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  डा. रवीन्द्र अरजरिय                                                 

                    

देश में महंगाई का दावानल निरंतर बढता ही जा रहा है। सरकारों से लेकर नागरिकों तक में इस विपत्ति से निवारण के उपायों पर चिन्ता की जा रही है। हर स्तर पर समस्या का समाधान खोजने की बात की जा रही है। वास्तविकता तो यह है कि देश को सुगमता के साथ संचालित करने हेतु नीतियों का निर्धारण करने वाले तंत्र और प्रसिध्द अर्थ शास्त्रियों ने या तो इस दिशा में ईमानदाराना कोशिशें नहीं कीं या फिर उन कोशिशों को लागू करने की दिशा में कोई सार्थक पहल नहीं हुई। वस्तुओं की कीमतों को निर्धारित करने हेतु सैध्दान्तिक रुप से शासकीय स्तर पर मूल्य नियंत्रण विभाग काम करता है। यह विभाग वस्तुओं की लागत और उन पर लिये जाने वाले लाभाशों पर लगाम कसता है। मगर आश्चर्य तो तब होता है जब पचास पैसे की लागत पर बनने वाली दवाई को निर्माता कम्पनी 50 रुपये में उपभोक्ता को देती है। यही स्थिति अन्य वस्तुओं पर भी लागू होती है। तब मूल्य निर्धारण विभाग और तंत्र की प्रमाणिकता पर अनेक प्रश्न चिंह अंकित क्यों नहीं होंगे। यह हो हुई निर्माताओं की निरंकुश मनमानियां और जरूरतमंद की मजबूरी। मंहगाई के बढते ग्राफ के लिए एक और महात्वपूर्ण कारक है जिसे हम पहली पायदान पर रख सकते हैं। वह है आवश्यकता से अधिक आय। आम आवाम को जीवन जीने के लिए दो समय का पौष्टिक भोजन, निवास हेतु एक मकान और पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन हेतु आवश्यक राशि जिससे वह अपने बच्चों की पढाई, माता-पिता आदि परिजनों की सेवा जैसे कार्यों को पूर्ण कर सके। इन न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रत्येक परिवार को वर्तमान परिपेक्ष ंमें लगभग 15 से 20 हजार रुपये की जरूरत होती है। न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद फिर प्रारम्भ होती है विलासता के संसाधनों को जुटाने की अंतहीन श्रृंखला। छोटी कार से लेकर निजी विमानों तक, वातानुकूलित बंगलों से लेकर पांच सितारा कार्टेज तक, टैक्सियों से लेकर चार्टेड प्लेन तक, 24 इंची टीवी से लेकर होम थियेटर तक, मनोरंजन हेतु वर्फीली वादियों से लेकर स्वीजरलैण्ड की रंगीनियों तक जैसे अनगिनत कारक विद्मान हैं। इन्हीं विलासता के कारकों के पीछे आज समाज की अंधी प्रतिस्पर्धा चल रही है। जिनके पास बाइक है, वे कार खरीदना चाहते हैं। जिनके पास कार है वे सुपर लग्जरी वाहन खरीदना चाहते हैं। जिनके पास सुपर लग्जरी वाहन हैं वे निजी हैलीकाप्टर खरीदना चाहते हैं और जिनके पास निजी हैलीकाप्टर हैं वे स्वयं  प्लेन खरीदना चाहते हैं। माया के इस अंतहीन जंजाल ने लोगों को आधारभूत आवश्यताओं की परिधि से बहुत आगे पहुंचा दिया है। इस सोच को बढावा देने में हमारी सरकारें भी पीछे नहीं हैं। सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों को आउटिंग हेतु विशेष व्यवस्था की जाती है, धनराशि उपलब्ध करायी जाती है और किया जाता है भ्रमण कार्यक्रमों का अनुमोदन। बात यहीं तक होती तो भी गनीमत थी। देश के प्रत्येक चुनाव के पहले कर्मचारियों-अधिकारियों को वेतन वृध्दि, महंगाई भत्ता जैसी अनेक सौगातें देकर वोट बैंक में इजाफा किया जाता है। जब सरकारी मुलाजिमों को पगार के रूप में भारी भरकम धनराशि मुहैया करायी जाने