.टिहरी में मनेगा आज शानदार, अद्भुत महोत्सव
.पनी पारम्परिक वेशभूषा में अपने रीति-रिवाजों, अनुभवों, प्रार्थना, ध्यान पद्धति और त्यौहारों को सांझा किया जायेगा
.पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु चारों तत्वों और चारों दिशाओं पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के विशेष प्रभावो पर आधारित करेंगे प्रार्थना
ऋषिकेश:
उत्तराखण्ड, टिहरी में आज सोमवार शानदार अद्भुत टिहरी महोत्सव का होगी शुरूआत। जिसमें परमार्थ निकेतन पधारे विश्व के विभिन्न देशों से आये आदिम, जाति जनजाति एवं आदिवासी समुदाय के प्रमुख सहभाग कर अपनी पारम्परिक वेशभूषा में अपने रीति-रिवाजों, अनुभवों, को भी सांझा किया जायेगा।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने बताया कि सभी आदिवासी प्रमुख अपनी-अपनी पूजा पद्धति, ध्यान और ईश्वर आराधना जो कि वे पृथ्वी के गर्भ (भूगर्भ) में माँ की गोद में बैठकर करते हैं उसका भी दर्शन होगा। इस प्रकार विविध परम्पराओं, संस्कृतियों और भाषाओं का आदान-प्रदान होगा तथा गंगा झील के तट पर विभिन्न संस्कृतियों के संगम एवं परम्पराओं के दर्शन होंगे। यह आदिवासी प्रतिनिधिमण्डल विभिन्न संस्कृतियांें के मेल का तथा विश्व एक परिवार है के संदेश का जीता जागता अनूठा अनुभव होगा। भारत की इस विविधता में एकता की संस्कृति का पूरे विश्व को दर्शन कराने का अवसर कर्मयोगी मुख्यमंत्री उत्तराखड श्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के अथक प्रयासों से हो रहा है।
वह कौन सी चीज है जिसे अमेरिका में रहने वाले चेरोकी एवं नवाजो जनजातीय समुदाय के लोग सुदूर उत्तर भारत में रहने वाले जनजातीय समुदाय के लोगो से सीख सकते है। वैसे तो सीखने के लिये बहुत सी चीजें हैं परन्तु सबसे अधिक महत्वपूर्ण जलस्रोत और पर्यावरण संरक्षण के परम्परागत तरीके उल्लेखनीय है। जिन्हें कि इन समुदायों द्वारा सदियों से उपयोग में लाया जा रहा है
इस परिपेक्ष्य में अनेक देशों के विभिन्न जनजातीय समुदाय के लोग, भव्य टिहरी महोत्सव के बाद वे ऋषिकेश परमार्थ निकेतन में ’’जल संसद’’ पर भी चर्चा करेंगें तथा जनजातीय और आदिवासी समुदाय जल एवं पर्यावरण संरक्षण के अपने द्वारा अपनाये जाने वाले आदिम तरीकों पर विचार विमर्श करेंगे।
जीवा की अन्तर्राष्ट्रीय महासचिव साध्वी भगवती सरस्वती जी ने बताया कि नेटिव अमेरिकन जनजातीय लोग एक दिव्य कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे जिसका अर्थ है ’’धरती माँ के हृदय में’’ बैठकर; रहकर जीवन को उत्सव बनाना।
टिहरी फेस्टिवल में अमेरिका, कोलम्बिया, चीली, ब्राजील, जर्मनी, अर्जेटीना, मैक्सिको, पेरू से आने वाले कैकेटाइबो, इस्कोहनुया, मैसिगेन्का है। बोलिविया से अयमर्स लोग है, आॅस्रोगोत्स, मरकाॅमनिक्स, फैंक्स वंडल्स, जर्मनी से नवाजो, चेरोकी अमेरिका से अट्रेबट्स, बेलगैस एवं यू. के. से कान्तरि असिस एवं विश्व के अन्य देशों से आदिवासी एवं जनजाति समुदाय के लोग सहभाग कर रहे हैं।
