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 उत्तराखंड राज्य के उप महाधिवक्ता कार्यालय सुप्रीम कोर्ट, भारत

supreme court vanbhulpura decision

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4 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण सुनवाई हुई, जिसकी पीठ की अध्यक्षता माननीय न्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं माननीय न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने की। यह सुनवाई उत्तराखंड राज्य द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) में हुई, जिसमें राज्य सरकार ने नैनीताल हाईकोर्ट की खंडपीठ द्वारा दो मुख्य आरोपियों जावेद सिद्दीकी और अरशद अयूब को दी गई डिफॉल्ट जमानत को चुनौती दी थी।



यह मामला 8 फरवरी 2024 को हल्द्वानी के बनभूलपुरा दंगों से संबंधित है, जिसमें एक हिंसक भीड़ ने फायरिंग की, पथराव किया, पेट्रोल बम फेंके, पुलिस वाहनों को आग के हवाले कर दिया तथा महिला कांस्टेबलों को पुलिस स्टेशन के भीतर बंद कर दिया था। बाद में उस पुलिस स्टेशन में भी आग लगा दी गई थी। इस घटना के संबंध में भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं, गैरकानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम (UAPA) की धारा 15 एवं 16 तथा आर्म्स एक्ट की धारा 3/4/7/25 सहित अन्य धाराओं में तीन अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गई थीं।


राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता श्री जतिंदर कुमार सेठी एवं स्टैंडिंग काउंसिल श्री आशुतोष कुमार शर्मा ने पक्ष रखा, जबकि आरोपियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री सिद्धार्थ अग्रवाल ने पैरवी की।


दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि हाईकोर्ट इस मामले में पूरी तरह गलत दिशा में गया। न्यायालय ने कहा कि एफआईआर एक व्यापक आगजनी, दंगा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की गंभीर घटना से संबंधित थी, जिसमें पुलिस स्टेशन की इमारत भी शामिल थी। इस मामले में बड़ी संख्या में आरोपियों पर पेट्रोल बम और अन्य हथियारों के इस्तेमाल के आरोप लगाए गए थे।


सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट द्वारा जांच प्रक्रिया पर टिप्पणी करना पूरी तरह अनुचित था और उसने जांच एजेंसी द्वारा बयान दर्ज करने के संबंध में तथ्यात्मक रूप से गलत टिप्पणियां की थीं। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से माना कि मामले की गंभीरता, बड़ी संख्या में आरोपियों और गवाहों के बावजूद जांच एजेंसी ने अत्यंत तेजी और दक्षता के साथ जांच को आगे बढ़ाया।


न्यायालय ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट इस महत्वपूर्ण तथ्य पर ध्यान देने में विफल रहा कि आरोपियों ने समय विस्तार और जमानत खारिज किए जाने के आदेशों को समय रहते चुनौती नहीं दी, बल्कि अपील दायर करने से पहले लगभग दो महीने तक प्रतीक्षा की। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इस प्रकार आरोपियों ने अपने आचरण के कारण डिफॉल्ट जमानत मांगने का अधिकार खो दिया था और हाईकोर्ट द्वारा दी गई डिफॉल्ट जमानत के आदेश को निरस्त कर दिया।


सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों को दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है, यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो ट्रायल कोर्ट को उन्हें हिरासत में लेने के लिए सख्त कदम उठाने के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही राज्य सरकार की अपील स्वीकार कर ली गई।



राज्य अभियोजन विभाग इसे राज्य के लिए एक बड़ी कानूनी जीत मान रहा है, क्योंकि यह ऐसा मामला था जिसमें राज्य की कानून व्यवस्था बनाए रखने वाली मशीनरी स्वयं हिंसक भीड़ के निशाने पर थी, जो राज्य के अतिक्रमण विरोधी अभियान का विरोध कर रही थी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा त्वरित जांच की सराहना किए जाने से पूरे राज्य पुलिस विभाग का मनोबल भी बढ़ा है।

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