लैंगिक न्याय को आधी सदी तक नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता
हम आज भी किसी भी नीति को न्यायालय में चुनौती नहीं दे सकते। क्या इसका अर्थ यह है कि यह लैंगिक अन्याय अगली सदी तक भी जारी रहेगा?
भारत को आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 की आवश्यकता क्यों है?
इसके पीछे सभी वैध और संवैधानिक कारण तथा तर्क मौजूद हैं। कानून के समक्ष समानता और लैंगिक आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव न होना हमारे संविधान द्वारा हमें दिया गया वचन है।
समावेशी लोकतांत्रिक भावना को प्रत्येक कल्याणकारी सरकार द्वारा महत्व दिया जाना और कायम रखा जाना चाहिए।
निरंतर सकारात्मक सुधार तथा लैंगिक दृष्टि से विशिष्ट और सशक्त कानूनों का निर्माण हमारे राष्ट्र को और मजबूत बनाएगा।
भारत के भविष्य की नींव रखने वाली महिलाओं को सम्मान देना कोई दान या कृपा नहीं है—यह संवैधानिक न्याय है।
लगभग पाँच दशकों से भारत की आंगनवाड़ी व्यवस्था कुपोषण, विकासात्मक असमानता, मातृ स्वास्थ्य की समस्याओं और शैक्षिक वंचना के विरुद्ध देश की लड़ाई में अग्रिम पंक्ति में खड़ी रही है। एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) की शुरुआत 1975 में एक महत्वाकांक्षी उद्देश्य के साथ की गई थी—हर बच्चे को जीवन की एक समान और बेहतर शुरुआत देना तथा मानव विकास के सबसे महत्वपूर्ण चरणों में माताओं और परिवारों को सहायता प्रदान करना।
पचास वर्ष बाद आंगनवाड़ी कार्यकर्ता भारतीय कल्याणकारी राज्य के सबसे अधिक दिखाई देने वाले चेहरों में से एक बन चुकी हैं।
फिर भी इस व्यवस्था के केंद्र में एक गंभीर विरोधाभास मौजूद है।
भारत आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं से महत्वपूर्ण सार्वजनिक जिम्मेदारियाँ निभाने की अपेक्षा करता है, लेकिन आज तक उन्हें उनके अधिकारों, दर्जे, गरिमा और सामाजिक सुरक्षा को मान्यता देने वाला कोई व्यापक वैधानिक ढाँचा नहीं दिया गया है।
इस विरोधाभास को तत्काल दूर किया जाना आवश्यक है।
अब भारत को आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 की आवश्यकता है।
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भारत की दिखाई देने वाली कल्याण व्यवस्था के पीछे अदृश्य कार्यबल
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएँ केवल पूरक पोषण वितरित करने या रजिस्टर बनाए रखने का कार्य नहीं करतीं। दशकों के दौरान उनकी जिम्मेदारियों में अत्यंत व्यापक विस्तार हुआ है।
वे निम्नलिखित कार्यों में योगदान देती हैं:
- प्रारंभिक बाल देखभाल और शिक्षा;
- पोषण एवं बच्चों की वृद्धि की निगरानी;
- मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य;
- टीकाकरण तथा स्वास्थ्य संबंधी जन-जागरूकता;
- पूर्व-प्राथमिक शिक्षा;
- सामुदायिक जागरूकता;
- संवेदनशील एवं असुरक्षित बच्चों की पहचान;
- गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली महिलाओं को सहायता;
- सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन;
- आँकड़ों का संग्रह एवं रिपोर्टिंग;
- आपदा एवं आपातकालीन परिस्थितियों में सामुदायिक सेवाएँ; तथा
- बच्चों के शारीरिक, संज्ञानात्मक, भावनात्मक और सामाजिक विकास की मजबूत नींव तैयार करना।
व्यवहार में, किसी कमजोर या वंचित परिवार के बच्चे या माँ के लिए आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अक्सर राज्य और नागरिक के बीच पहला संस्थागत संपर्क-बिंदु होती हैं।
राज्य अपनी नीतियों को जमीनी स्तर तक पहुँचाने और लागू करने के लिए इन महिलाओं पर निर्भर करता है। लेकिन राज्य और इन कार्यकर्ताओं के बीच कानूनी संबंध आज भी अत्यंत अपर्याप्त है।
यह केवल रोजगार नीति का मुद्दा नहीं है।
यह लैंगिक न्याय, सामाजिक न्याय और संवैधानिक शासन का प्रश्न है।
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पचास वर्षों की सेवा का अर्थ पचास वर्षों की असुरक्षा नहीं होना चाहिए
ICDS की प्रयोगात्मक यात्रा अब आधी सदी पार कर चुकी है। इस अवधि में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की कई पीढ़ियाँ इस व्यवस्था में आईं, अपने समुदायों की सेवा की और सेवानिवृत्त हुईं या व्यवस्था से बाहर चली गईं—लेकिन उन्हें उस प्रकार की वैधानिक मान्यता नहीं मिली, जो सामान्यतः दीर्घकालीन सार्वजनिक सेवा से जुड़ी होती है।
जिस कार्यकर्ता से राज्य के प्रति जवाबदेह रहने की अपेक्षा की जाती है, वह राज्य की कानूनी संरचना में अदृश्य नहीं रहनी चाहिए।
मूल प्रश्न बहुत सरल है:
“यदि राज्य किसी महिला को महत्वपूर्ण सार्वजनिक जिम्मेदारियाँ सौंपता है, तो फिर वही राज्य उसे उस गरिमा, सुरक्षा और कानूनी मान्यता से क्यों वंचित करे, जो सार्वजनिक कार्य से जुड़ी होती है?”
