हें उससे मुक्ति दिलवा दें। इंद्र ने उनसे कहा कि वह उस श्राप के बारे में बताएं, क्या पता वह उस श्राप से उन्हें मुक्ति दिलवा दें।  

अंजना ने उन्हें अपनी कहानी सुनानी शुरू की, अंजना ने कहा ‘बालपन में जब मैं खेल रही थी तो मैंने एक वानर को तपस्या करते देखा, मेरे लिए यह एक बड़ी आश्चर्य वाली घटना थी, इसलिए मैंने उस तपस्वी वानर पर फल फेंकने शुरू कर दिए, बस यही मेरी गलती थी क्योंकि वह कोई आम वानर नहीं बल्कि एक तपस्वी साधु थे।    

मैंने उनकी तपस्या भंग कर दी और क्रोधित होकर उन्होंने मुझे श्राप दे दिया कि जब भी मुझे किसी से प्रेम होगा तो मैं वानर बन जाऊंगी। मेरे बहुत गिड़गिड़ाने और माफी मांगने पर उस साधु ने कहा कि मेरा चेहरा वानर होने के बावजूद उस व्यक्ति का प्रेम मेरी तरफ कम नहीं होगा’। अपनी कहानी सुनाने के बाद अंजना ने कहा कि अगर इंद्र देव उन्हें इस श्राप से मुक्ति दिलवा सकें तो वह उनकी बहुत आभारी होंगी। इंद्र देव ने उन्हें कहा कि इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए अंजना को धरती पर जाकर वास करना होगा, जहां वह अपने पति से मिलेंगी। शिव के अवतार को जन्म देने के बाद अंजना को इस श्राप से मुक्ति मिल जाएगी।

इंद्र की बात मानकर अंजना धरती पर आईं और केसरी से विवाह - इंद्र की बात मानकर अंजना धरती पर चली आईं, एक शाप के कारण उन्हें नारी वानर के रूप मे धरती पे जन्म लेना पडा। उस शाप का प्रभाव शिव के अन्श को जन्म देने के बाद ही समाप्त होना था। और एक शिकारन के तौर पर जीवन यापन करने लगीं। जंगल में उन्होंने एक बड़े बलशाली युवक को शेर से लड़ते देखा और उसके प्रति आकर्षित होने लगीं, जैसे ही उस व्यक्ति की नजरें अंजना पर पड़ीं, अंजना का चेहरा वानर जैसा हो गया। अंजना जोर-जोर से रोने लगीं, जब वह युवक उनके पास आया और उनकी पीड़ा का कारण पूछा तो अंजना ने अपना चेहरा छिपाते हुए उसे बताया कि वह बदसूरत हो गई हैं। अंजना ने उस बलशाली युवक को दूर से देखा था लेकिन जब उसने उस व्यक्ति को अपने समीप देखा तो पाया कि उसका चेहरा भी वानर जैसा था।

अपना परिचय बताते हुए उस व्यक्ति ने कहा कि वह कोई और नहीं वानर राज केसरी हैं जो जब चाहें इंसानी रूप में आ सकते हैं। अंजना का वानर जैसा चेहरा उन दोनों को प्रेम करने से नहीं रोक सका और जंगल में केसरी और अंजना ने विवाह कर लिया।

केसरी एक शक्तिशाली वानर थे जिन्होने एक बार एक भयंकर हाथी को मारा था। उस हाथी ने कई बार असहाय साधु-संतों को विभिन्न प्रकार से कष्ट पँहुचाया था। तभी से उनका नाम केसरी पढ़ गया, 

"केसरी" का अर्थ होता है सिंह। उन्हे "कुंजर सुदान"(हाथी को मारने वाला) के नाम से भी जाना जाता है।

