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- अब्दुल, असीम और अब्दुल हादी की कूची से जीवंत हो उठी है, कुम्भ नगरी की दीवारें।

- दो माह से जुटे हैं वाल पेंटिंग्स बनाने में।

विजेन्द्र रावत

हरिद्वार:


शाम के करीब आठ बजे अब्दुल कादिर, असीम और अब्दुल हादी पूरी तन्मयता से अपने अपने ब्रुस और कूची के साथ गंगा के किनारे लगी दीवार पर शिव और पार्वती की पेंटिंग बनाने में जुटे हैं।

ये हरिद्वार महाकुंभ में उस टीम का हिस्सा हैं जिन्होने शहर की दीवारों को अपने हुनर से तरह तरह के धार्मिक, सामाजिक और देव भूमि की संस्कृति को दर्शाते चित्रों से उकेरा है। यहां की शानदार वाल पेंटिंग्स कुम्भ के प्रमुख आकर्षणों में से एक है।

ये तीनों युवा जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के फाइन आर्ट्स के द्वितीय वर्ष के छात्र हैं और पिछले दो माह से एक कम्पनी के लिए काम कर रहे हैं, जिसने कुम्भ क्षेत्र में वाल पेंटिंग्स का ठेगा लिया है।

पहली बार हरिद्वार आए तीनों युवाओं को हरिद्वार भा गया है, अब्दुल हादी का कहना है कि यह काम करने आनंद आ रहा है और साथ ही मां गंगा के किनारे बैठकर बेहद सुकून मिलता है।

इन्होंने यहां की दीवारों पर देवी देवताओं की हजारों पेंटिंग्स बना ली है। उनका कहना है कि वे इस बात का खास ख्याल रख रहे हैं कि वे इनकी पेंटिंग्स को धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ही बनाएं, इसके लिए वे आपस में खूब चर्चा करते हैं, धार्मिक पुस्तकों का सहारा लेते हैं,तब जाकर पेंटिंग्स को दीवार पर उकेरते हैं।


फुटपाथो पर बिक रहा है हिन्दू संस्कृति का साहित्य

प्रेम पंचोली


बारह वर्ष बाद होने वाले कुम्भ मेले पर हिन्दू धर्मावालियों की निगाहें टिकी रहती है। हो भी क्यों नहीं! हरिद्वार में लगने वाला कुम्भ ही इसका प्रतिफल है। यही वजह है कि आजकल महाकुम्भ के आयोजन में हिन्दू संस्कृति के कई प्रकाशनो की पुस्तकें यहां बहुत कम मूल्यों पर उपलब्ध है और लोग इन्हें खूब खरीद रहे है।

गोवा की सनातन संस्था इन दिनों हरिद्वार कुम्भ क्षेत्र में स्टाल, व्यक्ति से व्यक्ति के पास जाकर हिन्दू संस्कृति का साहित्य मामूली मूल्य पर बेच रही है। इनके पास देवी-देवताओं की आराधना और सुख-शान्ती के लिए की जाने वाली साधना एवं पूजा-पाठ की छोटी- छोटी पुस्तकें हैं। जिनकी कीमत 10 रू॰ से लेकर 50 रूपय तक है। इन स्वंयसेवकों के पास एक ऐसी पुस्तक है जिसमें आधुनिक भारत के मोबाईय का इस्तेमाल बच्चो को कैसे और कितने समय तक करना चाहिए। इस पुस्तिका की सर्वाधिक बिक्री भी हो रही है।

हरकी पैड़ी पर लगे इस स्टाल पर महाराष्ट्र के एक श्रद्धालु सचिन ने बताया कि यह सामग्री आज की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि हिन्दी में ऐसा साहित्य बहुत कम मिलता है। उन्हें कुम्भ आने पर यह साहित्य मिल गया है, जिसको वे कई सालों से खोज कर थे। सचिन ने एक दर्जन पुस्तकें खरीदी है। जिनमें महिलाओं का सम्मान, बच्चों की देखभाल, शान्ति का पाठ, सुपाच्य भोज्य पदार्थ आदि पुस्तकें हैं। उन्होंने कहा कि वे महाराष्ट्र के एक गांव में स्कूल चलाते है। यह पुस्तकें स्कूल के पुस्तकालय में इस्तेमाल की जायेगी।

सनातन संस्था के समन्वयक कार्तिक सालुंखे ने बताया कि संस्था का मुख्यालय गोवा में है। हरिद्वार महाकुम्भ में उनके 100 स्वंयसेवक हिन्दू संस्कृति से संबधित साहित्य को बहुत कम मूल्य पर लोगो को उपलब्ध करवा रहे हैं। कुम्भ के दौरान वे 100 स्वयंसेवक प्रत्येक दिन अलग अलग क्षेत्रो में जाकर साहित्य को बेच रहे है। लोग इस साहित्य को बहुत पसन्द भी कर रहे है।

 

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