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ऋषिपंचमी की शुभकामनायें

ऋषियों ने समातन संस्कृति को जीवंत बनाया

मासिक धर्म एक जैविक प्रक्रिया है, ऋषिपंचमी पूजन से रजस्वला दोष निवारण एक भ्रान्ति-पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज

ऋषिकेश:

परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने देशवासियों को ऋषिपंचमी की शुभकामनायें देते हुये कहा कि हमारे शास्त्रों के अनुसार भाद्रपद शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि को ऋषि पंचमी कहा जाता है। आज का दिन हमारे पूज्य ऋषियों को समर्पित है जिन्होंने सृष्टि पर सनातन संस्कृति को जीवंत बनाये रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। ऋषिपंचमी, ऋषियों और  महामनीषियों के दिव्य योगदान हेतु मनाया जाता है। हमारी संस्कृति में ऋषियों का स्थान इतना दिव्य और ऊंचा है कि आकाश में सात तारों का एक मंडल नजर आता है, उसे सप्तऋषियों का मंडल कहा जाता है। सप्तऋषि मंडल को भारत के महान सात ऋषियों के नाम केतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ट तथा विश्वामित्र के नाम से जाना जाता है।
पूज्य स्वामी जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति व सभ्यता विश्व की सर्वाधिक प्राचीन एवं समृद्ध संस्कृतियों तथा सभ्यताओं में से एक है, अद्भुत है, अलौकिक है। और इसे आज तक सहेजने, उत्कृष्ट और अजर-अमर बनाये रखने में हमारे ऋषियों का अद्भुत योगदान है। आदिकाल से ही आध्यात्मिक संस्कृति, भारत की आत्मा रही है जिसमें संस्कार, सुधार, परिष्कार, शुद्धि, शोध और बहुत कुछ समाहित है।
हमारे ऋषियों ने हमें सभ्यता के माध्यम से जीवन जीने का ढंग, खान-पान, रहन-सहन, बोलचाल आदि का तरीका सिखाया तथा संस्कृति द्वारा सोच-विचार, चिंतन और विचारधारायेें प्रदान की। भारतीय संस्कृति का सर्वाधिक व्यवस्थित रूप हमें वैदिक युग में प्राप्त होता है जिसे हम ऋषियों का युग भी कह सकते है।  वेद विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ माने जाते हैं। प्रारंभ से ही भारतीय संस्कृति अत्यंत सशक्त एवं जीवंत रही हैं, जिसमें जीवन के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा आध्यात्मिक प्रवृत्ति का अद्भुत समन्वय है।

हमारे ऋषियों ने ‘उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुंबकम’ के दिव्य सूत्र हमें दिये तथा यम, नियम, प्राणायाम, आसन के साथ हमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के मूल मंत्र भी प्रदान किये।
पूज्य स्वामी जी ने कहा कि वैदिक काल से ही भारतीय संस्कृति में महिलाओं को उचित स्थान दिया गया है। वर्तमान समय में भी महिलाओं के प्रति समाज की सोच बदली है और उन्हें सशक्तिकरण की ओर ले जाने के लिये प्रयास भी किये जा रहे है, वहीं दूसरी ओर हमारे समाज में आज भी अनेक ऐसी परम्परायें है जिससे हम जकड़े हुये हैं, उन्हीं में से एक है मासिक धर्म के प्रति फैली भ्रान्तियां। अनेक स्थानों पर उल्लेख मिलता है कि ऋषि पंचमी व्रत करने से मासिक धर्म के दौरान भोजन को छूने से जो पाप नारियों को लगता है उससेे मुक्ति मिलती है। स्त्रियों को मासिक धर्म के दौरान रजस्वला दोष लगता है और ऋषिपंचमी का व्रत करने से वह रजस्वला दोष से मुक्त हो जाती है। जबकि मासिक धर्म एक जैविक प्रक्रिया है जिसका सम्बंध दोष और पाप जैसे शब्दों से नहीं है। हाँ ऋषिपंचमी के दिन अपने ऋषियों द्वारा दिये संस्कारों को हम अपने जीवन में लायें, यही सबसे बड़ा व्रत होगा और ऋषियों को भावाजंलि होगी। आज की युवा पीढ़ी को यह समझना होगा तथा इसके प्रति महिलाओं को भी जागरूक होना होगा। अपनी संस्कृति, पर्व और त्योहारों पर आस्था और श्रद्धा आवश्यक है और यह नितांत निजी विषय भी है, परन्तु जिन परम्पराओं, मिथकों और वर्जनाओं के कारण हमारे देश की 23 प्रतिशत बेटियों को स्कूल छोड़ना पड़ता है उसे जितनी जल्दी हो सके छोड़ देना ही उचित है इसलिये आईये भ्रम में नहीं बल्कि भाव में जिये।

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