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रुद्रप्रयाग:



गुप्तकाशी क्षेत्र की निधि पत्नी दीपक रगडवाल हाल महादेव मुहल्ला रूद्रप्रयाग रूद्रप्रयाग जिला अस्पताल के आयुर्वेदिक पंचकर्म में नर्स हैं बीते रोज उनको प्रसव वेदना हुई तो वे जिला अस्पताल पहुंचे और करीब 11:00 बजे उन्हें वहां भर्ती किया गया। शाम 4:15 बजे उनकी डिलीवरी हुई तो एक स्वस्थ बच्चे ने जन्म लिया लेकिन गर्भवती निधि का रक्त स्राव बंद नहीं हुआ। करीब 2 घंटे तक गर्भवती महिला यहां जीवन बचाने की जद्दोजहद कर रही थी लेकिन अंत में डॉक्टरों ने हार मान ली और वे उन्होंने इसे श्रीनगर के लिए रेफर कर दिया। बताया जा रहा है महिला की अस्पताल पहुंचते ही मौत हो गई।


रुद्रप्रयाग जिला चिकित्सालय में इस केस को देख रहे डॉ दिग्विजय सिंह रावत ने बताया कि महिला की नॉर्मल डिलीवरी की जा रही थी और डिलीवरी सफलतापूर्वक हो भी गई थी और एक 4 किलो ग्राम स्वास्थ  बच्चे को जन्म दिया। लेकिन रक्तस्राव बंद न होने के कारण उन्हें आगे रेफर करना पड़ा। उन्होंने कहा कि उनके द्वारा काफी कोशिश की गई लेकिन वह ब्लडिंग रोकने में सफल नहीं हो पाई। डॉ रावत ने बताया कि  रक्तस्राव इतना हो चुका था कि उनका बचना नामुमकिन था।

गर्भवती महिला की मौत के बाद परिजनों में कोहराम मच गया है लेकिन जिला अस्पताल की नाकारा स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को लेकर भी एक बार फिर से सवाल खड़े हुए।

(साभार कुलदीप राणा) 

जी हां ,जिला अस्पताल रुद्रप्रयाग नाम आप कई बार सुन चुके होंगे। यहां से अक्सर ऐसी खबरें आती हैं कि प्रसव पीड़ा वाली महिलाओं ने उपचार के अभाव में दम तोड़ा ।हमारे उत्तराखंड राज्य में बड़े-बड़े मेडिकल कॉलेज हैं जो न जाने कितने डॉक्टरों को प्रशिक्षण देते हैं ।इसके बावजूद भी उत्तराखंड के ही जिला अस्पताल महिला विशेषज्ञ डॉक्टरों से वंचित हैं। इस कारण दूरस्थ पहाड़ी इलाकों में महिला चिकित्सकों की अनुपस्थिति या फिर स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव  में महिलाओं को ही दम तोड़ना पड़ रहा है ।

प्रसव वेदना से कराहती महिला को अपने बच्चे को बचाने की आस रहती है पर   उन्हें पता नहीं कि वह बच पाएंगी या नहीं या उनकी संतान बच पाएगी या नहीं वर्षों से यह खेल चल रहा है।

 स्वास्थ्य के नाम पर करोड़ों रुपए रिलीज किए जाते हैं। प्रदेश का भविष्य बच्चे और महिलाएं हैं । महिला सशक्तिकरण की बातें की जाती हैं ।परंतु इन मुद्दों पर सभी मौन हैं। प्रसव संबंधी सुविधाएं प्रत्येक महिला को मिलना चाहिए यह उनका अधिकार है। प्रत्येक जिला अस्पतालों में कम से कम महिला चिकित्सक प्रसव कराने हेतु उपस्थित होनी चाहिए और उनके साथ ही वह समस्त सुविधाएं जो एक अस्पताल में होनी चाहिए ।आखिर किसकी जिम्मेदारी है आखिर किस का कर्तव्य है कि महिलाओं की और मातृ शिशु की मृत्यु दर में कमी लाई जाए ।

कहना अतिशयोक्ति ना होगा के पुराने समय में दूरस्थ पहाड़ी इलाकों में ही नहीं मैदानी इलाकों के गांवों में भी दाई होती थी जो महिलाओं को प्रसव कराती थी और बच्चों को जन्म दिया जाता था अब वह भी नहीं रही हैं। अनेकों उपाय एवम मेडिकल तकनीकआ गई हैं ।परंतु महिलाएं फिर भी अपनी जान से हाथ धो रही है । यह बड़े ही शर्म की बात है और सोचनीय विषय है।

ग्रामीण लाचार हैं ।दूरस्थ इलाकों में रहने वाले लोग कभी सड़क सुविधाओं से कभी एंबुलेंस की सुविधाओं से पर कभी स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं से वंचित हैं।उस दूधमुंहे बच्चे के बारे में सोच कर देखें कि जन्म होते ही जिससे मां का आँचल इसलिये छीन लिया गया क्योंकि स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध  नही थी।




 

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