*पंपा सरोवर*

अंजना और मतंग ऋषि - पुराणों में कथा है कि केसरी और अंजना ने विवाह कर लिया पर संतान सुख से वंचित थे । अंजना अपनी इस पीड़ा को लेकर मतंग ऋषि के पास गईं, तब मंतग ऋषि ने उनसे कहा-पप्पा (कई लोग इसे पंपा सरोवर भी कहते हैं) सरोवर के पूर्व में नरसिंह आश्रम है, उसकी दक्षिण दिशा में नारायण पर्वत पर स्वामी तीर्थ है वहाँ जाकर उसमें स्नान करके, बारह वर्ष तक तप एवं उपवास करने पर तुम्हें पुत्र सुख की प्राप्ति होगी। 

अंजना को पवन देव का वरदान*

मतंग रामायण कालीन एक ऋषि थे, जो शबरी के गुरु थे। अंजना ने मतंग ऋषि एवं अपने पति केसरी से आज्ञा लेकर तप किया था बारह वर्ष तक केवल वायु पर ही जीवित रही, एक बार अंजना ने “शुचिस्नान” करके सुंदर वस्त्राभूषण धारण किए। तब वायु देवता ने अंजना की तपस्या से प्रसन्न होकर उस समय पवन देव ने उसके कर्णरन्ध्र में प्रवेश कर उसे वरदान दिया, कि तेरे यहां सूर्य, अग्नि एवं सुवर्ण के समान तेजस्वी, वेद-वेदांगों का मर्मज्ञ, विश्वन्द्य महाबली पुत्र होगा।

अंजना को भगवान शिव का वरदान*

अंजना ने मतंग ऋषि एवं अपने पति केसरी से आज्ञा लेकर नारायण पर्वत पर स्वामी तीर्थ के पास, अपने आराध्य शिव की तपस्या में मग्न थीं । शिव की आराधना कर रही थीं तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें वरदान मांगने को कहा, अंजना ने शिव को कहा कि साधु के श्राप से मुक्ति पाने के लिए उन्हें शिव के अवतार को जन्म देना है, इसलिए शिव बालक के रूप में उनकी कोख से जन्म लें। 

 (कर्नाटक राज्य के दो जिले कोप्पल और बेल्लारी में रामायण काल का प्रसिद्ध किष्किंधा)

‘तथास्तु’ कहकर शिव अंतर्ध्यान हो गए। इस घटना के बाद एक दिन अंजना शिव की आराधना कर रही थीं और दूसरी तरफ अयोध्या में, इक्ष्वाकु वंशी महाराज अज के पुत्र और अयोध्या के महाराज दशरथ, अपनी तीन रानियों के कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी साथ पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए, श्रृंगी ऋषि को बुलाकर 'पुत्र कामेष्टि यज्ञ' के साथ यज्ञ कर रहे थे।

यज्ञ की पूर्णाहुति पर स्वयं अग्नि देव ने प्रकट होकर श्रृंगी को खीर का एक स्वर्ण पात्र (कटोरी) दिया और कहा "ऋषिवर! यह खीर राजा की तीनों रानियों को खिला दो। राजा की इच्छा अवश्य पूर्ण होगी।" जिसे तीनों रानियों को खिलाना था लेकिन इस दौरान एक चमत्कारिक घटना हुई, एक पक्षी उस खीर की कटोरी में थोड़ा सा खीर अपने पंजों में फंसाकर ले गया और तपस्या में लीन अंजना के हाथ में गिरा दिया। अंजना ने शिव का प्रसाद समझकर उसे ग्रहण कर लिया।

हनुमान जी का जन्म त्रेता युग मे अंजना के पुत्र के रूप मे, चैत्र शुक्ल की पूर्णिमा की महानिशा में हुआ।

*अन्य कथा अनुसार हनुमान अवतार*

सामान्यत: लंकादहन के संबंध में यही माना जाता है कि  सीता की खोज करते हुए लंका पहुंचे और रावण के पुत्र सहित अनेक राक्षसों का अंत कर दिया। तब रावण के पुत्र मेघनाद ने श्री हनुमान को ब्रह्मास्त्र छोड़कर काबू किया और रावण ने श्री हनुमान की पूंछ में आग लगाने का दण्ड दिया। तब उसी जलती पूंछ से श्री हनुमान ने लंका में आग लगा रावण का दंभ चूर किया। किंतु पुराणों में लंकादहन के पीछे भी एक ओर रोचक कथा जुड़ी है, जिसके कारण श्री हनुमान ने पूंछ से लंका में आग लगाई।

