नववर्ष पर विशेष/डा. रवीन्द्र अरजरिया
मधुर स्मृतियों के सुखद स्पन्दनों के मध्य वर्तमान ने अतीत की चादर ओढना शुरू कर दिया है। एक बार फिर पाश्चात्य संस्कृति के संस्कारों में रचा-बसा नया वर्ष दस्तक देने लगा है। कलम का गति के साथ वर्तमान आहिस्ता-आहिस्ता पुराने परिधानों को त्यागने की प्रक्रिया में संलग्न है और जब शब्द आपके मस्तिष्क पर अंकित हो रहे होंगे तब का वर्तमान नूतन आवरण में सुनहरी धूप के साथ हौले से मुस्कुरा रहा होगा। उथल-पुथल भरे सामाजिक जीवन और राजनैतिक प्रतिस्पर्धाओं के मध्य अठखेलियां करता समय पलक झपकते ही गुजर गया। कुछ राज्यों में नये समीकरणों को स्थापित किया, तो कुछ में चुनौतियों भरा कांटों का ताज विजेता के सिर पर सजा दिया। शेयर के उठते-गिरते ग्राफ के साथ देश की मुद्रा भी अस्थिर रही। डिजिटलीकरण से लेकर कैश-लैश सिस्टम के लिए तक अभियान चलाये गये। साइबर युग में दमदार भागीदारी का दावा ठोका गया। अपराधों की कमी से लेकर अपराधियों पर शिकंजा कसने तक के आंकडे प्रस्तुत किये गये। दूसरों की कमियों पर स्वयं की सफलता का डंका बजाने वालों की भी कमी नहीं रही।
नूतन वर्ष की अगवानी में पलक पांवडे बिछाने वाले सफलतम भविष्य के सपनों को साकार होता देखना चाहते हैं। देश की सर्वोच्च सत्ता का महाकुम्भ भी प्रयागराज के अध्यात्मिक कुम्भ के बाद दस्तक देने की तैयारी में है। राम मंदिर से लेकर महंगाई, बेरोजगारी, किसान समस्यायों, व्यापारियों की मांगों जैसे दर्जनों प्रश्नचिन्ह अपना समाधान ढूंढ रहे हैं। आन्दोलन, बहिस्कार, हडताल, विरोध प्रदर्शन सहित अनेक हथियारों पर धार रखी जा रही है। सत्ता-सुख के मोह-पाश में बंधे लोगों का समूह स्वयं का हित साधने के लिए तरह-तरह के हथकण्डे आजमाने में लगे हैं। सीमापार की चुनौतियों की कौन कहे, घर के अन्दर का स्वार्थ ही काले जादू की तरह उतरने का नाम नहीं ले रहा है। बडों के बहुत बडे अपराधों को नजरंदाज करने वाले जब छोटी सी भूल करने वालों पर कानून का चाबुक चलाते हैं, तब आप आवाम भी निंदा के दो शब्द कह कर दायित्व बोध से मुक्ति पा लेती है। ऐसे शब्दों की आवाज का नक्कारखाने के मस्ती भरे शोर में गुम हो जाना सहज ही है।
देश बदला, परिवेश बदला और बदलने लगी पद्धतियां। बंदूकधारी अनपढ डकैतों का स्थान अब साइबर के स्नातकों ने ले लिया है। लूट के लिए गिरोह, बाहुबल, असलहों का ढेर नहीं बल्कि कम्प्यूटर, नेट और हैकिंग का हुनर जरूरी हो गया है। जालसाजी के लिए किसी नटवरलाल से गुर सीखने की जरूरत नहीं है बल्कि जिम्मेवार अधिकारियों की कमजोरियों को पता लगाकर उसे उपयोग करने की कला आवश्यक हो गई है। सर्वर डाउन पर डाउन हो रहे हैं, नेट बंद पर बंद हो रहा है, साइडें जाम पर जाम हो रहीं हैं परन्तु काम आनलाइन ही होगा। न हैकर्स पर नियंत्रण और न कनेक्टीविटी हेतु पर्याप्त व्यवस्था। नये कानूनों के अनुपालन हेतु जानकारों की कमी, नूतन व्यवस्था के माहिर लोगों का अभाव, जैसे अनेक कारकों की धरातली समीक्षा के बिना विकसित राष्ट्रों की जमात में खडे होने की कल्पना का साकार होना, यक्ष प्रश्न को फिर से खडा करने जैसा ही है। फिर भी हम यक्ष प्रश्न के मध्य उज्जवल भविष्य की कामना तो कर ही सकते हैं।
परियोजनाओं का निर्माण करने से पहले उसकी संभावित समस्याओं पर समसामायिक स्थलीय विश्लेषण करना आवश्यक होता है। यही नहीं हुआ और एक रुपये में दो किलो प्याज खरीदने वाले थोक व्यापारियों का गिरोह, दस रुपये किलो में फुटकर बेचकर रातों रात मालामाल हो गया। कैचप में मंहगा बिकने वाला टमाटर एक रुपये में पांच किलो की कीमत पर किसान से एक संगठित गिरोह द्वारा खरीदा गाय और फुटकर बिक्री का दाम वही दस रुपये प्रति किलो। ऐसे अनेक उदाहरण भरे पडे हैं जिनकी उत्पादन कीमत से कहीं ज्यादा तो ब्रांडिंग, मार्केटिंग, एडविटाइजिंग पर खर्च की जाती है। वर्तमान वर्ष को विदा करते हुए नये वर्ष की अगवानी में यही कामना की करता हूं कि भविष्य को उज्जवल बनने के लिए धरातली समस्याओं का वास्तविक समाधान खोजा जाये, उसकी संक्षिप्त प्रक्रिया को अपनाया जाये और दी जाये तिलांजलि जाति-धर्म-क्षेत्र जैसे सीमित दायरे में कैद मानसिकता को। आमीन।
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