फूल संक्रांत या फूलदेई उत्तराखंड का एक अत्यंत सुंदर लोकपर्व है, जिसे फूलों के त्योहार के रूप में जाना जाता है।
यह पर्व ऋतुराज वसंत के आगमन और प्रकृति के नवजीवन का प्रतीक है। होली के रंगों के बाद आने वाला यह त्योहार रंग-बिरंगे फूलों और प्रकृति की सुगंध से भरा हुआ होता है।
उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में इसे स्थानीय परंपराओं और रीति-रिवाजों के अनुसार अलग-अलग ढंग से मनाया जाता है।
मैं गढ़वाल मंडल के टिहरी जनपद के नरेंद्रनगर विकासखंड के अंतर्गत आने वाली 'दोगी पट्टी' का निवासी हूँ। इसलिए अपने क्षेत्र में इस पर्व को जिस प्रकार मनाया जाता है, उसी की एक मधुर झलक यहाँ साझा कर रहा हूँ -
जब मैं छोटा था और गाँव में रहता था, तब चैत्र (चैत) महीने का विशेष इंतज़ार रहता था—खासकर चैत्र संक्रांति के दिन आने वाली 'फूलसंक्रांत' का। इस पर्व की तैयारियाँ एक दिन पहले ही शुरू हो जाती थीं। माँ जी शाम को ही दाल (रंगणवास/नौरंगी) या पिण्डालू (अरबी) पकाने के लिए रख देती थीं।
उधर हम बच्चे भी दो–चार दिन पहले ही अपनी फूलकंडी (फूल रखने की छोटी, हत्थीदार टोकरी) तैयार कर लेते थे। यह फूलकंडी प्रायः रिंगाल के तनों से बनाई जाती थी, जिसे गाँव के कंडोलिया या कोई बुजुर्ग बड़ी कुशलता से बनाते थे। यह छोटी-सी टोकरी देखने में बहुत सुंदर और मनमोहक होती थी।
फूल संक्रांत के दिन सुबह होते ही घर में दाल या अरबी–आलू के स्वादिष्ट भरे पकोड़े, जिन्हें हमारे यहाँ स्वाले कहा जाता है, बनाए जाते थे। सबसे पहले दो स्वाले फूलकंडी में रखे जाते और उसकी पूजा की जाती। इसके बाद हम बच्चे अपनी फूलकंडी लेकर खेतों (सारियों) की ओर निकल पड़ते और वहाँ से फ्योंली के पीले-पीले फूल तोड़कर लाते।
फिर घर आकर हर देळी (दरवाजे की चौखट) के दोनों ओर थोड़े-थोड़े फूल डालते। यह परंपरा पूरे चैत्र महीने तक चलती थी।
इस एक महीने की परंपरा में भी कुछ नियम थे। शुरुआती आठ दिनों तक केवल फ्योंली के ताजे फूल ही लाए जाते थे। आठ दिन बाद अन्य फूलों का भी उपयोग किया जा सकता था, जैसे— गुरियाळ, धाई, ढाँक, दालिम, बासिंग और बुगरा (सहजन) आदि के फूल।
आठ दिनों के बाद सुबह के लिए फूल शाम को ही इकट्ठा कर लिए जाते थे। उन्हें फूलकंडी में हल्का पानी छिड़ककर घर के बाहर नीम या डैंकरण के पेड़ पर टांग दिया जाता था, ताकि वे सुबह तक ताज़ा बने रहें।
यह पूरी प्रक्रिया चैत्र महीने भर चलती थी और अंततः बैसाखी (बिखोत) के दिन एक भव्य और उल्लासपूर्ण समापन के साथ पूरी होती थी। बैसाखी के दिन विशेष रूप से दालिम और ढाँक के फूलों की सुंदर मालाएँ बनाई जाती थीं और उन्हें घर के दरवाजों की चौखट (मोरी) पर सजाया जाता था।
इसके लिए फूल दो–तीन दिन पहले से ही इकट्ठा किए जाते थे। उस दिन देळी पर सामान्य दिनों से अधिक फूल डाले जाते थे। फिर हम छोटे बच्चे खुशी-खुशी उस देळी को लाँघते थे और बदले में हमें पूरे महीने की प्रोत्साहन राशि मिलती थी।
हम बच्चों के लिए यह क्षण बहुत आनंददायक होता था, क्योंकि ठीक छह दिन बाद सात गते का हिंडौला थौल भी आने वाला होता था।
वास्तव में यह एक महीने तक चलने वाला पर्व प्रकृति, उत्साह, बालसुलभ आनंद और सामुदायिक परंपराओं का अद्भुत संगम होता था। आज समय के साथ यह परंपरा कई स्थानों पर कम होती जा रही है, परंतु इसकी मधुर स्मृतियाँ आज भी मन में उसी ताजगी और आनंद के साथ जीवित हैं।
आप सभी को प्रकृति, रंग और उमंग से भरे इस सुंदर लोकपर्व फूल संक्रांत / फूलदेई की हार्दिक शुभकामनाएँ.
प्रो. (डॉ.) राकेश चन्द्र रयाल (मनरागी)
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