*श्री हनुमान शिव अवतार है।*

शिव से ही जुड़ा है यह रोचक प्रसंग। एक बार माता पार्वती की इच्छा पर शिव ने कुबेर से सोने का सुंदर महल का निर्माण करवाया। किंतु रावण इस महल की सुंदरता पर मोहित हो गया। वह ब्राह्मण का वेश रखकर शिव के पास गया। उसने महल में प्रवेश के लिए शिव-पार्वती से पूजा कराकर दक्षिणा के रूप में वह महल ही मांग लिया। भक्त को पहचान शिव ने प्रसन्न होकर वह महल दान दे दिया।

दान में महल प्राप्त करने के बाद रावण के मन में विचार आया कि यह महल असल में माता पार्वती के कहने पर बनाया गया। इसलिए उनकी सहमति के बिना यह शुभ नहीं होगा। तब उसने शिवजी से माता पार्वती को भी मांग लिया और भोलेभंडारी शिव ने इसे भी स्वीकार कर लिया। जब रावण उस सोने के महल सहित मां पार्वती को ले जाना लगा। तब अचंभित और दुखी माता पार्वती ने विष्णु को स्मरण किया और उन्होंने आकर माता की रक्षा की।

जब माता पार्वती अप्रसन्न हो गई तो शिव ने अपनी गलती को मानते हुए मां पार्वती को वचन दिया कि त्रेतायुग में मैं वानर रूप हनुमान का अवतार लूंगा उस समय तुम मेरी पूंछ बन जाना। जब मैं माता सीता की खोज में इसी सोने के महल यानी लंका जाऊंगा तो तुम पूंछ के रूप में लंका को आग लगाकर रावण को दण्डित करना।

हनुमान जी की प्रसिद्धि कथा*

अंजना के पुत्र होने के कारण ही हनुमान

जी को अंजनेय नाम से भी जाना जाता है

जिसका अर्थ होता है 'अंजना द्वारा उत्पन्न'। माता श्री अंजनी और कपिराज

श्री केसरी हनुमानजी को अतिशय प्रेम करते थे।

श्री हनुमानजी को सुलाकर वो फल-फूल लेने गये थे इसी समय बाल हनुमान भूख एवं अपनी माता की अनुपस्थिति में भूख के कारण आक्रन्द करने लगे। इसी दौरान उनकी नजर क्षितिज पर पड़ी। सूर्योदय हो रहा था। बाल हनुमान को लगा की यह कोई लाल फल है। (तेज और पराक्रम के लिए कोई अवस्था नहीं होती)।

यहां पर तो श्री हनुमान जी के रुप में

माताश्री अंजनी के गर्भ से प्रत्यक्ष शिवशंकर अपने ग्यारहवें रुद्र में लीला कर रहे थे और श्री पवनदेव ने उनके उड़ने की शक्ति भी प्रदान की थी। जब शिशु हनुमान को भूख लगी तो वे उगते हुये सूर्य को फल समझकर उसे पकड़ने आकाश में उड़ने लगे। उस लाल फल को लेने के लिए हनुमानजी वायुवेग से आकाश में उड़ने लगे। उनको देखकर देव, दानव सभी विस्मयतापूर्वक कहने लगे कि बाल्यावस्था में एसे पराक्रम दिखाने वाला यौवनकाल में क्या नहीं करेगा। उधर भगवान सूर्य ने उन्हें अबोध शिशु समझकर अपने तेज से नहीं जलने दिया। जिस समय हनुमान सूर्य को पकड़ने के लिये लपके, उसी समय राहु

