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ब्रह्मांड में अरबों आकाशगंगाओं के बीच बड़ी संख्या में छोटी आकाशगंगाएं हैं, जो हमारी मिल्की-वे आकाशगंगा की तुलना में 100 गुना तक छोटी हैं। जहां इनमें से नन्ही आकाशगंगाएं जो बौनी आकाशगंगा कहलाती हैं, वे विशाल आकार वाली आकाशगंगाओं के मुकाबले बहुत धीमी गति से तारों का निर्माण करती हैं, वहीं कुछ बौनी आकाशगंगाएं हमारी मिल्की-वे आकाशगंगा से 10-100 गुना व्यापक-सामान्य दर पर नए तारे बनाते हुए देखी जाती हैं। हालांकि ये गतिविधियां कुछ करोड़ों वर्षों से अधिक समय तक नहीं चलती हैं, ये एक ऐसी अवधि है जो इन आकाशगंगाओं की आयु की तुलना में बहुत कम है जो आम तौर पर कुछ अरब वर्ष होती है।
दो भारतीय दूरबीनों का उपयोग करके ऐसी दर्जनों आकाशगंगाओं का अवलोकन करने वाले वैज्ञानिकों ने पाया है कि इनके इस विचित्र व्यवहार का सुराग इन आकाशगंगाओं में अनियमित हाइड्रोजन वितरण में निहित है और हाल ही में दो आकाशगंगाओं के बीच टकराव में भी।
बौनी आकाशगंगाओं में तारों के गठन की प्रकृति को समझने के लिए भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के एक स्वायत्त संस्थान आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एरीज़) के खगोलविदों डॉ. अमितेश उमर और उनके पूर्व छात्र डॉ. सुमित जायसवाल ने नैनीताल के पास 1.3-मीटर के देवस्थल फास्ट ऑप्टिकल टेलीस्कोप (डीएफओटी) और जायंट मीटर वेव रेडियो टेलीस्कोप (जीएमआरटी) का उपयोग करके ऐसी कई आकाशगंगाओं का अवलोकन किया। इनमें से पहले ने जहां उस ऑप्टिकल वेवलेंथ पर संचालन किया जो आयनित हाइड्रोजन से निकलने वाली ऑप्टिकल लाइन विकिरण का पता लगाने में संवेदनशील हो, वहीं दूसरे टेलीस्कोप की 45-मीटर व्यास की 30 डिश में से प्रत्येक ने मिलकर काम किया और आकाशगंगाओं में तटस्थ हाइड्रोजन से 1420.40 मेगाहर्ट्ज पर आने वाले वर्णक्रमीय रेखा विकिरण के माध्यम से तीव्र इंटरफेरोमेट्रिक छवियों का उत्पादन किया।
ऊंची दर पर तारों के निर्माण के लिए आकाशगंगाओं में हाइड्रोजन के बहुत ऊंचे घनत्व की ज़रूरत होती है। एरीज़ टीम द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार, कई तारों के निर्माण वाली गहन बौनी आकाशगंगाओं की 1420.40 मेगाहर्ट्ज छवियों ने संकेत दिया कि इन आकाशगंगाओं में हाइड्रोजन बहुत विक्षुब्ध या बाधित है। जहां हमें आकाशगंगाओं की अच्छी तरह से परिभाषित कक्षाओं में हाइड्रोजन के लगभग सममित वितरण की उम्मीद होती है, वहीं इन बौनी आकाशगंगाओं में हाइड्रोजन अनियमित पाया जाता है और कभी-कभी अच्छी तरह से परिभाषित कक्षाओं में नहीं चल रहा होता है। इन आकाशगंगाओं के आस-पास कुछ हाइड्रोजन को अलग-थलग बादलों, पंखों और पूंछों के रूप में भी पाया जाता है, जैसे कि हाल ही में कोई अन्य आकाशगंगा इन आकाशगंगाओं से टकराईं हो या छूकर चली गई हो, और गैस आकाशगंगाओं के चारों ओर मलबे के रूप में बिखर जाती है। मध्य क्षेत्र में कभी-कभी ऑप्टिकल आकारिकी ने कई नाभिक और आयनित हाइड्रोजन की उच्च सांद्रता को उजागर किया है। हालांकि आकाशगंगा से आकाशगंगा की टक्कर का प्रत्यक्ष रूप से पता नहीं चला था लेकिन रेडियो और ऑप्टिकल इमेजिंग के माध्यम से इसके विभिन्न हस्ताक्षर सामने आए थे और ये ही एक कहानी बनाने में मदद कर रहे हैं। इसलिए ये शोध बताता है कि दो आकाशगंगाओं के बीच हालिया टकराव से इन आकाशगंगाओं में तीव्र तारा निर्माण शुरू हो जाता है।
13 आकाशगंगाओं की विस्तृत तस्वीरों के साथ इस शोध के निष्कर्ष मंथली नोटिसेज़ ऑफ रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी (एमएनआरएएस) पत्रिका के आगामी अंक में नजर आएंगे जिसे रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी, यूके द्वारा प्रकाशित किए जाता है। ये निष्कर्ष ब्रह्मांड की कम विशालकाय आकाशगंगाओं के विकास और सितारों के निर्माण को समझने में खगोलविदों की मदद करेंगे।


[प्रकाशन लिंक: http://arxiv.org/abs/2008.04528
अधिक जानकारी के लिए डॉ. अमितेश उमर से इस ईमेल पर संपर्क किया जा सकता है: aomar@aries.res.in ]


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