ऐसी कार्यकर्ताओं को “मानदेय आधारित”, “स्वैच्छिक” या “अंशकालिक” कहना मात्र इस प्रश्न का उत्तर नहीं हो सकता, जबकि उनके वास्तविक कार्य व्यापक, निरंतर और सरकारी कार्यक्रमों के लिए अनिवार्य हैं।
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लैंगिक प्रश्न को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता
आंगनवाड़ी कार्यबल में महिलाओं की संख्या अत्यधिक है। इसलिए पर्याप्त वैधानिक मान्यता का लगातार अभाव एक स्पष्ट लैंगिक आयाम रखता है।
जब आवश्यक सार्वजनिक जिम्मेदारियाँ व्यवस्थित रूप से महिलाओं को सौंपी जाती हैं, लेकिन उनके कार्य को औपचारिक रोजगार से कमतर माना जाता है, तो समाज एक पुरानी व्यवस्था को दोहराने का जोखिम उठाता है:
जब समाज को महिलाओं के श्रम की आवश्यकता होती है, तब उनके काम को आवश्यक माना जाता है; लेकिन जब महिलाएँ उसी काम के अधिकार माँगती हैं, तब उसके मूल्य को कम आँका जाता है।
यही कारण है कि आंगनवाड़ी सुधार को केवल वेतन या प्रशासनिक व्यय के दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए।
इसे लैंगिक-संवेदनशील शासन के दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए।
एक आधुनिक कल्याणकारी राज्य एक ओर महिला सशक्तीकरण की बात नहीं कर सकता और दूसरी ओर लाखों महिलाओं से अनिवार्य सार्वजनिक कार्य करवाते हुए उनके दर्जे, पारिश्रमिक, सामाजिक सुरक्षा, कार्यस्थल की गरिमा और शिकायत निवारण के लिए व्यापक वैधानिक ढाँचा उपलब्ध कराने से पीछे नहीं हट सकता।
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“मानदेय” से अधिकार-आधारित सार्वजनिक सेवा की ओर
प्रस्तावित कानून के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों में से एक यह है कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को परिभाषित करने के लिए किस प्रकार की भाषा का इस्तेमाल किया जाता है।
मानदेय-आधारित मॉडल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि हो सकती है, लेकिन भारत की कल्याणकारी जिम्मेदारियाँ पिछले दशकों में नाटकीय रूप से बदल चुकी हैं।
आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं से राज्य की अपेक्षाएँ बढ़ी हैं। उनकी जिम्मेदारियाँ बढ़ी हैं। रिपोर्टिंग की आवश्यकताएँ बढ़ी हैं। डिजिटल जिम्मेदारियाँ बढ़ी हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा प्रारंभिक बाल विकास से संबंधित जिम्मेदारियाँ बढ़ी हैं।
इसलिए कानूनी ढाँचे को भी उसी के अनुरूप विकसित होना चाहिए।
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 को स्पष्ट वैधानिक दर्जा स्थापित करना चाहिए और न्यूनतम सेवा शर्तों की गारंटी देनी चाहिए, ताकि यह कार्यबल मुख्यतः कार्यपालिका की योजनाओं, सरकारी आदेशों या समय-समय पर लिए जाने वाले नीतिगत निर्णयों पर निर्भर न रहे।
उद्देश्य केवल मानदेय बढ़ाना नहीं होना चाहिए।
उद्देश्य अधिकार-आधारित मान्यता स्थापित करना होना चाहिए।
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अलग आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम क्यों आवश्यक है?
एक व्यापक केंद्रीय कानून एक समान कानूनी आधार प्रदान कर सकता है, साथ ही संघीय ढाँचे का सम्मान करते हुए राज्यों को राष्ट्रीय न्यूनतम स्तर से अधिक लाभ देने की स्वतंत्रता भी दे सकता है।
ऐसा कानून निम्नलिखित प्रावधान स्थापित कर सकता है:
1. वैधानिक मान्यता
प्रत्येक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका को सार्वजनिक कल्याण वितरण प्रणाली के भीतर कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त दर्जा दिया जाना चाहिए।
2. उचित और पारदर्शी पारिश्रमिक
पारिश्रमिक वास्तविक रूप से निभाई जाने वाली जिम्मेदारियों के अनुरूप होना चाहिए और एक पारदर्शी वैधानिक व्यवस्था के माध्यम से समय-समय पर संशोधित किया जाना चाहिए।
3. सामाजिक सुरक्षा
कानून के अंतर्गत निम्नलिखित के लिए लागू करने योग्य व्यवस्था होनी चाहिए:
- पेंशन अथवा सेवानिवृत्ति लाभ;
- भविष्य निधि या इसके समकक्ष सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था;
- स्वास्थ्य बीमा;
- मातृत्व लाभ;
- दिव्यांगता से सुरक्षा;
- दुर्घटना मुआवजा;
- जीवन बीमा; तथा
- अन्य उपयुक्त कल्याणकारी सुरक्षा।
4. कार्य की गरिमा
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को किसी अस्थायी या आसानी से बदले जा सकने वाले कार्यक्रम-कर्मचारी की तरह नहीं माना जाना चाहिए।
वह प्रशिक्षित सामुदायिक स्तर की कार्यकर्ता हैं, जो भारत की मानव पूंजी के विकास में योगदान देती हैं।
5. सुरक्षित कार्य परिस्थितियाँ
अधिनियम में कार्यस्थल की सुरक्षा, आधारभूत सुविधाओं, स्वच्छता, पेयजल, बाल देखभाल सुविधाओं, उपकरणों तथा व्यावसायिक जोखिमों से सुरक्षा के न्यूनतम मानक निर्धारित किए जाने चाहिए।
6. उत्पीड़न और भेदभाव से सुरक्षा
एक मजबूत शिकायत-निवारण व्यवस्था स्थापित की जानी चाहिए, जिसमें यौन उत्पीड़न, मौखिक दुर्व्यवहार, धमकी, मनमानी अनुशासनात्मक कार्रवाई और भेदभाव से प्रभावी सुरक्षा शामिल हो।
7. उचित कार्यभार
राज्य को यह सिद्धांत स्वीकार करना चाहिए कि अतिरिक्त सरकारी जिम्मेदारियों के साथ संबंधित संसाधन, प्रशिक्षण और पारिश्रमिक भी उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
बिना संबंधित संस्थागत सहायता के लगातार जिम्मेदारियाँ बढ़ाते जाना अपने आप में संरचनात्मक शोषण का एक रूप है।
8. प्रशिक्षण और व्यावसायिक विकास
आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को संरचित प्रशिक्षण, प्रमाणन, करियर प्रगति और व्यावसायिक उन्नति के अवसर उपलब्ध होने चाहिए।
9. शोषण के बजाय तकनीक का उपयोग
डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य प्रशासनिक बोझ को कम करना होना चाहिए, न कि पहले से ही अत्यधिक कार्यभार झेल रही कार्यकर्ताओं पर अतिरिक्त बोझ डालना।
अधिनियम में उपयुक्त डिजिटल बुनियादी ढाँचे, तकनीकी सहायता, कनेक्टिविटी और प्रशिक्षण के अधिकार को मान्यता दी जानी चाहिए।
10. लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व
आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिसके माध्यम से उनके प्रतिनिधि उनकी कार्य परिस्थितियों से संबंधित नीतिगत चर्चाओं में भाग ले सकें।
