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छत्रपति शिवाजी की घर वापसी योजना

शिवाजी जानते थे भारत के हिन्दुओं का धर्मांतरण ही समस्या की सबसे बड़ी जड़ है। उन्होंने हमेशा उन लोगों की मदद की जो हिंदू धर्म में लौटना चाहते थे। यहां तक कि उन्होंने अपनी बेटी की शादी एक ऐसे हिंदू से कर दी, जो अतीत में मुसलमान बना दिया गया था। उन्होंने प्राचीन हिन्दू राजनीतिक प्रथाओं तथा दरबारी शिष्टाचारों को पुनर्जीवित किया और फारसी के स्थान पर मराठी एवं संस्कृत को राजकाज की भाषा बनाया।








 छत्रपति शिवाजी महाराज के निकट साथी, सेनापति नेताजी पालकर जब औरंगजेब के हाथ लगे और उसने उनका जबरन धर्म परिवर्तन कर उसका नाम मोहम्मद कुली खान रख दिया और उनको काबुल में लड़ने के लिए भेज दिया। कुछ समय बाद जब उसे लगा कि अब यह भागकर शिवाजी के पास नहीं जाएगा तो उसने नेताजी पालकर को महाराष्ट्र के सैनिक व्यवस्था में शामिल कर वहां भेज दिया। नेताजी के मन में पुनः हिन्दू धर्म में वापस आने की इच्छा जगी तो वे तुरन्त शिवाजी के पास पहुंच गए। शिवाजी महाराज ने मुसलमान बने मोहम्मद कुली खान (नेताजी पालकर) को ब्राम्हणों की सहायता से पुनः हिन्दू बनाया और उनको अपने परिवार में शामिल कर उनको प्रतिष्ठित किया। 

शिवाजी के राज्याभिषेक समारोह में हिन्दू स्वराज की स्थापना का उद्घोष किया गया था। विजयनगर साम्राज्य के पतन के बाद दक्षिण में यह पहला हिन्दू साम्राज्य था। शिवाजी के परिवार में संस्कृत का ज्ञान अच्छा था और संस्कृत भाषा को बढ़ावा दिया गया था।

 शिवाजी ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अपने किलों के नाम संस्कृत में रखे जैसे कि- सिंधुदुर्ग, प्रचंडगढ़, तथा सुवर्णदुर्ग। उनके राजपुरोहित केशव पंडित स्वयं एक संस्कृत के कवि तथा शास्त्री थे। 

उन्होंने दरबार के कई पुरानी विधियों को पुनर्जीवित किया एवं शासकीय कार्यों में मराठी तथा संस्कृत भाषा के प्रयोग को बढ़ावा दिया।

 महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी के सार्वजनिक त्यौहार की शुरुआत सबसे पहले छत्रपति शिवाजी महाराज ने की थी।

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