सूर्य पर ग्रहण लगाना चाहता था।हनुमानजी ने सूर्य के ऊपरी भाग में जब राहु का स्पर्श किया तो वह भयभीत होकर वहाँ से भाग गया। उसने इन्द्र के पास जाकर शिकायत की "देवराज! आपने मुझे अपनी क्षुधा शान्त करने के साधन के रूप में सूर्य और चन्द्र दिये थे। आज अमावस्या के दिन जब मैं सूर्य को ग्रस्त करने गया तब देखा कि दूसरा राहु सूर्य को पकड़ने जा रहा है।"

राहु की बात सुनकर इन्द्र घबरा गये और उसे साथ लेकर सूर्य की ओर चल पड़े। राहु को देखकर हनुमानजी सूर्य को छोड़ राहु पर झपटे। राहु ने इन्द्र को रक्षा के लिये पुकारा तो उन्होंने हनुमानजी पर वज्रायुध से प्रहार किया जिससे वे एक पर्वत पर गिरे और उनकी बायीं ठुड्डी टूट गई। हनुमान की यह दशा देखकर वायुदेव

को क्रोध आया। उन्होंने उसी क्षण अपनी गति रोक दिया। इससे संसार की कोई

भी प्राणी साँस न ले सकी और सब पीड़ा से तड़पने लगे। तब सारे सुर, असुर, यक्ष, किन्नर आदि ब्रह्मा जी की शरण में गये। ब्रह्मा उन सबको लेकर वायुदेव के पास गये। वे मूर्छत हनुमान को गोद में लिये उदास बैठे थे। जब ब्रह्माजी ने उन्हें सचेत किया तो वायुदेव ने अपनी गति का संचार करके सभी प्राणियों की पीड़ा दूर की।

तभी श्री ब्रह्माजी ने श्री हनुमानजी को वरदान दिया कि इस बालक को कभी ब्रह्मशाप नहीं लगेगा, कभी भी उनका एक भी अंग शस्तर नहीं होगा, ब्रह्माजीने अन्य देवताओं से भी कहा कि इस बालक को आप सभी वरदान दें तब देवराज इंन्द्रदेव ने हनुमानजी के गले में कमल की माला पहनाते हुए कहा की मेरे वज्रप्रहार के कारण इस बालक की हनु (दाढ़ी) टूट गई है इसीलिए इन कपिश्रेष्ठ का नाम आज से हनुमान रहेगा और मेरा वज्र भी इस बालक को नुकसान न पहुंचा सके ऐसा वज्र से कठोर होगा। श्री सूर्यदेव ने भी कहा कि इस बालक को में अपना तेज प्रदान करता हूं और मैं इसको शस्त्र-समर्थ मर्मज्ञ बनाता हुं ।

*हनुमानजी के कुछ नाम एवं उनका अर्थ*

हनुमानजी को मारुति, बजरंगबली इत्यादि नामों से भी जानते हैं।  मरुत शब्द से ही मारुति शब्द की उत्पत्ति हुई है। महाभारत में हनुमानजी का उल्लेख मारुतात्मज के नाम से किया गया है। हनुमानजी का अन्य एक नाम है, बजरंगबली। बजरंगबली यह शब्द व्रजांगबली के अपभ्रंश से बना है। जिनमें वज्र के समान कठोर अस्त्र का सामना करनेकी शक्ति है, वे व्रजांगबली है। जिस प्रकार लक्ष्मण से लखन, कृष्ण से किशन ऐसे सरल नाम लोगों ने अपभ्रंश कर उपयोगमें लाए, उसी प्रकार व्रजांगबली का अपभ्रंश बजरंगबली हो गया।

*हनुमानजी की विशेषताएं*

अनेक संतों ने समाज में हनुमानजी की उपासना को प्रचलित किया है। ऐसे हनुमान जी के संदर्भ में समर्थ रामदास स्वामी कहते हैं, ‘हनुमानजी हमारे देवता हैं ।’ हनुमानजी शक्ति, युक्ति एवं भक्ति का प्रतीक हैं। इसलिए समर्थ रामदासस् वामी ने हनुमानजी की उपासना की प्रथा आरंभ की। महाराष्ट्र में उनके द्वारा स्थापित ग्यारह मारुति प्रसिद्ध हैं। साथ ही संत तुलसीदास ने उत्तर भारत में मारुति के अनेक मंदिर स्थापित किए तथा उनकी उपासना दृढ की। दक्षिण भारत में मध्वाचार्य को मारुति का अवतार माना जाता है। इनके साथ ही अन्य कई संतों ने अपनी विविध रचनाओं द्वारा समाज के समक्ष मारुति का आदर्श रखा है।