जो लोग नीतियों को लागू करते हैं, उन्हें उन नीतियों के निर्माण में अपनी आवाज रखने का अधिकार भी होना चाहिए।
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प्रारंभिक बाल विकास राष्ट्र निर्माण है
इस कानून का महत्व बताने का एक और महत्वपूर्ण कारण है।
आंगनवाड़ी व्यवस्था केवल एक कल्याणकारी कार्यक्रम नहीं है।
यह भारत की मानव पूंजी में निवेश है।
बच्चे के जीवन के शुरुआती वर्ष उसके स्वास्थ्य, सीखने की क्षमता, संज्ञानात्मक विकास और भविष्य के शैक्षिक परिणामों को गहराई से प्रभावित करते हैं। इसलिए प्रारंभिक बाल देखभाल और शिक्षा का प्रभाव आंगनवाड़ी केंद्र से कहीं आगे तक जाता है।
जो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता किसी बच्चे के पोषण, सीखने, स्वास्थ्य जागरूकता और सामाजिक विकास में सहायता करती हैं, वे भारत के भविष्य के कार्यबल, नागरिकता और लोकतंत्र के निर्माण में भाग ले रही हैं।
कल के लोकतंत्र की गुणवत्ता आंशिक रूप से आज के बचपन की गुणवत्ता पर निर्भर करती है।
यदि भारत एक ज्ञानवान, स्वस्थ और सामाजिक रूप से जिम्मेदार पीढ़ी चाहता है, तो उसे उस पीढ़ी की नींव मजबूत करने वाली महिलाओं को भी मजबूत करना होगा।
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*संवैधानिक प्रश्न* — क्या हम देश की 1.3 करोड़ आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को नज़रअंदाज़ करके लैंगिक न्याय प्राप्त कर सकते हैं?
*आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम की माँग भारत की संवैधानिक दृष्टि* में भी निहित है।
*भारतीय संविधान राज्य को सामाजिक और आर्थिक न्याय, समानता, गरिमा तथा जनता के कल्याण के प्रति प्रतिबद्ध करता है। अनुच्छेद 39, 42 और 47 जैसे नीति-निर्देशक तत्व* - आजीविका, मानवीय कार्य परिस्थितियों, मातृत्व संरक्षण, पोषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति राज्य की जिम्मेदारी को दर्शाते हैं।
यदि आवश्यक सार्वजनिक कार्य करने वाला मुख्यतः महिला कार्यबल संरचनात्मक रूप से कमतर आँका जाता रहे, तो समानता की संवैधानिक प्रतिज्ञा पूर्ण नहीं मानी जा सकती।
इसलिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए:
“क्या भारत आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को वैधानिक अधिकार देने का खर्च वहन कर सकता है?”
अधिक उचित प्रश्न यह है:
“क्या कोई कल्याणकारी राज्य उन्हें वैधानिक अधिकार न देने की कीमत वहन कर सकता है?”
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राष्ट्रीय न्यूनतम मानक, और राज्यों को उससे बेहतर करने की स्वतंत्रता
चूँकि आंगनवाड़ी सेवाएँ केंद्र और राज्य—दोनों स्तरों की सरकारी संरचनाओं के माध्यम से संचालित होती हैं, प्रस्तावित कानून को अधिकारों और सुरक्षा का एक राष्ट्रीय न्यूनतम स्तर निर्धारित करना चाहिए।
राज्यों को इस न्यूनतम स्तर से अधिक लाभ देने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।
केवल इसलिए कि राष्ट्रीय मानक मौजूद है, किसी राज्य को न्यूनतम स्तर पर रुकने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए।
इसके बजाय, अधिनियम सहकारी संघवाद का ऐसा ढाँचा तैयार कर सकता है जिसमें केंद्र लागू करने योग्य राष्ट्रीय मानक स्थापित करे और राज्य उनमें सुधार एवं नवाचार करें।
इससे भारत के अलग-अलग हिस्सों में समान प्रकार की सार्वजनिक जिम्मेदारियाँ निभाने वाली कार्यकर्ताओं की कार्य परिस्थितियों में मौजूद अत्यधिक असमानताओं को भी कम किया जा सकेगा।
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एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता आयोग की स्थापना
प्रस्तावित अधिनियम के अंतर्गत एक स्वतंत्र राष्ट्रीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ता आयोग भी स्थापित किया जा सकता है।
इसके कार्यों में शामिल हो सकते हैं:
- वैधानिक अधिकारों के क्रियान्वयन की निगरानी;
- पारिश्रमिक और सेवा शर्तों की समीक्षा;
- संरचनात्मक शिकायतों की जाँच;
- वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित करना;
- कार्यबल संबंधी नीतियों पर सरकारों को सलाह देना;
- लैंगिक असमानताओं का अध्ययन;
- प्रशिक्षण और आधारभूत सुविधाओं में सुधार की सिफारिश करना; तथा
- यह सुनिश्चित करना कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की आवाज नीति-निर्माताओं तक पहुँचे।
इसी प्रकार की व्यवस्थाएँ राज्य स्तर पर भी स्थापित की जा सकती हैं।
ऐसी संस्था आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को प्रशासनिक निर्णयों की केवल निष्क्रिय प्राप्तकर्ता होने की स्थिति से निकालकर भारत की सामाजिक-विकास व्यवस्था में मान्यता प्राप्त हितधारक के रूप में स्थापित करेगी।
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*मान्यता की लागत बनाम उपेक्षा की कीमत*
कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि वैधानिक मान्यता देने से सरकारों पर भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा।
लेकिन इस तर्क को उन सेवाओं के संदर्भ में देखना आवश्यक है, जो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता पहले से प्रदान कर रही हैं।
पोषण संबंधी हस्तक्षेप, मातृ सहायता, पूर्व-प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य जागरूकता और प्रारंभिक बाल सेवाएँ ऐसी लागत नहीं हैं जिनका कोई प्रतिफल नहीं होता। ये ऐसे निवेश हैं जो भविष्य में सामाजिक और आर्थिक लागतों को कम कर सकते हैं।
जिस बच्चे को उचित पोषण और प्रारंभिक शिक्षा मिलती है, उसे केवल कल्याणकारी सहायता नहीं मिल रही होती; भारत उसके भविष्य की उत्पादकता और नागरिकता में निवेश कर रहा होता है।
इसी प्रकार, उस महिला को सामाजिक सुरक्षा देना, जिसने दशकों तक अपने समुदाय की सेवा की है, कोई उदारता नहीं है।
यह उसके द्वारा पहले लैंगिक न्याय को आधी सदी तक नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता
ICDS के 50 वर्ष, 1.3 करोड़ आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, और फिर भी कोई कानून नहीं
हम आज भी किसी भी नीति को न्यायालय में चुनौती नहीं दे सकते। क्या इसका अर्थ यह है कि यह लैंगिक अन्याय अगली सदी तक भी जारी रहेगा?
