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आतंक के रास्ते से सत्ता हासिल करने की कोशिश



देश में वर्चस्व की जंग नये रूप में सामने आ रही है। आस्था के नितांत व्यक्तिगत कारक को दूसरों पर थोपने का प्रयास तेजी से चल निकला है। वास्तविक धर्म कहीं खो सा गया है। महापुरुषों के व्दारा कहे गये शब्दों की मनमानी व्याख्यायें सामने आकर उत्तेजना फैलाने का काम कर रहीं हैं। जीवन जीने के ढंग और श्रध्दा के मामलों को तूल देकर दुनिया पर राज करने के मंसूबे पालने वाले आतंक की विना पर लोगों को डराने का काम कर रहे हैं। कश्मीर में एक बार फिर आतंक का तांडव शुरू करके वालों ने गैर मुसलमानों को घाटी से बाहर करने की कोशिशें तेज कर दीं हैं। अतीत को दोहराने के प्रयास किये जा रहे हैं। पाकिस्तान में बैठे आतंक के सौदागर मुस्लिम युवाओं को सब्जबाग दिखाकर गुमराह करने का काम कर रहे हैं। विगत दिनों में जिस तरह का घटनाक्रम सामने आया है, उससे आने वाले तूफान के संकेत सहज ही मिल जाते हैं। कश्मीर में निरंतर हो रही निर्दोष लोगों की हत्याओं पर ओबैसी जैसे लोगों ने खामोशी अख्तिायर कर रखी है। कथित बुध्दिजीवियों की जमात भी कोने में दुबक गई है। वहां मानवाधिकार का मुद्दा गौड हो चुका है। पाकिस्तान के अनेक नागरिकों को आतंकवादी के रूप में काम करते वक्त सेना ने मार गिराया। वहां की धरती से आतंक फैलाने वाली सरकारी और गैर सरकारी मशीनरी के अनेक प्रमाण देश के पास हैं जिन्हें निलज्जता से पाकिस्तान झुठलाता चला आ रहा है। वहां की आईएसआई, सेना और सरकार संयुक्त रूप से नित नये षडयंत्र को अंजाम दे रही है। प्राप्त जानकारी के अनुसार घाटी में 200 लोगों को टारगेट किलिंग के लिए चिन्हित करके सीमा पार से आतंकियों को घाटी में उतारा जा चुका है। गैरमुस्लिम लोगों को डरा धमका कर कश्मीर से खदेडने का फिर से प्रयास किया जाने लगा है। दूसरी ओर देश के अनेक स्थानों पर भी आतंक पनपाने के चिन्ह देखने को मिल रहे हैं। कानपुर दंगों में भी ऐसा ही माहौल देखने को मिला। किसी वक्तव्य का विरोध करने के लिए हिंसा का सहारा लेना कदापि उचित नहीं कहा जा सकता। जुमे की नमाज के बाद पूर्व नियोजित षडयंत्र को अंजाम दिया गया। विरोध प्रदर्शन में दुकानें बंद रखने का निर्णय लेने वालों को स्वयं की दुकानें बंद रखने का तो हक होता है परन्तु किसी दूसरे की दुकान को जबरजस्ती बंद करवाने का हक किसने दे दिया। नाम पूछकर मारपीट करने, गोलियां चलाने, बम से हमला करने, वाहनों को नुकसान पहुंचाने तथा पुलिस पर भी आक्रमण करने जैसी हरकतों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ऐसे लोग पूर्व नियोजित षडयंत्र के तहत इस्लाम की आड लेकर देश को अराजकता की आग में झौंकने की फिराक में  है। विरोध प्रदर्शन के नाम पर हिंसक हो जाने का काम ज्यादातर उन्हीं राज्यों में हो रहा है जहां पर गांधी के सिध्दान्तों पर चलने की कसम खाने वालों की सरकारें हैं या फिर खालिस्तान जैसे मुद्दों को हवा देने वाले हैं। अभी तक रामनवमी, ईद, हनुमान जयंती जैसे पर्वों पर उत्तर प्रदेश में अपेक्षाकृत शान्ति ही रही परन्तु जब देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने कानपुर के आसपास आमद दर्ज की, तभी दंगा भडकाने की प्रयास किया गया। इस तरह की घटनाओं से देश के दूसरे कोने में रहने वाले रहीम के पडोसी रामदीन को भी दबाव में लेने का मनोवैज्ञानिक प्रयोग किया जा रहा है। वातावरण निर्मित करने का काम बहुत तेजी से किया हो रहा है। स्लिीपिंग सेल विकसित किये जा रहे हैं। सिमी से लेकर