1).  *शक्तिमानता*

हनुमानजी सर्वशक्तिमान देवता हैं। जन्म लेते ही हनुमानजी ने सूर्यको निगलनेके लिए उडान भरी। इससे यह स्पष्ट होता है कि, वायुपुत्र अर्थात वायुतत्त्व से उत्पन्न हनुमानजी, सूर्यपर अर्थात तेज तत्त्व पर विजय प्राप्त करने में सक्षम थे। पृथ्वी, आप, तेज, वायु एवं आकाश तत्त्वों में से तेज तत्त्व की तुलना में वायुतत्त्व अधिक सूक्ष्म है अर्थात अधिक शक्तिमान है। सर्व देवताओंमें केवल हनुमानजीको ही अनिष्ट शक्तियां कष्ट नहीं दे सकतीं। लंकामें लाखों राक्षस थे, तब भी वे हनुमानजीका कुछ नहीं बिगाड पाएं। इससे हम हनुमानजीकी शक्तिका अनुमान लगा सकते हैं।

1). *भूतों के स्वामी*

हनुमानजी भूतों के स्वामी माने जाते हैं। किसी को भूत बाधा हो, तो उस व्यक्ति को हनुमानजी के मंदिर ले जाते हैं। साथ ही हनुमानजी से संबंधित स्तोत्र जैसे हनुमत्कवच, भीमरूपी स्तोत्र अथवा हनुमानचालीसा का पाठ करनेके लिए कहते हैं ।

2). *भक्त*

साधना में जिज्ञासु, मुमुक्षु, साधक, शिष्य एवं भक्त ऐसे उन्नति के चरण होते हैं। इसमें भक्त यह अंतिम चरण है। भक्त अर्थात वह जो भगवानसे विभक्त नहीं है। हनुमानजी भगवान श्रीराम से पूर्णतया एकरूप हैं। जब भी नवविधा भक्ति में से दास्य भक्ति का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण देना होता है, तब हनुमानजी का उदाहरण दिया जाता है। वे अपने प्रभु राम के लिए प्राण अर्पण करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं । प्रभु श्रीराम की सेवा की तुलना में उन्हें सब कुछ कौडी के मोल लगता है। हनुमान सेवक एवं सैनिक का एक सुंदर सम्मिश्रण हैं। स्वयं सर्वशक्तिमान होते हुए भी वे, अपने-आपको श्रीरामजीका दास कहलवाते थ। उनकी भावना थी कि उनकी शक्ति भी श्रीरामजी की ही शक्ति है। मान अर्थात शक्ति एवं भक्तिका संगम।

3). *मनोविज्ञान में निपुण एवं राजनीति में कुशल*

अनेक प्रसंगों में सुग्रीव इत्यादि वानर ही नहीं, वरन् राम भी हनुमानजी से परामर्श करते थे। लंका में प्रथम ही भेंट में हनुमानजी ने सीता के मन में अपने प्रति विश्वास निर्माण किया। इन प्रसंगों से हनुमानजी की बुद्धिमानता एवं मनोविज्ञान में निपुणता स्पष्ट होती है। लंकादहन कर हनुमानजी ने रावण की प्रजा में रावणके सामर्थ्य के प्रति अविश्वास उत्पन्न किया। इस बातसे उनकी राजनीति-कुशलता स्पष्ट होती है।

4.  *जितेंद्रिय*

 सीता को ढूंढने जब हनुमानजी रावण के अंतःपुर में गए, तो उस समय की उनकी मनः स्थिति थी, उनके उच्च चरित्र का सूचक है। इस संदर्भ में वे स्वयं कहते हैं, ‘सर्व रावण पत्नियों को निःशंक लेटे हुए मैंने देखा; परंतु उन्हें देखने से मेरे मन में विकार उत्पन्न नहीं हुआ।’ 

वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड 11.42-43

इंद्रियजीत होने के कारण हनुमानजी रावणपुत्र इंद्रजीत को भी पराजित कर सके। तभी से इंद्रियों पर विजय पाने हेतु हनुमानजी की उपासना बतायी गई।

5).  *भक्तों की इच्छा पूर्ण करने वाले*

*हनुमानजी को इच्छा पूर्ण करने वाले देवता मानते हैं, इसलिए व्रत रखने वाले अनेक स्त्री-पुरुष हनुमानजी की मूर्ति की श्रद्धापूर्वक निर्धारित परिक्रमा करते हैं।*

*कई लोगों को आश्चर्य होता है कि, जब किसी कन्या का विवाह निश्चित न हो रहा हो, तो उसे ब्रह्मचारी हनुमानजी की उपासना करने के लिए कहा जाता है। वास्तव में अत्युच्च स्तर के देवताओं में ‘ब्रह्मचारी’ या ‘विवाहित’ जैसा कोई भेद नहीं होता। ऐसा अंतर मानव-निर्मित है। मनोविज्ञान के आधार पर कुछ लोगों की यह गलत धारणा होती है कि, सुंदर, बलवान पुरुष से विवाह की कामना से कन्याएं हनुमानजी की उपासना करती हैं।परंतु वास्तविक कारण कुछ इस प्रकार है। लगभग 30 प्रतिशत व्यक्तियों का विवाह भूतबाधा, जादू-टोना इत्यादि अनिष्ट शक्तियों के प्रभावके कारण नहीं हो पाता। हनुमानजी की उपासना करने से ये कष्ट दूर हो जाते हैं एवं उनका वि

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जौनपुर:



/शहर के प्राचीनतम शिक्षण संस्थान राजा श्री कृष्ण दत्त इंटर कॉलेज के 28 जनवरी 1987 को हिंदी विभाग में नियुक्त श्री अशोक कुमार तिवारी जी का आज विद्यालय के नवनिर्मित नीता कुंवर सभागार में एक भव्य विदाई समारोह आयोजित किया गया जिसमें प्रधानाचार्य डॉक्टर संजय चौबे ने अशोक कुमार तिवारी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की चर्चा करते हुए विद्यालय के प्रति समर्पण भाव की सराहना की। महाविद्यालय एवं इंटर कॉलेज के प्रबंधक डॉ सत्यराम प्रजापति ने सेवा में निवृत्त प्रवक्ता के संस्थान के प्रति लगाव से अन्य शिक्षकों को सीख लेने का संदेश दिया। राज पीजी कॉलेज के वर्तमान प्राचार्य प्रोफेसर शंभू राम ने अध्यापकों से गुरुतर दायित्व का निर्वहन करते हुए छात्रों की संख्या एवं पठन-पाठन के प्रति समर्पित भाव के लिए तत्पर रहने का सुझाव दिया। कॉलेज के उपप्रबंधक जियाराम यादव ने तिवारी जी के शुभ स्वास्थ्य एवं उत्तम जीवन की कामना की। विद्यालय की पूर्व प्रधानाचार्य प्रेमचंद जी ने "जिंदगी कांटों का सफर है।हौसला इसकी पहचान है रास्ते पर तो सभी चलते हैं जो रास्ता बनाए उसे इंसान कहते हैं।।" के साथ एक अध्यापक के दायित्व का बोध कराया।