भारत को आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 की आवश्यकता क्यों है?
*इसके पीछे सभी वैध और संवैधानिक कारण तथा तर्क मौजूद हैं*। कानून के समक्ष समानता और लैंगिक आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव न होना हमारे संविधान द्वारा हमें दिया गया वचन है।
*समावेशी लोकतांत्रिक* भावना को प्रत्येक कल्याणकारी सरकार द्वारा महत्व दिया जाना और कायम रखा जाना चाहिए।
*निरंतर सकारात्मक सुधार तथा लैंगिक दृष्टि से विशिष्ट और सशक्त कानूनों का निर्माण हमारे राष्ट्र को और मजबूत बनाएगा*।
भारत के भविष्य की नींव रखने वाली महिलाओं को सम्मान देना कोई दान या कृपा नहीं है—यह संवैधानिक न्याय है।
लगभग पाँच दशकों से भारत की आंगनवाड़ी व्यवस्था कुपोषण, विकासात्मक असमानता, मातृ स्वास्थ्य की समस्याओं और शैक्षिक वंचना के विरुद्ध देश की लड़ाई में अग्रिम पंक्ति में खड़ी रही है। एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) की शुरुआत 1975 में एक महत्वाकांक्षी उद्देश्य के साथ की गई थी—हर बच्चे को जीवन की एक समान और बेहतर शुरुआत देना तथा मानव विकास के सबसे महत्वपूर्ण चरणों में माताओं और परिवारों को सहायता प्रदान करना।
पचास वर्ष बाद आंगनवाड़ी कार्यकर्ता भारतीय कल्याणकारी राज्य के सबसे अधिक दिखाई देने वाले चेहरों में से एक बन चुकी हैं।
फिर भी इस व्यवस्था के केंद्र में एक गंभीर विरोधाभास मौजूद है।
भारत आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं से महत्वपूर्ण सार्वजनिक जिम्मेदारियाँ निभाने की अपेक्षा करता है, लेकिन आज तक उन्हें उनके अधिकारों, दर्जे, गरिमा और सामाजिक सुरक्षा को मान्यता देने वाला कोई व्यापक वैधानिक ढाँचा नहीं दिया गया है।
इस विरोधाभास को तत्काल दूर किया जाना आवश्यक है।
अब भारत को आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 की आवश्यकता है।
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भारत की दिखाई देने वाली कल्याण व्यवस्था के पीछे अदृश्य कार्यबल
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएँ केवल पूरक पोषण वितरित करने या रजिस्टर बनाए रखने का कार्य नहीं करतीं। दशकों के दौरान उनकी जिम्मेदारियों में अत्यंत व्यापक विस्तार हुआ है।
वे निम्नलिखित कार्यों में योगदान देती हैं:
- प्रारंभिक बाल देखभाल और शिक्षा;
- पोषण एवं बच्चों की वृद्धि की निगरानी;
- मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य;
- टीकाकरण तथा स्वास्थ्य संबंधी जन-जागरूकता;
- पूर्व-प्राथमिक शिक्षा;
- सामुदायिक जागरूकता;
- संवेदनशील एवं असुरक्षित बच्चों की पहचान;
- गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली महिलाओं को सहायता;
- सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन;
- आँकड़ों का संग्रह एवं रिपोर्टिंग;
- आपदा एवं आपातकालीन परिस्थितियों में सामुदायिक सेवाएँ; तथा
- बच्चों के शारीरिक, संज्ञानात्मक, भावनात्मक और सामाजिक विकास की मजबूत नींव तैयार करना।
व्यवहार में, किसी कमजोर या वंचित परिवार के बच्चे या माँ के लिए आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अक्सर राज्य और नागरिक के बीच पहला संस्थागत संपर्क-बिंदु होती हैं।
राज्य अपनी नीतियों को जमीनी स्तर तक पहुँचाने और लागू करने के लिए इन महिलाओं पर निर्भर करता है। लेकिन राज्य और इन कार्यकर्ताओं के बीच कानूनी संबंध आज भी अत्यंत अपर्याप्त है।
यह केवल रोजगार नीति का मुद्दा नहीं है।
यह लैंगिक न्याय, सामाजिक न्याय और संवैधानिक शासन का प्रश्न है।
*पचास वर्षों की सेवा का अर्थ पचास वर्षों की असुरक्षा नहीं होना चाहिए*?
ICDS की प्रयोगात्मक यात्रा अब आधी सदी पार कर चुकी है। इस अवधि में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की कई पीढ़ियाँ इस व्यवस्था में आईं, अपने समुदायों की सेवा की और सेवानिवृत्त हुईं या व्यवस्था से बाहर चली गईं—लेकिन उन्हें उस प्रकार की वैधानिक मान्यता नहीं मिली, जो सामान्यतः दीर्घकालीन सार्वजनिक सेवा से जुड़ी होती है।
जिस कार्यकर्ता से राज्य के प्रति जवाबदेह रहने की अपेक्षा की जाती है, वह राज्य की कानूनी संरचना में अदृश्य नहीं रहनी चाहिए।
*मूल प्रश्न बहुत सरल है:*
“यदि राज्य किसी महिला को महत्वपूर्ण सार्वजनिक जिम्मेदारियाँ सौंपता है, तो फिर वही राज्य उसे उस गरिमा, सुरक्षा और कानूनी मान्यता से क्यों वंचित करे, जो सार्वजनिक कार्य से जुड़ी होती है?”
