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डा. रवीन्द्र अरजरिया

अफसरशाही में परिवर्तित हो गई है आक्रान्ताओं की गुलामी

Bhavishay ki aaht


आजादी का अमृत महोत्सव मनाने वाले देश में अभी भी गुलामी की जडें़ बेहद मजबूत हैं। लम्बे समय तक पराधीनता झेलने वाले राष्ट्र के नागरिक अभी भी परतंत्रता की बेडिय़ां नहीं तोड पाये हैं। अतीत में बाह्य आक्रान्ताओं का साम्राज्य था। थोपे गये नियमों की बंदिशें थी। मनमानियों का तांडव था। सुविधाओं की मृगमारीचिका के पीछे भागने वालों को चापलूस बनाकर गद्दारी करने का पुरस्कार दिया जाता था। सत्ता के सहयोग से मुखियागिरी का तमगा मिलते ही चापलूसों के पंख लग जाते थे, फिर वह आम नागरिक न होकर बाह्य आक्रान्ताओं के दल का हिस्सा बन जाता था। अतीत की वह दास्तानें आज भी यथावत जीवित होकर अपनी श्रंखला का विस्तार कर रहीं हैं। पहले चापलूसी करने के लिए बाह्य आक्रान्ताओं की इच्छाओं की पूर्ति करना पडती थी किन्तु अब स्वाधीनता के तिरंगे तले अफसरशाही की व्यक्तिगत मंशा जानकर स्वयं को ढालना पडता है। संवैधानिक व्यवस्था में ज्यादातर गुलामी के दौर का तंत्र ही लागू किया गया है। धरातल पर जी तोड मेहनत करने वालों के मानदेय से सैकडों गुना ज्यादा वेतन वातानुकूलित कमरों में बैठकर हुकुम चलाने वालों को दिया जाना इस दिशा में एक उदाहरण है। ऐसी हजारों नहीं लाखों स्थितियां देखने को मिल जायेंगी। कार्यपालिका में अफसरशाही की अपनी एक सशक्त विरादरी है, जो न केवल अधीनस्त कर्मचारियों को ही प्रताडित करने के मौके तलाशती रहती है बल्कि विधायिका के चयनित जनप्रतिनिधियों को भी कानूनी दावपेंच में उलझाकर अपनी मर्जी को अंजाम तक पहुंचा देती है। सुपर लग्जरी वाहन, अत्याधुनिक सुविधाओं से परिपूर्ण आवास, वातानुकूलित कार्यालय, अनगिनत भत्तों सहित भारी भरकम वेतन, भ्रमण कार्यक्रमों के दौरान उच्चतम गुणवत्ता के भौतिक संसाधनों की भरमार, स्थाई सेवाकर्मियों के माध्यम से संविदाकर्मियों, दैनिक वेतनभोगियों और मानदेय पर काम करने वालों का खुला शोषण करने के परम्परागत अधिकार आज भी अफसरशाही के पास सुरक्षित हैं। ऐसे में विकास के नाम पर निजी स्वार्थों को पूरा करने वाली योजनाओं का निर्माण, टैक्स का मनमाना निर्धारण, वसूली के नये-नये हथकण्डे, कानूनी जटिलताओं का बाहुल्य, पारदर्शिता के नाम पर औपचारिकताओं को जटिताओं में परिवर्तित करने वाले कृत्यों से उत्तरदायी अपने कर्तव्यबोध की होली खुलेआम जला रहे है। देश-प्रदेश की राजधानियों से लेकर जिला मुख्यालय तक की अफसरशाही से  केवल और केवल धरातल पर काम करने वाले मेहनतकश कर्मचारियों की निगरानी की अपेक्षा का जाती है। कोरोना काल में जिस तरह से आशा कार्यकर्ताओं ने जान की बाजी लगाकर लोगों को स्वास्थ लाभ दिया है, वह आम नागरिकों से छुपा नहीं है परन्तु अफसरशाही ने मौतों के कम आंकडे के लिये एक दूसरे की ही पीठ थपथपाई है। पीपीई किट, ग्लब्स आदि सुरक्षा साधनों के बिना भी आशाओं सहित अनेक संविदाकर्मियों, दैनिक वेतनभोगियों आदि ने देश में मानवता का नया इतिहास लिखा है परन्तु चन्द सिक्कों से जीवकोपार्जन करने वाले इन देवदूतों के नियमितीकरण पर अफसरशाही ने गाज गिरा दी है। स्थाई सेवाकर्मी का सम्मान पाने के लिए क्षेत्र में जी तोड मेहनत करने वाले संविदाकर्मी, दैनिक वेतनकर्मी तथा मानदेय पर जीवन यापन करने वाले लम्बे समय से तडफ रहे हैं। धरातल पर काम करने वाले स्थलीय समस्याओं से जूझते हुए जरूरतमंदों