राज पी जी कॉलेज के पूर्व प्राचार्य एवं एन सी सी के संघीय अधिकारी प्रोफेसर(कैप्टन) डॉ अखिलेश्वर शुक्ला ने कहा कि शिक्षक (गुरु) कभी सेवानिवृत्ति नहीं होता किसी भी शिक्षक का सामाजिक दायित्व कभी समाप्त नहीं होता विश्व विकास के साथ विनाश की स्थिति ना आवे इसका ध्यान शिक्षक समाज को विशेष रूप से रखना चाहिए। कार्यक्रम का सफल संचालन कॉलेज के एन सी सी के संघीय अधिकारी लेफ्टिनेंट बृजभूषण यादव ने किया। विदाई समारोह से अभिभूत शिक्षक अशोक तिवारी ने इस भव्य आयोजन के लिए प्रबंधक ,प्रधानाचार्य, आगंतुक अतिथियों एवं विद्यालय के सभी शिक्षकों के प्रति गदगद भाव से आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर कॉलेज के वरिष्ठ प्रवक्ता  अंजनी कुमार श्रीवास्तव,डॉ विश्वनाथ यादव, डॉ बृजेश कुमार सिंह, डॉक्टर रमेश चंद्र, राघवेंद्र सिंह, राम प्रताप, सत्य प्रकाश सिंह, पवन कुमार साहू,संतलाल,आनंद कुमार तिवारी,रमेश कुमार त्रिपाठी,नागेंद्र प्रसाद,अनिल कुमार यादव,यादव सुभाष,संजय सिंह विनय ओझा,ऋषिकेश, सूरज, पूजा सिंह, रंजना प्रजापति, ज्योति सिंह, रंजना चौरसिया, लिपिक सुभाष कुमार मिश्रा सहित विद्यालय के समस्त शिक्षक एवं शिक्षणेत्तर कर्मचारी उपस्थित रहे।


ऋषिकेश : 

raided education officer doiwala


उत्तराखंड में भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए सतर्कता अधिष्ठान (विजिलेंस) देहरादून की टीम ने डोईवाला के उपखंड शिक्षा अधिकारी को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार किया है। मामले में महिला सहयोगी को भी पकड़ा है। इस कार्रवाई से शिक्षा विभाग में हड़कंप की स्थिति है।

जानकारी के मुताबिक बुधवार को हरिद्वार-देहरादून रोड स्थित नेपाली फार्म तिराहे पर विजिलेंस टीम ने सुनियोजित तरीके से छापा मारकर आरोपी अधिकारी को दबोचा। आरोपी की पहचान धनवीर सिंह बिष्ट के रूप में हुई है, जो वर्तमान में उप शिक्षा अधिकारी एवं प्रभारी खंड शिक्षा अधिकारी, डोईवाला के पद पर तैनात थे।

इस मामले में थाना सतर्कता सेक्टर देहरादून में मुकदमा संख्या 7/2026 दर्ज किया गया है। आरोपियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 (संशोधित 2018) की धारा 7 के तहत कार्रवाई की जा रही है।

1 लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए पकड़ा

सूत्रों के अनुसार, आरोपी अधिकारी शिकायतकर्ता से 1 लाख रुपए की रिश्वत मांग रहे थे। यह रकम गंगा वैली जूनियर हाईस्कूल, ऋषिकेश में शिक्षा का अधिकार के तहत पढ़ रहे छात्रों की प्रतिपूर्ति (रिइम्बर्समेंट) के बिल पास कराने के एवज में मांगी गई थी। विजिलेंस की ट्रैप टीम ने मौके पर ही आरोपी को रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार कर लिया।

इस मामले में एक अन्य आरोपी पुष्पांजलि, पत्नी पंकज शर्मा, निवासी डालनवाला, देहरादून को भी गिरफ्तार किया गया है। वह वर्तमान में स्वामी उत्तरांचल मॉडर्न स्कूल, गुमानीवाला, ऋषिकेश से जुड़ी हुई बताई जा रही हैं।

विजिलेंस विभाग के अधिकारियों के अनुसार, मामले की गहन जांच जारी है और आने वाले दिनों में इससे जुड़े अन्य खुलासे भी हो सकते हैं।

विजिलेंस की इस सख्त कार्रवाई से सरकारी विभागों में पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

 