ऐसी कार्यकर्ताओं को “मानदेय आधारित”, “स्वैच्छिक” या “अंशकालिक” कहना मात्र इस प्रश्न का उत्तर नहीं हो सकता, जबकि उनके वास्तविक कार्य व्यापक, निरंतर और सरकारी कार्यक्रमों के लिए अनिवार्य हैं।
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लैंगिक प्रश्न को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता
आंगनवाड़ी कार्यबल में महिलाओं की संख्या अत्यधिक है। इसलिए पर्याप्त वैधानिक मान्यता का लगातार अभाव एक स्पष्ट लैंगिक आयाम रखता है।
जब आवश्यक सार्वजनिक जिम्मेदारियाँ व्यवस्थित रूप से महिलाओं को सौंपी जाती हैं, लेकिन उनके कार्य को औपचारिक रोजगार से कमतर माना जाता है, तो समाज एक पुरानी व्यवस्था को दोहराने का जोखिम उठाता है:
जब समाज को महिलाओं के श्रम की आवश्यकता होती है, तब उनके काम को आवश्यक माना जाता है; लेकिन जब महिलाएँ उसी काम के अधिकार माँगती हैं, तब उसके मूल्य को कम आँका जाता है।
यही कारण है कि आंगनवाड़ी सुधार को केवल वेतन या प्रशासनिक व्यय के दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए।
इसे *लैंगिक-संवेदनशील* शासन के दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए।
एक आधुनिक कल्याणकारी राज्य एक ओर महिला सशक्तीकरण की बात नहीं कर सकता और दूसरी ओर लाखों महिलाओं से अनिवार्य सार्वजनिक कार्य करवाते हुए उनके दर्जे, पारिश्रमिक, सामाजिक सुरक्षा, कार्यस्थल की गरिमा और शिकायत निवारण के लिए व्यापक वैधानिक ढाँचा उपलब्ध कराने से पीछे नहीं हट सकता।
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*“मानदेय” से अधिकार-आधारित सार्वजनिक सेवा की ओर*-
प्रस्तावित कानून के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों में से एक यह है कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को परिभाषित करने के लिए किस प्रकार की भाषा का इस्तेमाल किया जाता है।
*मानदेय-आधारित मॉडल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि हो सकती है, लेकिन भारत की कल्याणकारी जिम्मेदारियाँ पिछले दशकों में नाटकीय रूप से बदल चुकी हैं*।
आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं से राज्य की अपेक्षाएँ बढ़ी हैं। उनकी जिम्मेदारियाँ बढ़ी हैं। रिपोर्टिंग की आवश्यकताएँ बढ़ी हैं। डिजिटल जिम्मेदारियाँ बढ़ी हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा प्रारंभिक बाल विकास से संबंधित जिम्मेदारियाँ बढ़ी हैं।
इसलिए कानूनी ढाँचे को भी उसी के अनुरूप विकसित होना चाहिए।
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 को स्पष्ट वैधानिक दर्जा स्थापित करना चाहिए और न्यूनतम सेवा शर्तों की गारंटी देनी चाहिए, ताकि यह कार्यबल मुख्यतः कार्यपालिका की योजनाओं, सरकारी आदेशों या समय-समय पर लिए जाने वाले नीतिगत निर्णयों पर निर्भर न रहे।
उद्देश्य केवल मानदेय बढ़ाना नहीं होना चाहिए।
उद्देश्य अधिकार-आधारित मान्यता स्थापित करना होना चाहिए।
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*अलग आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम क्यों आवश्यक है?*
*एक व्यापक केंद्रीय कानून एक समान कानूनी आधार प्रदान कर सकता है, साथ ही संघीय ढाँचे का सम्मान करते हुए राज्यों को राष्ट्रीय न्यूनतम स्तर से अधिक लाभ देने की स्वतंत्रता भी दे सकता है।*
ऐसा कानून निम्नलिखित प्रावधान स्थापित कर सकता है:
1. वैधानिक मान्यता
प्रत्येक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका को सार्वजनिक कल्याण वितरण प्रणाली के भीतर कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त दर्जा दिया जाना चाहिए।
2. उचित और पारदर्शी पारिश्रमिक
पारिश्रमिक वास्तविक रूप से निभाई जाने वाली जिम्मेदारियों के अनुरूप होना चाहिए और एक पारदर्शी वैधानिक व्यवस्था के माध्यम से समय-समय पर संशोधित किया जाना चाहिए।
3. सामाजिक सुरक्षा
कानून के अंतर्गत निम्नलिखित के लिए लागू करने योग्य व्यवस्था होनी चाहिए:
- पेंशन अथवा सेवानिवृत्ति लाभ;
- भविष्य निधि या इसके समकक्ष सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था;
- स्वास्थ्य बीमा;
- मातृत्व लाभ;
- दिव्यांगता से सुरक्षा;
- दुर्घटना मुआवजा;
- जीवन बीमा; तथा
- अन्य उपयुक्त कल्याणकारी सुरक्षा।
4. कार्य की गरिमा
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को किसी अस्थायी या आसानी से बदले जा सकने वाले कार्यक्रम-कर्मचारी की तरह नहीं माना जाना चाहिए।
वह प्रशिक्षित सामुदायिक स्तर की कार्यकर्ता हैं, जो भारत की मानव पूंजी के विकास में योगदान देती हैं।
5. सुरक्षित कार्य परिस्थितियाँ
अधिनियम में कार्यस्थल की सुरक्षा, आधारभूत सुविधाओं, स्वच्छता, पेयजल, बाल देखभाल सुविधाओं, उपकरणों तथा व्यावसायिक जोखिमों से सुरक्षा के न्यूनतम मानक निर्धारित किए जाने चाहिए।
6. उत्पीड़न और भेदभाव से सुरक्षा
एक मजबूत शिकायत-निवारण व्यवस्था स्थापित की जानी चाहिए, जिसमें यौन उत्पीड़न, मौखिक दुर्व्यवहार, धमकी, मनमानी अनुशासनात्मक कार्रवाई और भेदभाव से प्रभावी सुरक्षा शामिल हो।
7. उचित कार्यभार
राज्य को यह सिद्धांत स्वीकार करना चाहिए कि अतिरिक्त सरकारी जिम्मेदारियों के साथ संबंधित संसाधन, प्रशिक्षण और पारिश्रमिक भी उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
बिना संबंधित संस्थागत सहायता के लगातार जिम्मेदारियाँ बढ़ाते जाना अपने आप में संरचनात्मक शोषण का एक रूप है।
