देहरादून/डोईवाला :
अगर अस्पताल में बीमार , रोगी डॉक्टर ही मरीज़ देखने के लिए बैठ जाएं तो कैसे रुग्णता का इलाज होगा। कहते है , किसी को आप दान तभी दे सकते है, जब दान करने योग्य वस्तु होगी आपके पास।
यही हाल कल देखने को मिला है है मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की विधानसभा क्षेत्र के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र डोईवाला में। जब नज़दीकी संस्थान से आये एक नौसिखिया एक फिजिशियन डॉक्टर यहां जो अपनी
सेवाएं दे रहे है, ने मरीज और उनके परिजन के साथ अभद्रता की। जबकि परिजनों द्वारा उनको पहली बार यहाँ देखा गया। परिजन गलती से अपने 12 वर्षीय बच्चे को दिखाने, उनके पास पंहुचे तो उन्होंने मेडिकल का परचा रख लिया और नंबर आने पर यह कह दिया कि में तो 17 साल से नीचे के मरीज़ नहीं देखता हूँ. इस पर परिजान द्वारा कहा गया कि पहले तो डॉक्टर देखते थे. बस ,इतनी सी बात पर फिजीशियन साहब तो आप से बाहर हो गए और परिजन को मरीज़ और उनके परिजनों को बाहर निकल जाने
की धमकी देते है जैसे ये उनका निजी अस्पताल हो ।
ऐसे डॉक्टरों को सरकारी
अस्पतालों में सेवाएं देने के गुर सीखकर और महिलाओं से बात करने का सबक
सीखकर ही प्रैक्टिस पर आना चाहिए। इन्हें देखकर लगता है, कि मनोरोगी है ये
डॉक्टर।
न जाने किस घमंड में चूर होकर, यहां की जनता के साथ ऐसा
व्यवहार कर रहे है ताकि वो कभी इस स्वास्थ्य केंद्र का रुख न करें।
हिमालयन अस्पताल को करार के तहत दिए जाने के बाद तमाम सरकारी डॉक्टर ,(एक डॉक्टर को छोड़कर) यहां से हटाए जा चुके है।
तो सवाल गए उठता है कि ऐसे डॉक्टर गरीब जनता का इलाज कैसे कर पाएंगे?
मुख्यमंत्री जी ने करार के तहत एकमात्र इस क्षेत्र का स्वास्थ्य केंद्र हिमालयन अस्पताल को दे तो दिया, परंतु सुध लेने शायद भूल गए है कि अपने लोग यहां अब क्या समस्या का सामना करते होंगे? क्या उन्हें संतुष्टि है या नही?
ज्ञात हो कि डोईवाला का एकमात्र सरकारी स्वास्घ्य केंद्र, सरकार द्वारा भरपूर विरोध के बावजूद हिमालयन अस्पताल को निजीकरण में दिया गया और यह कहा गया कि यह करार एक निश्चित सीमा तक है।
इसके बाद भी दिए गए संस्थान यही रोना रोते है, कि सरकार ने दवाई उपलब्ध नही कराई, बिजली की व्यवस्था नही है, मरीजों के लिए अतिरिक्त बेड नही है, सरकारी पैसा रिलीस नही हुआ है। जबकि स्टाफ मुहैया करने और सफाई के अलावा को खास प्रगति यहाँ नहीं हुई है.
तो क्या स्टाफ की कमी के चलते सरकार ने निजी संस्थान को देने का निर्णय
लिया है.? तो सवाल लाज़मी है कि स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं पर होने
वाले खर्चे कहाँ किये जा रहे है?
परंतु यही संस्थान इस बात पर चुप्पी साध लेते है कि उनके डॉक्टर कैसे मरीजों और उनके परिजनों से बदसलूकी कर रहे है?
ऐसे में तो यही सही लगता है कि यदि इस सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का पूरी तरह निजीकरण हुआ तो यह गरीब और ग्रामीण जनता के साथ नाइंसाफी होगी।
ऐसे में तो यही सही लगता है कि यदि इस सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का पूरी तरह निजीकरण हुआ तो यह गरीब और ग्रामीण जनता के साथ नाइंसाफी होगी।
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