गरिमा आर्य ने शिव स्तुति से अपने नृत्य की शुरुआत की इसके बाद गरिमा ने लखनऊ घराने के प्रसिद्ध पारंपरिक बंदिश विलंबित तीन ताल में प्रस्तुत की।
उनकी अगली प्रस्तुति साडे़9 मात्रा में बंदिश थी।
अगला ठुमरी, बिंदादीन महाराज द्वारा रचित, "कान्हा देखो ढ़ाडे हैं बृज की ओर"।
उनके साथ तबला पर प्रांशु चतुरलाल, सारंगी पर गुलाम वारिस खान और हारमोनियम और गायकी पर जय दाधीच थे।
रामपुर के संगीत घराने से ताल्लुक रखने वाले श्री नियाज़ी ने आमीर ख़ुसरो द्वारा रचित सूफी रचनाओ छाप तिलक और मन कुंतो मौला की प्रस्तुति दी ।इसके बाद पीर मुर्शीद नसीर साब द्वारा रचित 'में वारी जाऊं' कव्वाली प्रस्तुत की । इनके साथ कोरस पे मजीद नियाज़ी , मुकर्रम नियाज़ी ,हामिद नियाज़ी , फ़ैज़ नियाज़ी , तबले पर लकी एवं ढोलक पे परवेज़ अहमद ने दर्शकों का मनोरंजन किया ।
नियाज़ी साहब के साथ स्टेज पर उनका साथ दिया उनके भांजे समी नियाज़ी जी ने।रामपुर में जन्मे समी नियाज़ी जी बताते हैं कि बचपन से ही अपने पिता से काफी प्रेरित रहे हैं जो कि खुद एक बेहतरीन , तबला वादक , ढोलक वादक एवं गायक हैं। बचपन से ही संगीत घराने में जन्म लेने के कारण नियाज़ी जी को परिवार से ही बोहोत कुछ सीखने को मिला।बाद में वे अपने मामा जी श्री शाहिद नियाज़ी जी के साथ पूर्ण रूप से जुड़ गए और उन्ही से सीखते गए । श्री नियाज़ी जी को सन 2012 में साउथ अफ्रीका में 'बज़्म-ए-चिस्तिया' सम्मान से भी सम्मानित किया गया है।
.png)

एक टिप्पणी भेजें