8. प्रशिक्षण और व्यावसायिक विकास
आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को संरचित प्रशिक्षण, प्रमाणन, करियर प्रगति और व्यावसायिक उन्नति के अवसर उपलब्ध होने चाहिए।
9. शोषण के बजाय तकनीक का उपयोग
डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य प्रशासनिक बोझ को कम करना होना चाहिए, न कि पहले से ही अत्यधिक कार्यभार झेल रही कार्यकर्ताओं पर अतिरिक्त बोझ डालना।
अधिनियम में उपयुक्त डिजिटल बुनियादी ढाँचे, तकनीकी सहायता, कनेक्टिविटी और प्रशिक्षण के अधिकार को मान्यता दी जानी चाहिए।
10. लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व
आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिसके माध्यम से उनके प्रतिनिधि उनकी कार्य परिस्थितियों से संबंधित नीतिगत चर्चाओं में भाग ले सकें।
जो लोग नीतियों को लागू करते हैं, उन्हें उन नीतियों के निर्माण में अपनी आवाज रखने का अधिकार भी होना चाहिए।
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प्रारंभिक बाल विकास राष्ट्र निर्माण है
इस कानून का महत्व बताने का एक और महत्वपूर्ण कारण है।
आंगनवाड़ी व्यवस्था केवल एक कल्याणकारी कार्यक्रम नहीं है।
यह भारत की मानव पूंजी में निवेश है।
बच्चे के जीवन के शुरुआती वर्ष उसके स्वास्थ्य, सीखने की क्षमता, संज्ञानात्मक विकास और भविष्य के शैक्षिक परिणामों को गहराई से प्रभावित करते हैं। इसलिए प्रारंभिक बाल देखभाल और शिक्षा का प्रभाव आंगनवाड़ी केंद्र से कहीं आगे तक जाता है।
जो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता किसी बच्चे के पोषण, सीखने, स्वास्थ्य जागरूकता और सामाजिक विकास में सहायता करती हैं, वे भारत के भविष्य के कार्यबल, नागरिकता और लोकतंत्र के निर्माण में भाग ले रही हैं।
कल के लोकतंत्र की गुणवत्ता आंशिक रूप से आज के बचपन की गुणवत्ता पर निर्भर करती है।
यदि भारत एक ज्ञानवान, स्वस्थ और सामाजिक रूप से जिम्मेदार पीढ़ी चाहता है, तो उसे उस पीढ़ी की नींव मजबूत करने वाली महिलाओं को भी मजबूत करना होगा।
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*संवैधानिक प्रश्न — क्या हम देश की 1.3 करोड़ आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को नज़रअंदाज़ करके लैंगिक न्याय प्राप्त कर सकते हैं*?
*आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम की माँग भारत की संवैधानिक दृष्टि में भी निहित है*🇮🇳।
*भारतीय संविधान राज्य को सामाजिक और आर्थिक न्याय, समानता, गरिमा तथा जनता के कल्याण के प्रति प्रतिबद्ध करता है। अनुच्छेद 39, 42 और 47 जैसे नीति-निर्देशक तत्व आजीविका, मानवीय कार्य परिस्थितियों, मातृत्व संरक्षण, पोषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति राज्य की जिम्मेदारी को दर्शाते हैं*।
यदि आवश्यक सार्वजनिक कार्य करने वाला मुख्यतः *महिला कार्यबल संरचनात्मक रूप से कमतर आँका जाता रहे, तो समानता की संवैधानिक प्रतिज्ञा पूर्ण नहीं मानी जा सकती*।
*इसलिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए*-:
*“क्या भारत आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को वैधानिक अधिकार देने का खर्च वहन कर सकता है?*”
*अधिक उचित प्रश्न यह है:*-
*“क्या कोई कल्याणकारी राज्य उन्हें वैधानिक अधिकार न देने की कीमत वहन कर सकता है* ?”
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*राष्ट्रीय न्यूनतम मानक, और राज्यों को उससे बेहतर करने की स्वतंत्रता*
*चूँकि आंगनवाड़ी सेवाएँ केंद्र और राज्य—दोनों स्तरों की सरकारी संरचनाओं के माध्यम से संचालित होती हैं, प्रस्तावित कानून को अधिकारों और सुरक्षा का एक राष्ट्रीय न्यूनतम स्तर निर्धारित करना चाहिए।*
राज्यों को इस न्यूनतम स्तर से अधिक लाभ देने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।
केवल इसलिए कि राष्ट्रीय मानक मौजूद है, किसी राज्य को न्यूनतम स्तर पर रुकने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए।
इसके बजाय, अधिनियम सहकारी संघवाद का ऐसा ढाँचा तैयार कर सकता है जिसमें केंद्र लागू करने योग्य राष्ट्रीय मानक स्थापित करे और राज्य उनमें सुधार एवं नवाचार करें।
इससे भारत के अलग-अलग हिस्सों में समान प्रकार की सार्वजनिक जिम्मेदारियाँ निभाने वाली कार्यकर्ताओं की कार्य परिस्थितियों में मौजूद अत्यधिक असमानताओं को भी कम किया जा सकेगा।
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एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता आयोग की स्थापना
प्रस्तावित अधिनियम के अंतर्गत एक स्वतंत्र राष्ट्रीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ता आयोग भी स्थापित किया जा सकता है।
इसके कार्यों में शामिल हो सकते हैं:
- वैधानिक अधिकारों के क्रियान्वयन की निगरानी;
- पारिश्रमिक और सेवा शर्तों की समीक्षा;
- संरचनात्मक शिकायतों की जाँच;
- वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित करना;
- कार्यबल संबंधी नीतियों पर सरकारों को सलाह देना;
- लैंगिक असमानताओं का अध्ययन;
- प्रशिक्षण और आधारभूत सुविधाओं में सुधार की सिफारिश करना; तथा
- यह सुनिश्चित करना कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की आवाज नीति-निर्माताओं तक पहुँचे।
इसी प्रकार की व्यवस्थाएँ राज्य स्तर पर भी स्थापित की जा सकती हैं।
