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  आज दिनांक 30 मई 2021  को  पश्चिमी बंगाल  में हाल ही में संपन्न हुए चुनावों के बाद हुई व्यापक हिंसा भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक काला अध्याय बन गई है। देश में ऐसा पहली बार हुआ है ,कि अपने मताधिकार का प्रयोग करने के लिए इस बड़े पैमाने पर लोगों को निशाना बनाया गया है।

 पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड के बुद्धिजीवियों ने लोकतंत्र पर हुए इस सुनियोजित हमले पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। प्रज्ञा प्रवाह पश्चिमी क्षेत्र (उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड) के तत्वावधान में हुई प्रेस कान्फ्रेंस में राज्य में हुई हिंसा को लेकर जो तथ्य और आंकड़े प्रस्तुत किए गए वह चौंकाने वाले हैं। 



सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस द्वारा विपक्षी भारतीय जनता पार्टी के पदाधिकारियों व समर्थकों पर की गई हिंसा में कुल 1320 एफआईआर दर्ज हुई हैं। इसके अलावा भय से पलायन कर असम के धुबरी जिले में पहुंचे शरणार्थियों द्वारा भी 28 एफआईआर दर्ज कराई गई हैं। 

दर्ज हुई प्रथमिकियों में हत्या , महिला उत्पीड़न के 29 मामले हैं। इसके अलावा  चुनाव के बाद भी मारपीट, लूटपाट, तोड़फोड़, आगजनी और धमकी आदि के मामलों में प्रथमिकी दर्ज हुई हैं। जमीनी सूत्रों के अनुसार सत्ताधारी दल के दबाव में अधिकांश मामलों में प्राथमिकी दर्ज ही नहीं हुई हैं। लगभग 4400 दुकान और मकान हमलों में क्षतिग्रस्त हुए हैं और 200 मकान पूरी तरह से जमींदोज़ किये गये हैं। पूर्व बर्धमान के औसग्राम में तो एक पूरी बस्ती को ही फूंक दिया गया। अपने घरों को छोड़ 6788 लोग असम के 191 शिविरों में शरण लिये हुए हैं।


राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग के अध्यक्ष विजय साँपला ने भी प्रशासनिक उदासीनता और भेदभाव की पुष्टि की है। आठ दिन तक निर्बाध चली हिंसा में दलित व जनजाति वर्ग बुरी तरह प्रभावित हुआ है।


राजनीतिक प्रतिशोध से शुरू हुई हिंसा जल्द ही मजहबी उन्माद में बदल गयी। जिस नंदीग्राम से स्वयं ममता बनर्जी ने चुनाव लड़ा और हार गईं वहां तृणमूल के हिंदू समर्थकों पर भी हमले हुए। हिंदुओं को खदेड़ने के उद्देश्य से उनके खलिहानों में आग लगाने व तालाबों में जहर डालने की घटनाएं भी प्रकाश में आई हैं।  पद्मभूषण पत्रकार लेखक, राजनैतिक विश्लेषक भाजपा के पूर्व  राज्य सभा सांसद स्वप्न दासगुप्ता  के अनुसार कई इलाकों में भाजपा पदाधिकारियों पर जजि़या की तर्ज पर अर्थदंड भी लगाए गये हैं।

 चुनाव के बाद भी 2 और 3 मई को हुई हिंसा पर विस्तृत चर्चा की साथ ही साथ रोहिणी कि पश्चिम बंगाल में घुसपैठ और उनके राजनीतिक प्रभाव एवं आंकड़ों के साथ बड़ी संख्या में जनता पर हो रहे अत्याचारों पर प्रकाश डाला । प्रज्ञा प्रवाह ने राज्य की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी के भड़काऊ बयानों और संविधानेतर आचरण की भी आलोचना की। सनद रहे कि दुर्गा पूजा पर रोक जैसी तुष्टीकरण की नीतियों के द्वारा ममता मजहबी उन्माद को बढ़ावा देती रही हैं। चुनाव के दौरान भी ममता और उनके मंत्री केंद्रीय बलों के लौट जाने के बाद विरोधियों को देख लेने की धमकी देते रहे हैं। 

हिंदू समुदाय पर आये अस्तित्व के खतरे और तेजी से बदलते जनसंख्या अनुपात की दृष्टि से अति संवेदनशील पश्चिम बंगाल में विषय की गंभीरता को देखते हुए प्रज्ञा प्रवाह ने आशा व्यक्त की है कि सुप्रीम कोर्ट पूरे प्रकरण का स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई करेगा। इसके अलावा उन्होंने सुझाव भी दिया कि केंद्रीय सेना बीएसएफ, आईटीबीपी इत्यादि बॉर्डर पर  होने वाले गैरकानूनी प्रवाह पर  रोक लगा सकती है।  इसके लिए  उन्हें मानसिक रूप  मजबूत करनेकी आवशयकता है। 

इसके अलावा उन्होंने सुझाव भी दिया कि केंद्रीय सेना बीएसएफ, आईटीबीपी इत्यादि बॉर्डर पर  होने वाले गैरकानूनी प्रवाह पर  रोक लगा सकती है।  इसके लिए  उन्हें मानसिक रूप  मजबूत करनेकी आवशयकता है। 

 इस अवसर  पर प्रज्ञा प्रवाह के क्षेत्रीय संयोजक  श्री भगवती प्रसाद राघव डॉ चैतन्य भंडारी  अध्यक्ष  देवभूमि विचार मंच, डॉक्टर देवेंद्र भसीन, भाजपा उपाध्यक्ष उत्तराखंड  तथा मीडिया प्रभारी , उत्तराखंड  डॉ वीके सारस्वत  ,श्री अवनीश त्यागी डॉक्टर अंजली वर्मा अनुराग  विजय ,प्रवीण तिवारी नमन गर्ग डॉ  पृथ्वी काला प्रमुख विचारक विकास सारस्वत दिव्य कुमार,डॉ रवि शरण दीक्षित सहित बड़ी संख्या में प्रिंट तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडियम से पत्रकार बंधु उपस्थित रहे ।

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