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रुद्रप्रयाग;

भूपेंद्र भण्डारी


वर्ष 2007 में विकासखण्ड जखोली  के पाजणा गांव को कुदरत ने ऐसे जख्म दिए जिसने  ग्रामीणों को आज भी मौत के साये में जीने के लिए मजबूर कर रखा है। भले ही जिला प्रशासन ने इस गांव के 148 परिवारों को विस्थापन के लिए  पहले स्थान पर रखा हो ,लेकिन सरकारों ने इस गाँव का विस्थापन तो नहीं किया मगर साल दर साल कई बार बादल फटने से गांव मौत की दहलीज़ पर खड़ा है। 

 वर्ष 2007 में विकासखण्ड जखोली  के पांजणा गांव को कुदरत ने ऐसे जख्म दिए जिसने  ग्रामीणों को आज भी मौत के साये में जीने के लिए मजबूर कर रखा है, भले ही जिला प्रशासन ने इस गांव के 148 परिवारों को विस्थापन के लिए  पहले स्थान पर रखा हो लेकिन सरकारों ने इस गाँव का विस्थापन तो नहीं किया। मगर सालदर साल कई बार बादल फटने की घटनाओं ने यहा के ग्रामीणों को मौत की दहलीज़ पर जा पहुँचा दिया है।

साल 2007 में बादल फटने से इस गाँव में भारी तबाही मची थी, आवासीय भवनों के साथ खेती और गौशालायें भी बडे पैमाने पर ध्वस्त हुई, ग्रामीण तब जान बचाकर कई महीनों तक गांव से दूर पंचायती भवनों और सरकारी स्कूलों में दिन काटने के लिए मजबूर हुए। हालांकि गांव में व्यापक तबाई होने के बावजूद जिला प्रशासन और सरकारों ने ग्रामीणों की कोई सुध नहीं, जैसे तैसे ग्रामीण उभर ही रहे थे ।

लेकिन इस गाँव की खुशहाली कुदरत को रास न आई और पुन: 2012 की बरसात की काली रात फिर काल बनकर पांजणा के ग्रामीणों पर बरस पर रही सही कसर 2013 की आपदा ने पूरी कर ली जिसने  पूरे गांव का भूगोल ही बदल गया।  ग्रामीणों काथगी देवी,  ,सौणी देवी,अब्बल सिंह, दर्शन लाल, ग्रामीण  का कहना है कि  पांजणा गांव में तीन बार बादल फटने से आवासीय भवन पूरी तरह जर्जर हो गए हैं जबकि इस गाँव में लगातार भू धँसाव हो रहा है जिसके चलते दर्जनों मकान ध्वस्त हो गए हैं 

त्रिलोक सिंह रौतेंला,  प्रधान पांजणा का कहना है कि  आर्थिक रूप से सम्पन्न परिवार गाँव छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर चले गए हैं लेकिन गरीब असहाय और आर्थिक रूप से कमजोर ग्रामीण उन्हीं जीर्णशीर्ण भवनों में मौत के साये में रहने को मजबूर हैंहर समय भय बना रहता कि न जाने कब उनके भवन गिरकर उनकी मौत का कारण बनेसरकारी कारिंदे न जाने कितनी बार गाँव की सर्वेक्षण कर चुकी है जबकि भूगर्भीय रिपोर्ट में भी इस गाँव को रहने लायक नहीं बताया है बावजूद गांव का विस्थापन नहीं हो पाया है

आपदा की दृष्टि से भले जनपद रूद्रप्रयाग अतिसंवेदनशील हो लेकिन प्रभावित ग्रामीणों के विस्थापन को लेकर प्रशासन फिसड्डी साबित हुआ है!  पूरे जनपद में 472 परिवारों का विस्थापन  होना था लेकिन सालों बाद भी सिर्फ 56 परिवारों का ही विस्थापन हो सका है ऐसे में विस्थापन को लेकर शासन प्रशासन की कछुवा चाल आपदा पीडितों का दर्द और बढा रही है

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