प्रतिशोध की ज्वाला पर पानी डालने की चाल है क्रिकेट मैचों का आयोजन
पुलवामा हमले के बाद पूरे देश में पाकिस्तान के विरुद्ध आक्रोश की ज्वाला धधक रही है। आम नागरिक बदले के लिए उतावले हो रहे हैं। शोक मिश्रित क्रोध का दावानल चरम सीमा पर है। हर कोई केवल और केवल आतंकवादियों के सफाये से जुडी उपलब्धियां देखना चाहता है। चौराहों से चौपालों तक पाक की हरकतों पर चर्चाओं का बाजार गर्म है। आधुनिक शिक्षा का पुरोध हो या फिर ग्रामीण जीवन की समस्याओं से जूझने वाला, हर कोई सीआरपीएफ के जवानों का प्रतिशोध लेना चाहता है। कैण्डिल मार्च, शोक सभायें, श्रद्धान्जलि समारोहों के अनगिनत आयोजनों से जहां शोक का वातावरण निर्मित हो रहा है वहीं दुश्मन को ललकारने वालों के धरने, प्रदर्शन, रैलियों से राष्ट्र प्रेम की बयार धारदार बनती जा रही है। जब पूरा देश आतंकवादी संगठनों और उनको पालने वाले पाकिस्तान को सबक सिखाने का संकल्प ले चुका हो तब देश का क्रिकेट बोर्ड, विदेशियों के साथ बैट-बाल की जुगलबंदी से नागरिकों के देशप्रेम को नस्तनाबूत करने की चाल चल रहा है।
वर्ल्ड कप में पाकिस्तान के साथ न खेलने का निर्णय लेने में कोताही बरतने वालों की जमात अब देशवासियों की वास्तविक भावनाओं को भी क्रिकेट मैचों के हथियारों से कत्ल करने में जुट गये हैं। विचार चल ही रहा था कि कालबेल के स्वर ने अवरोध उत्पन्न कर दिया। नौकर ने सेना के अधिकारी आदेश पटैरिया के आने की सूचना दी। विचारों में डूबा मन प्रफुल्लित हो उठा। पटैरिया जी हमारे बहुत पुराने मित्र है, जो छुट्टियों से डियूटी पर लौटते समय अक्सर हमसे मिलने चले आते हैं। आगे बढकर उनकी अगवानी की।
कुशलक्षेम पूछने-बताने के बाद पुलवामा की घटना के साथ-साथ देश के क्रिकेट बोर्ड की कथनी और करनी पर चर्चा चल निकली। पुलवामा घटना के बाद से एक जुट हो चुके राष्ट्र की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि विदेशियों के साथ खेल के आयोजन को ढाल बनाकर देशवासियों की भावनाओं को दिशाविहीन करने की क्रिकेट बोर्ड की चाल है। पहले तो विश्व कप में पाकिस्तान के साथ न खेलने का निर्णय ही सरकार पर डाल दिया ताकि उसे राजनैतिक रंग दिया जा सके। बोर्ड को हमले के तत्काल बाद पाकिस्तान के साथ खेल संबंधों को समाप्त करने की घोषणा करना चाहिये थी और अब तो उन्होंने अति ही कर दी। आक्रोश के वातावरण को ही तहस-नहस करने पर तुल गये।
जब देश शहीदों की शहादत का प्रतिशोध लेने को उतावला हो रहा हो तब क्रिकेट का राग अलापना, शहीदों की शहादत भरे माहौल का मुखौल उडाने जैसा ही है। पूर्व निर्धारित मैचों को निरस्त किया जाना चाहिये था ताकि देश का ध्यान दुश्मनों पर ही केन्द्रित रहे और शहीदों की शहादत का प्रतिशोध लेने की एक जुटता स्थापित रह सके। प्रतिशोध की ज्वाला पर पानी डालने की चाल है क्रिकेट मैचों का आयोजन। यह सब क्यों और किसके इशारे पर हो रहा है। यह जांच का विषय है किन्तु जांच होने ही नहीं दी जायेगी। हमारे बीच के ही जयचंदों की फौज खडी हो जायेगी। विषय का राजनीतिकरण हो जायेगा।
आरोपों-प्रत्यारोपों का अंतहीन दौर विभिन्न माध्यमों से रफ्तार पकडने लगेगा। ऐसे प्रयास सोचे समझे ष़डयंत्र की व्यवहारिक परिणति होते हैं जिन्हें रोके बिना सार्थक परिणामों की परिकल्पना सार्थक हो ही नहीं सकती। गुस्से से उनका चेहरा तमतमा उठा। मेज पर रखे पानी के गिलास को होठों से लगाया और एक ही सांस में पूरा गिलास खाली कर दिया। उनकी आंखें छत को घूरने लगीं। माथे पर पसीने की बूंदें झलझला उठी थी। इस विषय पर कुछ और पूछने का साहस ही नहीं हुआ।
हमें लगा कि उनके दिल में पुलवामा जैसी अनेक घटनाओं का ज्वालामुखी धधक रहा है जो निश्चित ही आतंकवादियों और उनके सरपरस्तों को नस्तनाबूत किये बिना शान्त होने वाला नहीं हैं। उन्हें प्रतिशोधात्मक विचारों से बाहर निकालने की गरज से हमने नौकर को चाय और स्वल्पाहार लाने का इशारा किया। कुछ समय एकाग्र मुद्रा में गुजारने के बाद वे सामान्य हुए। तब तक मेज पर चाय और स्वल्पाहार की प्लेटें सजाई जा चुकीं थी। हमने चाय की ओर इशारा किया तो उन्होंने भावहीन अवस्था में ही चाय का प्याला उठाया और सिप करने लगे। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी। तब तक के लिए खुदा हाफिज।
Dr. Ravindra Arjariya
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