भारतीय जनसंघ (1951) एवं भारतीय जनता पार्टी (1980) के संस्थापक सदस्य रहे राजा यादवेन्द्र दत्त दुबे का जन्म 07 दिसंबर 1918 को राजमहल में हुआ था।
27 वर्ष की अवस्था में ही पिता राजा श्री कृष्ण दत्त जी महाराज के देहत्याग के पश्चात वैदिक विधि विधान के साथ राज्याभिषेक हुआ था। राज परिवार से जुड़े सभी संस्कारों -ब्यवहारों से सम्पन्न राजा साहब पहले तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े फिर राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई।
राजनीति में उनकी पकड़ इतनी मजबूत हो चुकी थी कि स्वतंत्र भारत के प्रथम आम चुनाव (1952) में स्टार प्रचारक की भूमिका में रहे। लोगों को अपने कार्य व्यवहार एवं ओजस्वी भाषण से इतना प्रभावित किया कि द्वितीय विधानसभा चुनाव (9157) में जौनपुर सदर से प्रत्याशी घोषित कर दिया गया, और विजयी होकर जनसंपर्क में अपना अधिकांश समय देने लगे। 1962 में जौनपुर सदर से कांग्रेसी सरकार में गृह मंत्री रहे हरगोविंद सिंह जैसे लोकप्रिय नेता को हराकर उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता विरोधी दल की भूमिका में रहे। 1967 के आम चुनाव में बरसठी से विधायक बने। उन्होंने ने जिसे चाहा चुनाव लडाया और जिताया भी।
यह दौर ऐसा था जब बीबीसी लंदन से राजा साहब के चुनाव का कवरेज होता था। एक बार तो बीबीसी लंदन ने यह कहा कि - राजा यादवेन्द्र दत्त दुबे एवं राममनोहर लोहिया के सामने खड़ा होने के लिए कोई कांग्रेसी प्रत्याशी तैयार नहीं है। जबकि उस दौर में कांग्रेस का ही बोलबाला था। राजा साहब 1977 एवं 1989 में दो बार सांसद रहे। संसद में उनके भाषण की चर्चा राजनीतिक हल्कों में हुआ करता था।
जनसंघ के अध्यक्ष रहे पंडित दीनदयाल उपाध्याय को जौनपुर से उपचुनाव में प्रत्याशी घोषित किया गया कि राजा साहब के लोकप्रियता का लाभ मिलेगा। लेकिन बाहरी प्रत्याशी के नाम पर उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।
राजा साहब को तीन बार जेल भी जाना पड़ा था । पहली बार महात्मा गांधी की हत्या में गोडसे द्वारा प्रयोग में लाई गई गाड़ी और पिस्तौल को राजा साहब का बताया गया और 60 दिनों तक नैनी सेंट्रल जेल में कठोर कारावास में रखा गया। जिसमें बाद में निर्दोष साबित हुए। फिर इमरजेंसी और राममंदिर शिलापूजन के समय जेल यात्रा करना पड़ा।
राज पीजी कॉलेज के प्राचार्य रहे प्रोफेसर (डॉ) अखिलेश्वर शुक्ला ने संसद में अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर राजा साहब के एक भाषण की चर्चा करते हुए बताया कि -राजा साहब के लम्बे भाषण के चलते जब लोकसभा अध्यक्ष द्वारा समय समाप्त होने की बात कही गई तो प्रधानमंत्री रहे भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेई और उप प्रधानमंत्री रहे लाल कृष्ण आडवाणी ने अपना समय भी राजा साहब को देने का आग्रह किया। इस दौरान कांग्रेस के नेता सीएम स्टीफन ने भाषण के बीच में टोका टाकी शूरु कर दिया तो राजा साहब ने भोजपुरी में समक्षाते हुए कहा कि --"तोहार उमर चालीस होई आई --अबही ना गई तोहार लरिकाई" - इसके बाद पुरा सदन ठहाकों से गूंज उठा ।
हवेली राजनेताओं एवं आमजन के आने जाने से गुलजार रहता था। राजा साहब स्वयं भी प्रायः गांवों का दौरा किया करते थे। स्मरण शक्ति इतनी प्रबल थी कि जो एक बार मिला उसे नाम से ही पुकारते थे।
राजमहल में संघ के द्वितीय सरसंघचालक गुरु गोलवलकर, भाऊराव देवरस, वेणुगोपाल, नानाजी देशमुख, पं दीनदयाल उपाध्याय, प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेई, उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कलराज मिश्र, सहित अन्य दलों के नेताओं का भी आना जाना लगा रहता था।
राजा साहब स्वयं की गाड़ी एवं राजपरिवार का झंडा ही प्रयोग करते थे।
राजा साहब हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत सहित विज्ञान एवं ज्योतिष की भी अच्छी जानकारी रखते थे।
वह जीवन का अंतिम दिन अंक गणित का सर्वोच्च अंक - 09-09-1999 को प्रातः 09 बजे जब राजा साहब ने शरिर त्याग किया तो उनके शव यात्रा में जो जनसैलाब उमड़ा वह न *भूतो न भविष्यति*। हवेली से रामघाट तक लोगों का रेला उमड़ पड़ा था। आगे गृह राज्यमंत्री, अनेकों राजनीतिज्ञ, व्यापारी से लेकर आमजन शवयाञा में शरीक थे। जिस जगह पर चंदन की लकड़ी से दाह-संस्कार किया गया वहां की अग्नि आज भी निर्बाध गति से प्रज्वलित हो रही है और वही अग्नि अन्य शवदाह में प्रयुक्त किया जा रहा है। राजा यादवेन्द्र दत्त दुबे जी को अपने तरफ से जनपद वासियों की तरफ से सत सत नमन सहित श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं
प्रोफेसर (कैप्टन) डॉ अखिलेश्वर शुक्ला, पूर्व प्राचार्य -राज पीजी कॉलेज जौनपुर -उतर प्रदेश। .
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