ऐसी संस्था आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को प्रशासनिक निर्णयों की केवल निष्क्रिय प्राप्तकर्ता होने की स्थिति से निकालकर भारत की सामाजिक-विकास व्यवस्था में मान्यता प्राप्त हितधारक के रूप में स्थापित करेगी।
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मान्यता की लागत बनाम उपेक्षा की कीमत
कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि वैधानिक मान्यता देने से सरकारों पर भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा।
लेकिन इस तर्क को उन सेवाओं के संदर्भ में देखना आवश्यक है, जो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता पहले से प्रदान कर रही हैं।
पोषण संबंधी हस्तक्षेप, मातृ सहायता, पूर्व-प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य जागरूकता और प्रारंभिक बाल सेवाएँ ऐसी लागत नहीं हैं जिनका कोई प्रतिफल नहीं होता। ये ऐसे निवेश हैं जो भविष्य में सामाजिक और आर्थिक लागतों को कम कर सकते हैं।
जिस बच्चे को उचित पोषण और प्रारंभिक शिक्षा मिलती है, उसे केवल कल्याणकारी सहायता नहीं मिल रही होती; भारत उसके भविष्य की उत्पादकता और नागरिकता में निवेश कर रहा होता है।
इसी प्रकार, उस महिला को सामाजिक सुरक्षा देना, जिसने दशकों तक अपने समुदाय की सेवा की है, कोई उदारता नहीं है।
यह उसके द्वारा पहले से निर्मित मूल्य की मान्यता है।
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लाभार्थी से हितधारक बनने की ओर
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को अब केवल नौकरशाही व्यवस्था के सबसे निचले स्तर पर खड़ी होकर निर्देशों को लागू करने वाली कर्मचारी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
उन्हें भारत के विकास में हितधारक के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।
वे उन समुदायों को समझती हैं, जहाँ सरकारी कार्यालय शायद कभी पूरी तरह नहीं पहुँच पाते।
वे जानती हैं कि कौन से बच्चे संवेदनशील या असुरक्षित स्थिति में हैं।
वे माताओं, परिवारों और स्थानीय संस्थाओं के साथ निरंतर संपर्क में रहती हैं।
वे कुपोषण, विकास संबंधी कठिनाइयों और सामाजिक समस्याओं को आधिकारिक आँकड़ों में दिखाई देने से पहले ही देख लेती हैं।
उनका ज्ञान एक राष्ट्रीय संसाधन है।
इसलिए भारत को ऐसी व्यवस्था से आगे बढ़ना चाहिए जिसमें आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को केवल योजनाओं को लागू करने के निर्देश दिए जाते हैं। इसके स्थान पर उन्हें सार्वजनिक नीति में व्यावसायिक रूप से मान्यता प्राप्त साझेदार बनाया जाना चाहिए।
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आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 — एक राष्ट्रीय प्रतिबद्धता
प्रस्तावित कानून अंततः पाँच सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए:
मान्यता।
गरिमा।
सुरक्षा।
समानता।
भागीदारी।
अधिनियम को प्रत्येक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका के लिए न्यूनतम वैधानिक ढाँचे की गारंटी देनी चाहिए तथा राज्यों को उससे बेहतर लाभ प्रदान करने में सक्षम बनाना चाहिए।
इसे इस कार्यबल के विशेष लैंगिक आयाम को मान्यता देनी चाहिए तथा लैंगिक-संवेदनशील बजट व्यवस्था और नीतिगत मूल्यांकन को शामिल करना चाहिए।
इसे सामाजिक सुरक्षा, उचित पारिश्रमिक, सुरक्षित कार्यस्थल, शिकायत निवारण, व्यावसायिक विकास और सेवानिवृत्ति सुरक्षा के लिए प्रभावी व्यवस्थाएँ स्थापित करनी चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे एक स्पष्ट संदेश देना चाहिए:
*“जो महिलाएँ भारत के बच्चों का भविष्य बनाती हैं, वे कानूनी रूप से अदृश्य नहीं रह सकतीं।*”
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भारत की *महिलाओं के प्रति प्रतिबद्धता* की एक कसौटी
भारत एक मजबूत, विकसित और *सामाजिक रूप से जिम्मेदार राष्ट्र बनने की आकांक्षा* रखता है।
लेकिन किसी राष्ट्र की शक्ति केवल GDP, बुनियादी ढाँचे या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं मापी जाती।
एक मजबूत राष्ट्र वह है जो उन लोगों की गरिमा की रक्षा करता है, जो उसकी कल्याण व्यवस्था को वास्तव में कार्यशील बनाते हैं।
एक लैंगिक रूप से जिम्मेदार राष्ट्र केवल महिला सशक्तीकरण की बात नहीं करता।
वह महिलाओं को लागू किए जा सकने वाले और प्रभावी अधिकारों के माध्यम से सशक्त बनाता है।
और एक कल्याणकारी राज्य केवल नागरिकों के लिए योजनाएँ नहीं बनाता।
वह उन कार्यकर्ताओं की भी रक्षा करता है, जो इन योजनाओं को नागरिकों तक पहुँचाते हैं।
ICDS के पचास वर्ष पूरे होने के बाद अब समय आ गया है कि हम अस्थायी व्यवस्थाओं और बिखरे हुए प्रशासनिक आदेशों से आगे बढ़ें।
भारत को आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 बनाना चाहिए—एक व्यापक, अधिकार-आधारित और लैंगिक-संवेदनशील कानून, जो आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को सार्वजनिक कल्याण तथा राष्ट्र के विकास में अनिवार्य योगदान देने वाली कर्मियों के रूप में मान्यता दे।
हर सुबह भारत के आंगनवाड़ी केंद्रों के दरवाजे पर खड़ी होने वाली महिलाएँ वास्तव में भारत के भविष्य के दरवाजे पर खड़ी हैं।
अब भारत को उनके साथ खड़ा होना होगा।
*माँग सरल है*:
*ICDS के 50 वर्ष एक कानून की दिशा में आगे बढ़ने चाहिए*।
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के *हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल लगभग 13.31 लाख आंगनवाड़ी कार्यकर्ता* hain ,