जल्द  झूले-फिसलपट्टी से युक्त होगा आदर्श प्राथमिक विद्यालय न.5

संदीप सिंह रावत

DM pauri swati Bhadoriya



आज चैत्र शुक्ल चतुर्दशी  अप्रैल 1 को विद्यालयों में नए शैक्षणिक सत्र के अंतर्गत प्रवेशोत्सव के रूप में मनाया गया। पौड़ी नगर में आदर्श प्राथमिक विद्यालय नंबर 5 के बाल विद्यार्थियों के लिए यह एक यादगार अवसर रहा।


जहा नई कक्षा, नई पुस्तके प्राप्त हुई वही अपने समक्ष जिला।अधिकारी  स्वाति एस भदौरिया से संवाद और प्रोत्साहन पाकर बाल विद्यार्थी उत्साह से लबरेज नजर आए।


बच्चो की खुशी तब दोगुनी हो गई जब जिला अधिकारी ने विद्यालय परिसर में झूले और फिसलपट्टी ना होने पर जल्द बच्चो के शारीरिक विकास और खेल कूद के मद्देनजर जल्द इनको स्थापित करने के लिए संबंधित शिक्षा अधिकारी को निर्देश दिए।


*जिलाधिकारी ने बच्चों से किया आत्मीय संवाद, बच्चों के सर्वांगीण विकास हेतु स्कूल के प्लेइंग एरिया में झूला -फिसलपट्टी इत्यादि लगाने हेतु प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए।


ज्ञात रहे जनपद पौड़ी में शैक्षणिक सत्र 2026-27  प्राथमिक से लेकर इंटरमीडिएट तक जिले के सभी राजकीय विद्यालयों में प्रवेश उत्सव के तहत छात्र-छात्राओं का स्वागत किया गया और उन्हें निःशुल्क पाठ्य पुस्तकें वितरित की गईं। 


इस बार विशेष पहल के तहत सत्र के प्रथम दिन ही विद्यार्थियों को नयी पुस्तकों की उपलब्धता सुनिश्चित की गयी, जिससे पढ़ाई का क्रम बिना किसी विलंब के प्रारंभ हो सके।


जनपद स्तरीय कार्यक्रम का शुभारंभ जिलाधिकारी स्वाति एस. भदौरिया ने राजकीय आदर्श प्राथमिक विद्यालय संख्या पांच, पौड़ी में किया। उन्होंने नन्हें विद्यार्थियों को स्वयं पुस्तकें वितरित करते हुए उनसे आत्मीय संवाद भी किया और उनके उज्जवल भविष्य के लिए प्रेरित भी किया।


विद्यालय परिसर में इस दौरान उल्लासपूर्ण माहौल देखने को मिला और बच्चों ने भी पूरे उत्साह के साथ कार्यक्रम में भागीदारी की। 


जिलाधिकारी स्वाति एस भदौरिया ने अपने संबोधन में कहा कि समय पर पाठ्य सामग्री उपलब्ध होना शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इससे विद्यार्थियों को शुरुआत से ही पढ़ाई में निरंतरता मिलती है और उनका आत्मविश्वास भी बढ़ता है। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि सभी विद्यालयों में पुस्तक वितरण का कार्य शीघ्र और सुचारु रूप से पूर्ण किया जाए।


उन्होंने शिक्षा विभाग के अधिकारियों को निर्देशित किया कि विद्यालय के खेल क्षेत्र में बच्चों के मनोरंजन के लिए झूले, फिसलपट्टी लगाने हेतु शीघ्र प्रस्ताव तैयार कर उपलब्ध कराएं, ताकि विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास को प्रोत्साहन मिल सके।


जिला शिक्षाधिकारी (प्रारंभिक) अंशुल बिष्ट ने बताया कि जनपद के सभी विद्यालयों में प्रवेश उत्सव के साथ-साथ पुस्तक वितरण सुनिश्चित किया गया है। उन्होंने कहा कि समय पर पुस्तकों की उपलब्धता से बच्चों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण मिलेगा और उनकी पढ़ाई अधिक प्रभावी होगी।


कार्यक्रम में प्रधानाचार्य आरती बहुगुणा, वार्ड सदस्य दिनेश रावत, अरविन्द रावत सहित विद्यालय परिवार एवं छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।

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