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13 अप्रैल,2021 से चैत्र नवरात्रि  के साथ साथ नव संवत  2078 एवं हिन्दू नव वर्ष का आगमन हो रहा है . मंगलवार से शुरू होनेवाले नवरात्रि त्यौहार नौ दिन तक माता की उपासना का पर्व है जो नवें दिन श्री रामचन्द्र जी के प्राकट्य दिवस पर जाकर सम्पूर्ण होता है .नौ दिन तक माता की उपासना का पर्व है जो नवें दिन श्री रामचन्द्र जी के प्राकट्य दिवस पर जाकर सम्पूर्ण होता है .

भारतीय नववर्ष, नव संवत्सर 2078 चैत्र शुक्ल प्रतिपदा,जो चैत्र नवरात्र का प्रथम दिन है, के स्वागत में क्या हम अपनी-अपनी गली-बस्ती में लोगों से, बातचीत कर, अपने-अपने घरों की साफ-सफाई कर घर के बाहर रंगोली बनाने का आग्रह कर सकते हैं.घर को आम के पत्तों की व अन्य तरह की वंदनवार लगा कर सजा सकते हैं.

 इस मांगलिक अवसर पर अपने-अपने घरों के ऊपर भगवा पताका फहरा सकते हैं! रात्रि में सभी अपने-अपने घरों के बाहर 5-6 दीपक जला सकते हैं. एक-दूसरे को नव वर्ष की शुभकामनाएं दे सकते हैं.  अपने सगे-संबंधियों मित्रों एवं परिचितों को भारतीय नववर्ष के बधाई संदेश प्रेषित कर सकते हैं.ग्रीष्मकालीन  नवरात्रि के प्रथम दिन ही हमारा नववर्ष प्रारंभ होता है।

.चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का ऐतिहासिक महत्व-

1. इसी दिन से ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की।

2. प्रभु श्री राम के राज्याभिषेक का दिन यही है।

3.महाराजा युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ।

4. सम्राट विक्रमादित्य का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ। इन्हीं के नाम पर इस दिन से ही विक्रमी संवत् का प्रारंभ हुआ।

5. शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात् नवरात्र का पहला दिन यही है।

6. सिख परंपरा के द्वितीय गुरू श्री अंगद देव जी का जन्म दिवस।

7. स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने इसी दिन को आर्य समाज की स्थापना दिवस के रूप में चुना।

8. सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार संत झूलेलाल इसी दिन प्रगट हुए।

9. विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना।

10. न्याय शास्त्र के रचयिता महर्षि गौतम का जन्मदिन।

11. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक परम पूज्यनीय डॉ केशव बलिराम हेडगेवार जी का जन्मदिन।

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भारतीय नववर्ष का प्राकृतिक महत्व-

1. वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है।

2. फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है।

3. नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिये यह शुभ मुहूर्त होता है।

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मंगलवार से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत हो रही है। नवरात्रि के पावन मौके पर हर बार मां अलग- अलग वाहनों से आती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि के पावन दिनों में मां धरती पर ही निवास करती हैं।

    ब्रह्म मुहूर्त- सुबह 04 बजकर 35 मिनट से सुबह 05 बजकर 23 मिनट
  अमृतसिद्धि योग - 13 अप्रैल की सुबह 06 बजकर 11 मिनट से दोपहर 02 बजकर 19 मिनट
  सर्वार्थसिद्धि योग - 13 अप्रैल की सुबह 06 बजकर 11 मिनट से 13 अप्रैल की दोपहर 02 बजकर 19 मिनट         अभिजीत मुहूर्त - दोपहर 12 बजकर 02 मिनट से  दोपहर 12 बजकर 52 मिनट
  अमृत काल - सुबह 06 बजकर 15 मिनट से 08 बजकर 03 मिनट 

वन्दे वंछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम् | वृषारूढाम् शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम् || 

शैलपुत्री देवीदुर्गाके नौ रूप में पहले स्वरूप में जानी जाती हैं। ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम 'शैलपुत्री' पड़। नवरात्र-पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को 'मूलाधार' चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योग साधना का प्रारंभ होता है। 

'शैलपुत्री' देवी का विवाह भी शंकरजी से ही हुआ। पूर्वजन्म की भाँति इस जन्म में भी वे शिवजी की ही अर्द्धांगिनी बनीं। नवदुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियाँ अनंत हैं।

 

एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। इसमें उन्होंने सारे देवताओं को अपना-अपना यज्ञ-भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया, किन्तु शंकरजी को उन्होंने इस यज्ञ में निमंत्रित नहीं किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहाँ जाने के लिए उनका मन विकल हो उठा।

अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकरजी को बताई। सारी बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा- प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं। अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है। उनके यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, किन्तु हमें जान-बूझकर नहीं बुलाया है। कोई सूचना तक नहीं भेजी है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहाँ जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा।'

शंकरजी के इस उपदेश से सती का प्रबोध नहीं हुआ। पिता का यज्ञ देखने, वहाँ जाकर माता और बहनों से मिलने की उनकी व्यग्रता किसी प्रकार भी कम न हो सकी। उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकरजी ने उन्हें वहाँ जाने की अनुमति दे दी।

सती ने पिता के घर पहुँचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा है। सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं। केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव भरे हुए थे।

परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को बहुत क्लेश पहुँचा। उन्होंने यह भी देखा कि वहाँ चतुर्दिक भगवान शंकरजी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है। दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे। यह सब देखकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा। उन्होंने सोचा भगवान शंकरजी की बात न मान, यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है।

वे अपने पति भगवान शंकर के इस अपमान को सह न सकीं। उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया। वज्रपात के समान इस दारुण-दुःखद घटना को सुनकर शंकरजी ने क्रुद्ध होअपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया।

सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वे 'शैलपुत्री' नाम से विख्यात हुर्ईं। पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के नाम हैं। उपनिषद् की एक कथा के अनुसार इन्हीं ने हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व-भंजन किया था।

 
 

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