लाखों महिला कार्यकर्ता वैधानिक मान्यता की हकदार हैं।
*अनिवार्य सार्वजनिक कार्य* के लिए सम्मानजनक सार्वजनिक-सेवा सुरक्षा मिलनी चाहिए।
और *लैंगिक न्याय के प्रति भारत की प्रतिबद्धता कानून में लागू किए जा सकने वाले अधिकारों के रूप में परिवर्तित होनी चाहिए*।
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 लागू करें।
कार्यकर्ता के लिए।
बच्चे के लिए।
महिला के लिए।
संविधान के लिए।
भारत के भविष्य के लिए।
**लेखिका —
*डॉ. रेनू डी. सिंह
पिछले 45 वर्षों से जेंडर राइट्स एक्टिविस्ट**से निर्मित मूल्य की मान्यता है* l
*लाभार्थी से हितधारक बनने की ओर**आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को अब *केवल नौकरशाही व्यवस्था के सबसे निचले स्तर पर खड़ी होकर निर्देशों को लागू करने वाली कर्मचारी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए*।
उन्हें *भारत के विकास में हितधारक के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए*।
*वे उन समुदायों को समझती हैं, जहाँ सरकारी कार्यालय शायद कभी पूरी तरह नहीं पहुँच पाते*।
वे जानती हैं कि कौन से बच्चे संवेदनशील या असुरक्षित स्थिति में हैं।
वे माताओं, परिवारों और स्थानीय संस्थाओं के साथ निरंतर संपर्क में रहती हैं।
वे कुपोषण, विकास संबंधी कठिनाइयों और सामाजिक समस्याओं को आधिकारिक आँकड़ों में दिखाई देने से पहले ही देख लेती हैं।
*उनका ज्ञान एक राष्ट्रीय संसाधन है*।
इसलिए भारत को ऐसी व्यवस्था से आगे बढ़ना चाहिए जिसमें आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को केवल योजनाओं को लागू करने के निर्देश दिए जाते हैं। इसके स्थान पर उन्हें सार्वजनिक नीति में व्यावसायिक रूप से मान्यता प्राप्त साझेदार बनाया जाना चाहिए।
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*आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 — एक राष्ट्रीय प्रतिबद्धता*
*प्रस्तावित कानून अंततः पाँच सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए*
*मान्यता*।
*गरिमा*
*सुरक्षा*।
*समानता*।
*भागीदारी*।
*अधिनियम को प्रत्येक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका के लिए न्यूनतम वैधानिक ढाँचे की गारंटी देनी चाहिए* तथा राज्यों को उससे बेहतर लाभ प्रदान करने में सक्षम बनाना चाहिए।
इसे *इस कार्यबल के विशेष लैंगिक आयाम को मान्यता* देनी चाहिए तथा *लैंगिक-संवेदनशील बजट व्यवस्था* और *नीतिगत मूल्यांकन* को शामिल करना चाहिए।
इसे *सामाजिक सुरक्षा, उचित पारिश्रमिक, सुरक्षित कार्यस्थल, शिकायत निवारण, व्यावसायिक विकास और सेवानिवृत्ति सुरक्षा के लिए प्रभावी व्यवस्थाएँ* स्थापित करनी चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे एक स्पष्ट संदेश देना चाहिए:
*“जो महिलाएँ भारत के बच्चों का भविष्य बनाती हैं, वे कानूनी रूप से अदृश्य नहीं रह सकतीं।*”
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भारत की *महिलाओं के प्रति प्रतिबद्धता की एक कसौटी*,
*भारत एक मजबूत, विकसित और सामाजिक रूप से जिम्मेदार राष्ट्र बनने की आकांक्षा रखता है*।
लेकिन किसी राष्ट्र की शक्ति केवल GDP, बुनियादी ढाँचे या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं मापी जाती।
एक *मजबूत राष्ट्र* वह है जो उन लोगों की गरिमा की रक्षा करता है, जो उसकी कल्याण व्यवस्था को वास्तव में कार्यशील बनाते हैं।
एक लैंगिक रूप से जिम्मेदार राष्ट्र केवल महिला सशक्तीकरण की बात नहीं करता।
वह महिलाओं को लागू किए जा सकने वाले और *प्रभावी अधिकारों* के माध्यम से सशक्त बनाता है।
और एक कल्याणकारी राज्य केवल नागरिकों के लिए योजनाएँ नहीं बनाता।
वह उन कार्यकर्ताओं की भी रक्षा करता है, जो इन योजनाओं को नागरिकों तक पहुँचाते हैं।
*ICDS के पचास वर्ष पूरे होने के बाद अब समय आ गया है कि हम अस्थायी व्यवस्थाओं और बिखरे हुए प्रशासनिक आदेशों से आगे बढ़ें*।
*भारत को आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026* बनाना चाहिए—एक व्यापक, अधिकार-आधारित और लैंगिक-संवेदनशील कानून, जो आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को सार्वजनिक कल्याण तथा राष्ट्र के विकास में अनिवार्य योगदान देने वाली कर्मियों के रूप में मान्यता दे।
हर सुबह भारत के आंगनवाड़ी केंद्रों के दरवाजे पर खड़ी होने वाली महिलाएँ वास्तव में भारत के भविष्य के दरवाजे पर खड़ी हैं।
*अब भारत को उनके साथ खड़ा होना होगा*।
माँग सरल है:
ICDS के 50 वर्ष एक कानून की दिशा में आगे बढ़ने चाहिए।
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के *हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल लगभग 13.31 लाख आंगनवाड़ी कार्यकर्ता hain* ,
लाखों महिला कार्यकर्ता वैधानिक मान्यता की हकदार हैं।
अनिवार्य सार्वजनिक कार्य के लिए सम्मानजनक सार्वजनिक-सेवा सुरक्षा मिलनी चाहिए।
और लैंगिक न्याय के प्रति भारत की प्रतिबद्धता कानून में लागू किए जा सकने वाले अधिकारों के रूप में परिवर्तित होनी चाहिए।
आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 लागू करें।
कार्यकर्ता के लिए।
बच्चे के लिए।
महिला के लिए।
संविधान के लिए।
भारत के भविष्य के लिए।
**लेखिका*—
*डॉ. रेनू डी. सिंह*
*पिछले 45 वर्षों से *जेंडर राइट्स* *एक्टिविस्ट**. **
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