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देहरादून:

रिपोर्ट अंजना गुप्ता



कोरोना महामारी के समय अनेक जतन किए गए की प्राण रक्षा की जा सके परंतु वे प्राण मनुष्य के थे क्या परिवार को पालने वाली माता कहलाने वाली गाय एवं गोवंश के प्राण की रक्षा के कोई मायने नहीं है .

 लम्पि बीमारी गौ वंश को समाप्त कर रही है। परंतु उसे बचाने के प्रयास सार्थक नज़र नहींआ रहे है। सार्थकता वहां होती है जहां भावना का वास हो। 



सरकार की और से किये गए जतन नाकाम हो रहे है। गाय और गौ वंश तड़प तड़प कर जान दे रहे हैं परंतु उत्तराखंड सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंग रही है पशुपालन विभाग पशुपालन मंत्री जनप्रतिनिधि समाजसेवी संस्थाएं संत महात्मा उत्तराखंड की भूमि पर इस मामले को लेकर सोए पड़े है।

 जिन्दे रहते हुए बीमारी से जूझते हुए गाय की दुर्गति हुई और मरने के बाद  भी  उनके दाह संस्कार के लिये 1200 रु पशुपालकों को देने पड़ रहे है।

दूधली में मधु की गाय ने दम तोड़ा तो पीछे पीछे बछिया भी लम्पि रोग से चल बसी। पशुपालकों का दर्द किसी तक नही पंहुच रहा है। सभी राजनीतिक दल अपने ही क्रिया कलापों में लगे है।

 साधन विहीन पशुपालन स्वास्थ्य विभाग के प्रयास  नाकाफी  नज़र आ रहे है।   व्यवस्थाएं चरमरा गई है। 


 

सरकार को चाहिए गौ वंश बचाने को लम्पि बीमारी को महामारी घोषित करे। कोरोना की भांति स्वास्थ्य विभाग से प्रतिदिन के आंकड़े एकत्रित कर मीडिया के समक्ष रखें, वैक्सीनशन के पहले और बाद  की स्थितियां स्पष्ट करे और इसके फायदे अथवा हानि बताएं अगर है तो।

कितनी गाय अथवा गौवंश अब तक मृत्यु को प्राप्त हुए , उनके दाहसंस्कार का इंतज़ाम कराए। अन्यथा भाजपा सरकार गौ गंगा गायत्री के नारे लगाना छोड़ दे।



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