को सुविधायें उपलब्ध कराते हैं, असंतुष्ट लोगों व्दारा किये जाने वाला अपमान झेलते हैं, जिला मुख्यालयों के वातानुकूलित कार्यालयों को स्वयं के दायित्वपूर्ति के आंकडे उपलब्ध कराते हैं जिनके आधार पर विभागों के जिला प्रमुख अपना सीना चौडा करके उपलब्धियों का ढिढोरा पीटने लगते हैं। कुछ अपवाद छोड दें तो साक्ष्य सहित शिकायतों के बाद भी इन सीना चौडा करने वालों के वेतन पर कभी भी ग्रहण नहीं लगता, सुविधाओं पर कभी रोक नहीं लगती, मनमानियों पर कभी लगाम न लगती। मगर दूसरी ओर मानसेवियों को मिलने वाले चन्द रुपयों को लम्बे समय तक रोक के रखा जाता है। कभी वजट का बहाना तो कभी साहब की अनुपलब्धता दिखा दी जाती है। देश में एक काम करने वाले की निगरानी करने के लिए 5 से लेकर 18 अधिकारियों तक की क्रमबध्द श्रंखला बनाई गई है। ऐसे एक नहीं अनेक उदाहरण भरे पडे हैं। तंत्र को अत्याधुनिक तकनीक से पारदर्शी बनाने का दावा करने वाली सरकारें यदि रोड टैक्स जमा करने वाले वाहनों से भी रोड पर चलने के लिए फास्ट टैग के माध्यम से जबरन पैसे वसूल सकती है तो फिर धरातल पर काम करने वाले कर्मचारियों व्दारा किये जाने वाले कार्यों की डाटा फीडिंग को सीधे प्रदेश में मानीटर क्यों नहीं किया जा सकता। ऐसी ही स्थिति तंत्र के प्रत्येक क्षेत्र में है। सीधी मानीटरिंग होते ही आजादी के बाद से बनाये गये अनावश्यक पदों पर काबिज लोगों को निजी क्षेत्रों में संभावनायें तलाशना पडेंगी। मगर ऐसा होगा ही नहीं। तंत्र को मजबूत और सुविधाजनक बनाने का कथित दायित्व उठाने वालों के अपनी संगठन हैं, समान हित हैं। अफसरशाही यह कभी नहीं चाहेगी कि उसके संगठनात्मक विरादरी का कोई सदस्य संघर्षशील हो, देश के हित में व्यक्तिगत लाभ शहीद हों, विलासता की संभावनाओं पर कुठाराघात हो। अतीत में मानवीय त्रुटि के नाम पर की गई मनमानियों पर पर्दा डाला जाता था तो अब तकनीकी त्रुटि के कारण का बहाना सामने आ जाता है। पहले भी अफसरशाही और स्थाई कर्मचारियों की सरकारी आमदनी सुरक्षित थी और आज भी सुरक्षित है। इन मनमानियों पर यदि कभी राष्ट्रभक्त नागरिकों की तलवारें लटकती भी है तो न्यायपालिका के पैचेंदगी भरे गलियारों की भूलभुलैंया उन्हें वरदान के रूप में प्राप्त हो जातीं है। समय के साथ बदलती परिस्थितियों में यदि टैक्स की जबरन वसूली की नीति अपनाई जा रही है तो फिर खजाने के पैसों की बचत का रास्ता क्यों नहीं खोजा जा रहा है। तकनीक से जहां मानव शक्ति के स्थान पर यांत्रिक शक्ति का उपयोग किया जा रहा है तो फिर तंत्र की मजबूती के लिए सरकारी संपन्नता को सुदृढ करने के उपाय क्यों नहीं हो रहेे हैं। फिजूलखर्ची पर लगाम क्यों नहीं लगाई जा रही है, ईमानदार करदाताओं के खून-पसीने की कमाई को अफसरशाही पर क्यों उडाया जा रहा है, ऐसे अनेक प्रश्न देश के नागरिकों के होंठों पर आने से पहले ही सहम जाते हैं। कानूनी दांवपेंच में माहिर अफसरशाही प्रश्नकर्ता को तालिबानी सजा के शरमाने तक प्रताडित करने का दम रखते हैं, जिसकी कहीं सुनवाई होना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है। आज अफसरशाही में परिवर्तित हो गई है आक्रान्ताओं की गुलामी, जिसे समाप्त करने के लिए आजादी के अमृत महोत्सव के सरकारीकरण से आगे बढकर यथार्थ स्वाधीनता की ओर चलना पडेगा, तभी संभावनाओं से परिपूर्ण तिरंगा विश्व शिखर पर फहरा सकेगा। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।

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