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नागलज्वालापुर में सुसवा किनारे ग्रामीणों और संस्थाओं ने की चर्चा 
डोईवाला;

प्रदूषित सुसवा नदी को फिर से पुराने स्वरूप में लाने के लिए स्थानीय किसानों ने पर्यावरण के जानकारों के साथ चर्चा की। इस दौरान किसानों ने सुसवा में प्रदूषण से होने वाले आर्थिक नुकसान पर अपनी बात रखी। सुसवा के संरक्षण के लिए व्यापक स्तर पर जागरूकता के साथ ही अन्य तकनीकी उपायों पर बल दिया गया।

नागल ज्वालापुर में सुसवा नदी के तट पर रविवार को हुई चर्चा में दृष्टिकोण समिति, क्लाइमेट चेंज और सुसवा क्षेत्र के निवासियों ने उन सभी मुद्दों पर बात की, जो सुसवा में प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं। समस्या ही नहीं समाधान पर भी फोकस किया गया। जल्द ही आपको सुसवा के लिए कुछ होता दिखेगा, पर इसमें आप सभी को योगदान करना होगा।

दृष्टिकोण समिति के अध्यक्ष व क्षेत्रीय कास्तकार मोहित उनियाल ने कहा कि पहले जब, ट्यूबवैल नहीं होते थे तो गांववाले सुसवा का पानी पीते थे। सिंचाई में भी इसी पानी को इस्तेमाल करते थे। अब तो यह सिंचाई के लायक भी नहीं है। राजाजी टाइगर रिजर्व पार्क के जानवर भी यही प्रदूषित पानी पी रहे हैं। शहर का कचरा सुसवा में मिलने से रोका जाना चाहिए। सुसवा में वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाने के लिए क्षेत्र के युवाओं, छात्र-छात्राओं, किसानों ने हस्ताक्षर अभियान चलाया था। यह बात तो सही है कि हमें अपना कर्तव्य निभाते रहना है पर जहां कोई भी बड़ी आवश्यकता होती है, वहां सरकार की भूमिका अहम होती है।

जैविक कृषि पर वर्षों से कार्य कर रहे किसान उमेद सिंह बोरा का कहना था कि पहले सुसवा नदी का पानी पीने लायक था। दूधली की बासमती पूरे देश में प्रसिद्ध थी। बासमती को इस लायक बनाने मे सुसवा का बड़ा योगदान था। अब यह नदी देहरादून शहर का कचरा ढोकर लाती है और हमारे खेतों को कैमिकल बांट रही है। मेरा एक सवाल है, अगर हमारी नदियां स्वच्छ और निर्मल नहीं रहीं तो खेती को जैविक कैसे बना सकते हैं। वो खुश्बू, स्वाद और सेहत बनाने वाली फसल कहां से पैदा होगी। कहते हैं कि किसान पॉलीथिन का इस्तेमाल नहीं करता। किसान खेतों में कैमिकल नहीं डालता, पर जब नदी के पानी में इतना कैमिकल मिला आ रहा हो तो क्या किया जाए।

पर्यावरण के पैरोकार आयुष जोशी ने उन सभी तकनीकी और कानूनी उपायों पर चर्चा की, जिनसे हिमालयी क्षेत्र, वनों, नदियों और प्रकृति की सौगातों को संरक्षित करने में मदद मिल सकती है। ईको सेंसिटिव जोन के लिए जरूरी तत्वों पर चर्चा करने के साथ ही उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि जब तक किसी क्षेत्र के लोग नहीं चाहेंगे, तब तक वहां की नदियों और वनों को संरक्षित नहीं किया जा सकता। पहल हमें करनी होगी, तभी सुसवा को पुराने स्वरूप में लाने के प्रयास शुरू हो पाएंगे। समाधान पर बात करें तो नदियों का कचरा इकट्ठा करने के साथ चैक डेम बनाकर कचरे का आगे बढ़ने से रोका जाए, साथ ही अवेयरनैस कैंपेन के माध्यम से लोगों को नदियों में कचरा फेंकने से रोक सकते हैं। इस प्लास्टिक कचरे को रोड बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है।

डोईवाला स्थित पब्लिक इंटर कालेज के प्रिंसिपल जितेंद्र कुमार कहते हैं कि सुसवा का प्रदूषित होने का अर्थ है, इसके किनारे बसे गांवों की आर्थिक स्थिति पर प्रहार होना भी है। खेती में प्रदूषित पानी मिलने से उपज पर असर पड़ रहा है। फसल के माध्यम से कैमिकल हमारे शरीर में जा रहा है। स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। रोगों की आशंकाएं बढ़ रही हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन कर रहीं क्लाइमेट चेंज ग्रुप की प्रमुख सदस्य सलोनी रावत कहती हैं कि जब हम जानेंगे ही नहीं तो सुसवा नदी के बारे में सोचेंगे भी नहीं। सबसे पहले तो हमें ज्यादा से ज्यादा लोगों को सुसवा नदी के बारे में बताना होगा। सुसवा कैसी नदी थी, उस पर कितने गांवों की आर्थिक स्थिति निर्भर करती है। स्वच्छता और स्वास्थ्य कैसे प्रभावित हो रहे हैं। यह सब हमें बताना होगा।

हिमगीरी जी यूनिर्वसिटी में शिक्षक रविद्र ने सुझाव दिया कि हम सुसवा के उद्गम तक जाएं और फिर वहां से वाक करते हुए उसके जल में होते बदलाव का अध्ययन करें। सक्षम पांडेय ने। इस पूरी चर्चा को कवरेज किया। इस दौरान तकधिनाधिन के संस्थापक पूर्व वरिष्ठ पत्रकार राजेश पांडेय की ओर से सुसवा की चिट्ठी सुनाई गई, जिसमें नदी ने अपने सुनहरे अतीत और वर्तमान दुर्दशा का जिक्र किया है। इस मौके पर सक्षम पांडेय,आसिफ,सतनाम,आरिफ,
शुभम कांबोज आदि उपस्थित रहे ।

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