आईएसआईएस जैसे संगठनों की शाखआओं का विस्तार किया जा रहा है। सोशल मीडिया और इन्टरनेट का सहारा लेकर लोगों को बरगलाने का काम सीमा पार से निरंतर हो रहा है। जबकि इस्लाम की रोशनी में जुल्म करना, निर्दोष और निहत्थे की हत्या करना, दूसरों का माल हडपना, जालिमों का साथ देना, धोखा देना जैसे बिन्दुओं को गलत ठहराया गया है। इन सभी सकारत्मकता को हाशिये पर छोडकर जनबल, धनबल और बाहुबल के आधार पर जुल्म करने वालों की नर्ई फौज तैयार की जा रही है, युवाओं का ब्रेन वाश करके मजहब के मनमाने अर्थ समझाये जा रहे हैं और पैदा की जा रहीं हैं फिदायिनी जमातें। ऐसे लोगों को न केवल पाकिस्तान जैसे राष्ट्रों से संरक्षण मिल रहा है बल्कि पर्दे के पीछे से चीन जैसे देश भी अपनी भागीदारी दर्ज कर रहे हैं, तभी तो लाल सलाम करने वाले स्वयं-भू बुध्दिजीवी तथा टुकडे-टुकडे गैंग किसी कोने में दुबक गये है। गैर मुस्लिम कश्मीरियों को साहस देने के लिए राजनैतिक दल, संगठन या समाज आज घाटी की ओर मार्च नहीं कर रहा है। सरकार को कोसने तक ही उनके कर्तव्यों की इति हो जाती है। मुस्लिम समाज के कुछ बुध्दिजीवियों ने अवश्य बयान जारी करके कश्मीर में हो रही टारगेट किलिंग की निंदा की है। ऐसे में यदि मुस्लिम समाज का राष्ट्रवादी तबका ही कश्मीर जाकर वहां के लोगों को हिम्मत बंधाये, साथ खडा होकर जुल्म की इस नापाक हरकत का विरोध करे और सुरक्षा-तंत्र के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग करे, तो घाटी में शांति बहाली की कोशिशों की गति चार गुनी बढ जायेगी। विरोधी दलों के राष्ट्रीय नेतृत्व से जुडे लोग यदि कश्मीर मुद्दे या फिर दंगा काण्डों आदि के पटाक्षेप की योजनाओं पर सरकार के साथ खडे हो जायें तो कोई कारण नहीं है कि विदेशी षडयंत्रों के तहत फैलाई जा रही अराजकता पर पूर्णविराम न लगे। सत्ता की भूख को विभाजनकारी तुष्टीकरण के निवाले से शांत करने वालों को समझना होगा अब फूट डालो, राज करो की नीति का पानी सिर से ऊपर पहुंच गया है। विधानसभाओं और संसद में पहुंचने वाले विधायक और सांसद अपने-अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने के लिए भेजे जाते हैं न कि पार्टी के आका की चरण वंदन हेतु। राष्ट्र हित को सर्वोच्च प्राथमिकता देने वाले ही वास्तव में जनप्रतिनिधि होते हैं, बाकी की भूमिका तो पार्टी के फरमान पर हाथ उठाने तक ही सीमित होकर रह जाती है। संसद और विधानसभाओं में राष्ट्रहित और लोकहित के मुद्दों पर भी विपक्ष का विरोधात्मक रवैया देखने को मिलता है। सकारात्मक प्रयासों पर भी प्रश्नचिन्ह लगाने वालों को खुद अपने अन्दर झांकना चाहिए। वर्तमान परिस्थितियां गंभीरता ओढती जा रहीं हैं। आतंक के रास्ते से सत्ता हासिल करने की कोशिशें तेज होती जा रहीं हैं। तालिबान की सफलता ने दुनिया के सत्ता-सिध्दान्त बदल दिये हैं। राजनैतिक दलों के आदर्शों में जातिगत, सम्प्रदायगत और क्षेत्रगत कारकों का बाहुल्य हो गया है। ऐसा करने से जातिगत नेताओं, सम्प्रदायगत मुखियों और क्षेत्रगत लोगों का समर्थन प्राप्त करने की मंशा रखने वालों ने राष्ट्र-हित, राष्ट्र-भक्ति और राष्ट्र-उन्नति जैसे सिध्दान्तों को तिलांजलि दे दी है। हमें आत्म अवलोकन करना पडेगा कि व्यक्तिगत स्वार्थ, अह्म की पूर्ति और वैभव की जखीरा हासिल करना ही हमारे जीवन का लक्ष्य है या फिर मानवता के सार्वभौमिक उद्देश्य हेतु राष्ट्र-हित, विश्व-हित और चराचर-हित के लिए कार्य करना। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।

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