लगती है तब निजी नौकरियों, छोटे धंधे, मजदूरी के माध्यम से जीवकोपार्जन करने वालों के अंदर हीनता का भाव जन्म ले लेता है। उदाहरण के तौर पर यदि हम केवल शिक्षा विभाग को ही देखें तो सरकारी महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में सेवारत प्राध्यापकों का वेतनमान लाख रुपये से अधिक होता है। सरकारी प्राइमरी स्कूलों के स्थाई शिक्षकों का वेतन भी पचास हजार से अधिक ही होता है। जबकि निजी संस्थानों में कार्यरत प्रतिभाशाली शिक्षकों को अपनी योग्यता की आहुतियों पर चन्द सिक्के ही मिलते हैं। वहीं दूसरी ओर अधिकांश सरकारी अधिकारी-कर्मचारी स्वयं अपने बच्चों का दाखिला सरकारी स्कूलों में करवाने कतराते हैं। निजी संस्थाओं में प्रवेश दिलाते हैं। आखिर क्यों? क्या उन्हें ही सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता पर विश्वास नहीं है। अगर यह सही तो सरकारें अपने कर्मचारियों-अधिकारियों की प्रतिवर्ष पात्रता परीक्षायें क्यों नहीं आयोजित करतीं है जिस पर होने वाला व्यय भी परीक्षा में भागीदारी करने वालों से वसूला जाये। ऐसे में वर्तमान मापदण्डों पर कार्यरत लोगों की प्रतिभा मेें विकास, कार्य के प्रति समर्पण और दायित्वबोध स्थापित हो सकेगा और सरकारी तंत्र की गुणवत्ता, प्रतिभा और समर्पण में स्थायित्व आ सकेगा। अब प्रश्न उठता है वेतन की विसंगतियों का। जब एक किलो आलू सभी को 20-30 रुपये किलो मिल रहा है। सरकारी स्कूलों में नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था है। सरकारी अस्पतालों में नि:शुल्क चिकित्सा सुविधायें हैं। तो फिर भारी भरकम पगार पाने वाले अपने धन को कहां खर्च करेंगे। बस यहीं से शुरू हो जाती है मंहगाई की एबीसीडी। एक मजदूर जब दिन भर की कडी मेहनत के बाद 300 रुपये की दिहाडी में से शाम को एक किलो आलू 20-30 रुपये में लेकर घर जाता है तब औसतन 3,000 रुपये प्रतिदिन की आय लेने वाला प्रोफेसर अपनी वातानुकूलित कार का शीशा उतारकर एक किलो आलू का दाम 50 रुपये देकर चला जाता है। उसे आलू महंगा नहीं लगता। मगर मजदूर को 20-30 रुपये में भी महंगा लगता है। ऐसे में ज्यादा मुनाफा कमाने लालच में आलू विक्रेता दामों में बढोत्तरी करके 50 रुपये कर देता है। अगली बार वह 300 रुपये दिहाडी पाने वाला मजदूर 50 रुपये में आलू खरीदता हुआ खून के आंसू रोता हुआ घर पहुंचता है तब प्रोफेसर महोदय 70 रुपये किलो में आलू खरीदकर हंसते हुए घर पहुंचते हैं। यहां भी मूल्य नियंत्रण विभाग से लेकर अन्य संबंधित अधिकारियों का अमला मूक दर्शक बना रहता है। आवश्यकता से अधिक आय न पचा पाने के कारण होती है। यह सत्य है कि विशेष योग्यता और योगदान पर अतिरिक्त लाभ मिलना चाहिए। एक आईएएस और एक चपरासी का वेतन समान नहीं हो सकता। दौनों का दायित्वबोध, कतव्र्यनिष्ठा और उत्तरदायित्वों में भारी अंतर है। ऐसे में कुछ विशेष होना ही चाहिए मगर मानवीय काया, पारिवारिक दायित्व और सामाजिक समरसता तो दौनों के एक ही है। विशेष का अर्थ योग्यता और योगदान को पुरस्कृत करने के संदर्भ में लिया जाना चाहिए। जब मूलभूत आवश्यकताओं में अंतर नहीं है तो फिर भारी अंतर रखने का औचित्य समझ से परे हो जाता है। तुष्टीकरण के आधार पर वोटबैंक बढाने की राजनैतिक मानसिता का शिकार होने वालों में केवल और केवल मध्यम वर्गीय परिवार ही हो।



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