.पनी पारम्परिक वेशभूषा में अपने रीति-रिवाजों, अनुभवों, प्रार्थना, ध्यान पद्धति और त्यौहारों को सांझा किया जायेगा
.पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु चारों तत्वों और चारों दिशाओं पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के विशेष प्रभावो पर आधारित करेंगे प्रार्थना
ऋषिकेश:
उत्तराखण्ड, टिहरी में आज सोमवार शानदार अद्भुत टिहरी महोत्सव का होगी शुरूआत। जिसमें परमार्थ निकेतन पधारे विश्व के विभिन्न देशों से आये आदिम, जाति जनजाति एवं आदिवासी समुदाय के प्रमुख सहभाग कर अपनी पारम्परिक वेशभूषा में अपने रीति-रिवाजों, अनुभवों, को भी सांझा किया जायेगा।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने बताया कि सभी आदिवासी प्रमुख अपनी-अपनी पूजा पद्धति, ध्यान और ईश्वर आराधना जो कि वे पृथ्वी के गर्भ (भूगर्भ) में माँ की गोद में बैठकर करते हैं उसका भी दर्शन होगा। इस प्रकार विविध परम्पराओं, संस्कृतियों और भाषाओं का आदान-प्रदान होगा तथा गंगा झील के तट पर विभिन्न संस्कृतियों के संगम एवं परम्पराओं के दर्शन होंगे। यह आदिवासी प्रतिनिधिमण्डल विभिन्न संस्कृतियांें के मेल का तथा विश्व एक परिवार है के संदेश का जीता जागता अनूठा अनुभव होगा। भारत की इस विविधता में एकता की संस्कृति का पूरे विश्व को दर्शन कराने का अवसर कर्मयोगी मुख्यमंत्री उत्तराखड श्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के अथक प्रयासों से हो रहा है।
वह कौन सी चीज है जिसे अमेरिका में रहने वाले चेरोकी एवं नवाजो जनजातीय समुदाय के लोग सुदूर उत्तर भारत में रहने वाले जनजातीय समुदाय के लोगो से सीख सकते है। वैसे तो सीखने के लिये बहुत सी चीजें हैं परन्तु सबसे अधिक महत्वपूर्ण जलस्रोत और पर्यावरण संरक्षण के परम्परागत तरीके उल्लेखनीय है। जिन्हें कि इन समुदायों द्वारा सदियों से उपयोग में लाया जा रहा है
इस परिपेक्ष्य में अनेक देशों के विभिन्न जनजातीय समुदाय के लोग, भव्य टिहरी महोत्सव के बाद वे ऋषिकेश परमार्थ निकेतन में ’’जल संसद’’ पर भी चर्चा करेंगें तथा जनजातीय और आदिवासी समुदाय जल एवं पर्यावरण संरक्षण के अपने द्वारा अपनाये जाने वाले आदिम तरीकों पर विचार विमर्श करेंगे।
जीवा की अन्तर्राष्ट्रीय महासचिव साध्वी भगवती सरस्वती जी ने बताया कि नेटिव अमेरिकन जनजातीय लोग एक दिव्य कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे जिसका अर्थ है ’’धरती माँ के हृदय में’’ बैठकर; रहकर जीवन को उत्सव बनाना।
टिहरी फेस्टिवल में अमेरिका, कोलम्बिया, चीली, ब्राजील, जर्मनी, अर्जेटीना, मैक्सिको, पेरू से आने वाले कैकेटाइबो, इस्कोहनुया, मैसिगेन्का है। बोलिविया से अयमर्स लोग है, आॅस्रोगोत्स, मरकाॅमनिक्स, फैंक्स वंडल्स, जर्मनी से नवाजो, चेरोकी अमेरिका से अट्रेबट्स, बेलगैस एवं यू. के. से कान्तरि असिस एवं विश्व के अन्य देशों से आदिवासी एवं जनजाति समुदाय के लोग सहभाग कर रहे हैं।
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