रुद्रप्रयाग:भूपेंद्र भण्डारी
पहाड़ के ऊंचाई वाले इलाकों में आज भी अधिकतर ग्रामीण आजीविका खेती पर निर्भर है, लेकिन वर्षभर हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद कभी मौसम तो कभी जंगली जानवारों के आतंक से किसानों की फसलें चैपट हो रही है जिससे किसान मायूस नजर आ रहे हैं
यूँ तो पहाड़ के गाँवों में जंगली जानवरों के आतंक और कुदरत की मार से बेहाल किसानों ने बड़े पैमाने पर खेती छोड दी और पहाड़ से पलायन कर कर महानगरों में रोजगार करने लगे हैं, लेकिन रूद्रप्रयाग जनपद के तीनों विकासखण्डों के ऊंचाई वाले गाँवों में आज भी अधिकतर ग्रामीणों की आजीविका कृषि पर ही निर्भर हैं, जबकि इन गाँवों से पलायन भी नामात्र हो रखा है, लेकिन वर्षभर कमरतोड़ मेहनत करने के बाद कभी मौसम की मार तो अब जंगली जानवर फसलों को चैपट कर दे रहे हैं, ऐसे में यहां के किसानों का खेती की तरफ मोह भंग हो रहा है और पलायन की दिशा में बढ़ रहे हैं।
सरकारें कृषि से किसानों की आय दुगनी करने का दावा कर रही है, लेकिन किसानों की समस्या को समधान नहीं निकाल पा रहे हैं। चुनावों के वक्त जरूर नेता वोट मांगने के लिए खोखले नारे-दावे करते हैं, परंतु सत्ता पर काबिज होने के बाद ग्रामीणों को अपने हाल पर छोड़ देते हैं। ऐसे में पलायन न हो तो क्या।
पहाड़ के ऊंचाई वाले इलाकों में आज भी अधिकतर ग्रामीण आजीविका खेती पर निर्भर है, लेकिन वर्षभर हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद कभी मौसम तो कभी जंगली जानवारों के आतंक से किसानों की फसलें चैपट हो रही है जिससे किसान मायूस नजर आ रहे हैं
यूँ तो पहाड़ के गाँवों में जंगली जानवरों के आतंक और कुदरत की मार से बेहाल किसानों ने बड़े पैमाने पर खेती छोड दी और पहाड़ से पलायन कर कर महानगरों में रोजगार करने लगे हैं, लेकिन रूद्रप्रयाग जनपद के तीनों विकासखण्डों के ऊंचाई वाले गाँवों में आज भी अधिकतर ग्रामीणों की आजीविका कृषि पर ही निर्भर हैं, जबकि इन गाँवों से पलायन भी नामात्र हो रखा है, लेकिन वर्षभर कमरतोड़ मेहनत करने के बाद कभी मौसम की मार तो अब जंगली जानवर फसलों को चैपट कर दे रहे हैं, ऐसे में यहां के किसानों का खेती की तरफ मोह भंग हो रहा है और पलायन की दिशा में बढ़ रहे हैं।
सरकारें कृषि से किसानों की आय दुगनी करने का दावा कर रही है, लेकिन किसानों की समस्या को समधान नहीं निकाल पा रहे हैं। चुनावों के वक्त जरूर नेता वोट मांगने के लिए खोखले नारे-दावे करते हैं, परंतु सत्ता पर काबिज होने के बाद ग्रामीणों को अपने हाल पर छोड़ देते हैं। ऐसे में पलायन न हो तो क्या।
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