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पहाड़ प्रवासियों की सशक्त आवाज़ बने मोहन काला,खेत-खलिहानों तक लौटाया लॉकडाउन में फंसे हजारों पहाड़ वासियों को




उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के थैलीसैंण तहसील के कपरोली गांव के रहने वाले 20 वर्षीय आनंद सिंह राणा के चेहर पर आज रौनक है। कोविड-19 के चलते लॉकडान के संघर्षों से गुजरते हुए आनंद सिंह एक ऐसी पीड़ा में फंसे की जीवन के संघर्ष सामने आकर खड़े हो गए। वह भी अपने खेत-खलिहान से कई हजार किलोमीटर दूर मुंबई जैसे शहर में,जहां जीवन के लिए खुशियां तलाशने के मायने भी संघर्ष होता है। इन संघर्षों के बीच आनंद सिंह को अचानक पैरालिसिस ने अपनी आगोश में ले लिया और फिर राणा ऐसे बिखरे की जीवन हारते हुए दिखने लगा।
इन संघर्षों के साथ पहाड़ खुद का जीवन हारने वाला ही था कि आनंद के साथ पहाड़ के संघर्षों के मायनों को करीब से देखने-समझने वाले तमाम सामाजिक संगठन और लोगों आकर खड़े हो गए। जिनमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई मोहन काला फाउंडेशन के अध्यक्ष और सामाज सेवी मोहन काला ने,जिन्होंने पहाड़ के इस युवा की ही नहीं बल्कि मुंबई से लेकर पहाड़ तक कोविड-19 के चलते लॉकडाउन में फंसे हजारों लोगों को अपने खेत-खलिहानों तक पहुंचाया। साथ ही इन लोगों की खाने-रहने की व्यवस्था की,और उनकी सेवा का यह कार्य आज भी निरंतर जारी है।

मोहन काला पहाड़ के जीवन परिवेश से जुड़ा वह नाम हैं। जिन्होंने पहाड के जीवन को कभी थकने नहीं दिया कभी हारने नहीं दिया। इसी का परिणाम हैं कि मोहन काला आज मुंबई से उत्तराखंड के दूरगामी क्षेत्रों में कोविड-19 संक्रमण के चलते लॉकडाउन में फंसे हजारों उत्तराखंडियों तक खाद्य सामग्री और मास्क पहुंचा चुके है।

मोहन काला के पहाड़ के प्रति अथा प्रेम और अपने लोगों के लिए किसी भी मुश्किल समय में उनके साथ खड़े रहने के जज्बे का ही परिणाम हैं कि थैलीसैण तहसील के कपरोली गांव का बीस वर्षीय आनंद राणा 2000 किमी दूर मुंबई से अपने गांव पुहंचा सका। यह निश्चित तौर पर उत्तराखंड के लोगों के लिए गर्व की बात हैं कि मोहन काला जैसे व्यक्तिव उनके साथ खड़ा है। जिन्होंने अपने पहाड़ के जीवन परिवेश को खुद में समेटते हुए। मुंबई से बीमार युवक को कुछ घंटों में एंबुलेंस की व्यवस्था कर तमाम अपने साथियों और संगठनों के सहयोग से अपने गांव तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी के साथ मोहन काला अपने अथक प्रयासों से मुंबई में रहने वाले हजारों प्रवासियों के बस की व्यवस्था कर उन्हें उनके खेत-खलिहानों तक पहुंचा चुके है।



मायानगीर मुंबई में इस संकट के समय में हजारों की संख्या में उत्तराखंडी प्रवासी लॉकडाउन के चलते फंसे है। जिनके पास अब न रोजगार हैं न खाने-पीने की कोई व्यवस्था। ऐसे समय में पहाड़ के जरूरतमंदों की शसक्त आवाज़ के नाम से जाने जाने वाले मोहन काला ने अपनी संस्था मोहन काला फाउंडेशन के माध्यम से इन प्रवासी उत्तराखंडियों तक न केवल खाद्य सामग्री पहुंचा रहे है, बल्कि इन्हें इनके खेत-खलिहानों तक पहुंचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे है।

मोहन काला एवं तमाम सामाजिक कार्यकर्ताओं के सहोयग से अपने गांव पहुंचे आनंद सिंह राणा नम् आँखों से बताते हैं कि आज मुझे जो जीवन मिला है। उसके लिए मैं उन सभी उत्तराखंडियों और आदरणीय मोहन काला जी का कोटि-कोटि आभार व्यक्त करता हूं। क्योंकि मैं आज अपनी माटी पर लौटा हूं तो इसका श्रेय इन लोगों को जाता है।

मोहन काला 23 मार्च से हुए लॉकडाउन के बाद से निरंतर मुंबई,दिल्ली और देश के तमाम दूरसे शहरों के साथ-साथ उत्तराखंड के उन दूरगामी क्षेत्रों में फंसे गरीब और असाहय लोगों तक खाद्य सामग्री और मास्क पहुंचा चुके है। जो लोगों इस संकट के समय में बहुंत जरूरतमंद है। मुंबई में फंस हजारों नौजवानों तक काला जी निरंतर मदद पहुंचा रहे है।

मोहन काला के अथक प्रयासों का ही नतीजा हैं कि आज मुंबई में फंसे हजारों प्रवासी उत्तराखंडी युवा अपने गांव को लौट चुके है। जो मोहन काला जी की प्रयासों की सराहना करते हुए बताते हैं कि इस संकट के समय में हमारे गांव लौटने में मोहन काला जी ने जो प्रयास किए। उसके लिए हम काला जी के सदैव आभारी रहेंगे।

इस बारे में जब हमने मोहन काला जी से बातचीत की तो उन्होंने बहुत ही भावुकता से बताया की मैं पहाड़ की माटी से जुड़ा हूं। पहाड़ मेरा जीवन हैं,और आज यह जीवन संकट में है। मेरे पहाड़ का युवा टूट रहा है,लेकिन मैं पहाड़ की जीवन को संकट में नहीं आने दूंगा,पहाड़ के युवाओं को टूटने नहीं दूंगा। मेरी कोशिश हैं कि मैं उन लोगों तक मदद पहुंचा सकूं,जो आज के समय में बहुत जरूरतमंद है। आज पहाड़ का युवा शहरों में बहुत अकेला हो गया है। मैंने उन्हें कहा हैं आप किसी भी तरह से फ्रिक न करें। हम आपके खाने,रहने और आपको पहाड़ तक लौटाने की व्यवस्था कर रहे है। बस इस सोच के साथ हम आगे बढ़ रहे है। इसी का परिणाम हैं कि आज बड़ी संख्या में पहाड़ का नौजवान अपने गांव अपने खेत-खलिहानों तक लौटा है। वह खुश हैं कि इस संकट के समय में वह सब अपनी मातृ भूमि पहुंचा है। श्री काला बताते हैं कि हमारी कोशिश हैं ज्यादा से ज्यादा लोगों तक मदद पहुंचा पाए। इस महत्वपूर्ण कार्य में हमारे साथ कई लोगों जुड़े है। मैं उन्हें कोटि-कोटि प्रणाम करता हूं। साथ ही आप सभी से निवेदन करता हूं कि आप सब इस संकट के समय में अपना ख्याल रखें। सरकार द्वारा बनाए गए दिशा-निर्देशों का पालन करें। हम सब मिलकर बहुत जल्द इस कोरोना महामारी को हरा कर एक नये भारत नये उत्तराखंड का निर्माण करेंगे।

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