महाराजा मनुजेंद्र शाह की जन्मपत्री के अनुसार तिथि घोषित
राजमहल नरेंद्र नगर राजमहल में सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए महाराजा मनुजेंद्र शाह की जन्मपत्री और पंचांग के सूक्ष्म विचार के बाद बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि औपचारिक रूप से घोषित की गई। परंपरानुसार ब्रह्म मुहूर्त में 23 अप्रैल को प्रातः 6:15 बजे बद्रीनाथ धाम के कपाट श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ विधि-विधान के साथ खोले जाएंगे।
यह उल्लेखनीय है कि टिहरी राजपरिवार की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है, जिसके अनुसार सबसे पहले बद्रीनाथ धाम के कपाट की तिथि महाराजा की कुंडली के आधार पर तय की जाती है। इसके उपरांत केदारनाथ धाम, गंगोत्री धाम और यमुनोत्री धाम—चारों धामों के कपाट खोलने की तिथियाँ अलग-अलग समय पर परंपरानुसार निर्धारित की जाती हैं। चारधाम परंपरा में बद्रीनाथ धाम को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यहीं से संपूर्ण यात्रा का आध्यात्मिक संकेत मिलता है।
आज इस ऐतिहासिक अवसर पर बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी राजमहल नरेंद्र नगर में परंपरा के इस पावन अनुष्ठान में सम्मिलित हुए। गौरतलब है कि अध्यक्ष द्विवेदी शीतकालीन यात्राओं को निरंतर प्रोत्साहित करने के साथ-साथ मुख्य चारधाम यात्रा की व्यवस्थाओं को भी सुदृढ़ करने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। यह सभी व्यवस्थाएँ पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार द्वारा सुनिश्चित की जा रही हैं।
इस अवसर पर अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने राज्य और देशभर के श्रद्धालुओं को शुभकामनाएँ देते हुए बद्रीनाथ धाम आने का सादर निमंत्रण दिया। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि इस वर्ष से ऋषिकेश में बस अड्डे के समीप पर्यटन विभाग के विशाल परिसर में बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति का कार्यालय संचालित होगा, क्योंकि यहीं से तीर्थयात्रियों को लेकर विभिन्न गंतव्यों के लिए बसें प्रस्थान करती हैं—जिससे यात्रियों को सुविधा और समन्वय दोनों में लाभ मिलेगा।
कार्यक्रम के दौरान अध्यक्ष द्विवेदी ने टिहरी राजपरिवार के सदस्यों—महाराजा मनुजेंद्र शाह , भवानी प्रताप राव, कीर्ति प्रताप—कुल पुरोहितों तथा बद्रीनाथ धाम के मुख्य पुजारियों (रावल) से भेंट कर उन्हें आगामी बद्रीनाथ-केदारनाथ-गंगोत्री-यमुनोत्री यात्रा की तैयारियों की जानकारी दी और सभी को बधाई दी।
इस प्रकार, आस्था, परंपरा और आधुनिक व्यवस्थाओं के समन्वय के साथ चारधाम यात्रा 2026 की औपचारिक शुरुआत की घोषणा हुई—जो देवभूमि उत्तराखंड की आध्यात्मिक विरासत और सांस्कृतिक निरंतरता का जीवंत प्रमाण है। 🙏
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