विद्यासागर कापड़ी की अनुपम रचना
मोहन कब आओगे....*
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बढ़ते पापों की ज्वाला से,
कब तुम हमें बचाओगे ।
हरने भार धरा का मोहन,
बोलो कब तुम आओगे।।
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तात पुत्र में नेह नहीं है,
माँ भी मौन तरसती है।
अब पुत्रों की रसना से भी,
तपती आग बरसती है।।
बूढ़ों को आश्रम से लेकर,
कब उनके घर लाओगे।
हरने भार धरा का मोहन,
बोलो कब तुम आओगे।।
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गौमाता क्यूँ अपने घर से,
बाहर छोड़ निकाली है।
दूध निचोड़ने को यहाँ अब,
सबने गैया पाली है।।
गोमाता को उनके घर कब,
मोहन आप दिलाओगे।
हरने भार धरा का मोहन,
बोलो कब तुम आओगे।।
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गंगा सबको करती पावन,
उसमें खोली नाली है।
गंगा माँ के आँचल में ही,
मैल गंदगी डाली है।।
बोलो आकर कब गंगा को,
फिर पावन कर जाओगे।
हरने भार धरा का मोहन,
बोलो कब तुम आओगे।।
ताप बढ़ रहा धरती माँ का,
जाने कब जल जायेगी।
कैसे मानवता बोलो तो,
ये जिंदी रह पायेगी।।
फिर धरती को स्वर्णिम युग में,
कब आकर ले जाओगे।
हरने भार धरा का मोहन,
बोलो कब तुम आओगे।
बढ़ते पापों की ज्वाला से,
कब तुम हमें बचाओगे।
हरने भार धरा का मोहन,
बोलो कब तुम आओगे।
*डा० विद्यासागर कापड़ी*
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