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उत्तराखंड की कोकिला  मशहूर लोक  गायिका कबूतरी देवी  , जिनको राष्ट्रपति पुरस्कार से भी नवाज़ा गया, अंततः हमे छोड़कर इस दुनिया से विदा हो गयी.
 नम आँखों से मातृ शक्ति को अनगिनत श्रद्धांजलि देते उत्तराखंड के वासी, उनकी मधुर स्वर लहरियों को कभी नहीं सुन पाएंगे.  बीमारी के चलते और आर्थिक अभाव के चलते उनका स्वर्गवास हो गया. पहाड़ का दर्द, कौन जान सकता है, बीमार वृद्ध व्यक्तियों को नीचे स्वास्थ्य सुविधाएँ देने के लिए लाना किसी चुनौती से कम नहीं है. 
कुछ ऐसा ही बर्दाश्त करते करते कबूतरी देवी जी ने हमसे विदा ले ली.  उनका जीवन उत्तराखंड की  वादियों में गुजर गया.

आप लोगों ने यदि ७०-८० के दशक में नजीबाबाद और लखनऊ आकाशवाणी से प्रसारित कुमांऊनी गीतों के कार्यक्रम को सुना होगा तो एक खनकती आवाज आपके जेहन में जरुर होगी। जो हाई पिच पर गाती थी, “आज पनि झौं-झौ, भोल पनि झौं-झौं, पोरखिन त न्है जूंला” और “पहाड़ों को ठण्डो पाणि, कि भलि मीठी बाणी”।  इस आवाज की मालकिन हैं, उत्तराखण्ड की तीजन बाई कही जाने वाली श्रीमती कबूतरी देवी जी। कबूतरी देवी मूल रुप से सीमान्त जनपद पिथौरागढ़ के मूनाकोट ब्लाक के क्वीतड़ गांव की निवासी हैं।  जहां तक पहुंचने के लिये आज भी अड़किनी से ६ कि०मी० पैदल चलना पड़ता है। इनका जन्म काली-कुमाऊं (चम्पावत जिले) के एक मिरासी (लोक गायक) परिवार् में हुआ था। संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा इन्होंने अपने गांव के देब राम और  देवकी देवी और अपने पिता  श्री रामकाली जी से ली, जो उस समय के एक प्रख्यात  लोक गायक थे। लोक गायन की प्रारम्भिक शिक्षा इन्होंने अपने पिता से ही ली। पहाड़ी गीतों में प्रयुक्त होने वाले रागों का निरन्तर अभ्यास करने के कारण इनकी शैली अन्य गायिकाओं से अलग है। विवाह के बाद इनके पति श्री दीवानी राम जी ने इनकी प्रतिभा को पहचाना और इन्हें आकाशवाणी और स्थानीय मेलों में गाने के लिये प्रेरित किया। उस समय तक कोई भी महिला संस्कृतिकर्मी आकाशवाणी के लिये नहीं गाती थीं। ७० के दशक में इन्होंने पहली बार पहाड़ के गांव से स्टूडियो पहुंचकर रेडियो जगत में अपने गीतों से धूम मचा दी थी।
श्रीमती कबूतरी देवी जी विशेषतः ऋतु आधारित गीत (ऋतुरैंण) गाया करती हैं, कबूतरी देवी जी ने जो भी गीत गाये वे दादी-नानी से विरासत में मिले प्रकृति से संबंधित लोकगीत थे। अर्थात पहाड के आम जनमानस में बसे लोकगीतॊं को पहली बार उन्होंने बाहर निकाला। उन्होंने आकाशवाणी के लिये लगभग १०० से अधिक गीत गाये, उनके गीत आकाशवाणी के रामपुर, लखनऊ, नजीबाबाद और चर्चगेट, मुंबई के केन्द्रों से प्रसारित हुये। उन दिनों उन्हें इन केन्द्रों तक उनके पति लेकर जाते थे, जिन्हें वे नेताजी कहकर पुकारती हैं और एक गीत की रिकार्डिंग के उन्हें २५ से ५० रुपये मिलते थे। अपने पति की मृत्यु की बाद इन्होंने आकाशवाणी के लिये और समारोहों के लिये गाना बन्द कर दिया था। इस बीच इनका एक मात्र पुत्र पहाड़ की नियतिनुसार पलायन कर गया और शहर का ही होकर रह गया। लेकिन पहाड़ को मन में बसाये कबूतरी जी  को पहाड से बाहर जाना गवारा नहीं था।
इस कारण उन्होंने अपने २० साल अभावों में गुजारें, वर्ष २००२ में नवोदय पर्वतीय कला केन्द्र, पिथौरागढ़ ने उन्हें छोलिया महोत्सव में बुलाकर सम्मानित किया तथा लोक संस्कृति कला एवं विज्ञान शोध समिति ने अल्मोड़ा में सम्मानित किया। इसके अलावा इन्हें पहाड संस्था ने सम्मानित किया। अब उत्तराखण्ड का संस्कृति विभाग भी उन्हें १००० रुपये प्रतिमाह पेंशन दे रहा है। कबूतरी जी वर्तमान में पिथौरागढ़ में अपनी पुत्री के साथ रह रहीं थी।
साभार मेरा पहाड़.कॉम


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