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उत्तराखंड सरकार द्वारा प्रस्तुत वर्ष 2026–27 का बजट केवल आंकड़ों का बड़ा पुलिंदा है, लेकिन इसमें प्रदेश की वास्तविक समस्याओं का कोई ठोस समाधान नजर नहीं आता। सरकार ने इसे प्रदेश का सबसे बड़ा बजट बताया है, लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि इसमें पहाड़, किसान, बेरोजगार युवा और आम जनता की पीड़ा कहीं दिखाई नहीं देती।



पर्वतीय क्षेत्रों में जंगली जानवरों के आतंक से किसान और ग्रामीण लगातार परेशान हैं, उनकी फसलें बर्बाद हो रही हैं, लेकिन सरकार ने इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए कोई स्पष्ट नीति नहीं बनाई। 


स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति आज भी पहाड़ों में बदहाल है, अस्पतालों में डॉक्टर और संसाधनों की भारी कमी है, लेकिन इस बजट में स्वास्थ्य के क्षेत्र में कोई ठोस और कारगर योजना दिखाई नहीं देती।


उत्तराखंड की सबसे बड़ी समस्या पलायन है। गांव खाली होते जा रहे हैं, लेकिन पलायन रोकने के लिए सरकार के पास कोई ठोस रोडमैप नहीं है। 


बेरोजगार नौजवानों को भी इस बजट से उम्मीद थी कि रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, लेकिन युवाओं के लिए इसमें कुछ भी नया नजर नहीं आता।


महंगाई लगातार बढ़ रही है और आम आदमी की कमर टूट रही है, लेकिन सरकार के बजट में महंगाई कम करने का कोई प्रभावी उपाय नहीं दिखता। 


शिक्षा का क्षेत्र लगातार बाजारीकरण की ओर बढ़ रहा है और सरकार इस पर रोक लगाने के बजाय इसे मौन स्वीकृति देती नजर आ रही है।


सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि टिहरी बांध विस्थापितों और प्रभावित परिवारों के हितों की रक्षा को लेकर भी इस बजट में कोई चर्चा नहीं की गई।


 साथ ही प्रतापनगर क्षेत्र को केंद्रीय ओबीसी में शामिल करने जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर भी सरकार ने कोई पहल नहीं की।

कुल मिलाकर यह बजट जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने में पूरी तरह असफल साबित हुआ है। उत्तराखंड की जनता को इससे जो आशाएं थीं, वह इस बजट में पूरी होती दिखाई नहीं देतीं।

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