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 मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने भगवान केदारनाथ जी के कपाट खोले जाने पर  सभी श्रद्धालुओं को  बधाई देते हुए कहा कि बाबा केदार हम सभी पर अपनी कृपा बनाकर रखें। बाबा केदार के आशीर्वाद से हम कोरोना की इस वैश्विक महामारी को हराने में अवश्य कामयाब होंगे। कोरोना के कारण इस बार आम जन दर्शन के लिये नहीँ आ सके। हम सभी के मन में बाबा केदार के लिए अपार श्रद्धा है। बाबा केदार, अपने भक्तों पर स्नेह बनाये रखें, यही कामना है।

 आज प्रात: 6 बजकर 10 मिनट पर मेष लग्न में विधि-विधान से खुले कपाट
ग्यारहवें ज्योर्तिलिंग श्री केदारनाथ भगवान के कपाट इस यात्रा वर्ष में  मेष लग्न, पुनर्वसु नक्षत्र में आज प्रातः  6 बजकर 10 मिनट पर विधि-विधान पूर्वक खुल गये हैं। प्रात: तीन बजे से ही कपाट खुलने की प्रक्रिया शुरू हो गयी थी। पुजारी शिवशंकर लिंग एवं  वेदपाठी मंदिर के दक्षिण द्वार पूजन के बाद मुख्य मंदिर परिसर में  प्रविष्ठ हुए। मुख्य द्वार पर कपाट खोलने की प्रक्रिया पूरी हुई।  भैरवनाथ जी का आवाह्न किया गया। ठीक  प्रात:6 बजकर 10 मिनट पर भगवान केदारनाथ जी के कपाट खोल दिये गये। कपाट खुलने के अवसर पर उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम बोर्ड के अधिकारी बी.डी.सिंह, तहसीलदार जयबीर राम बधाणी एवं पुलिस चौकी प्रभारी मंजुल रावत  मुख्य द्वार पर मौजूद थे। पुजारी शिवशंकर लिंग ने रूद्राभिषेक एवं जलाभिषेक पूजा संपन्न की भगवान केदारनाथ जी का जलाभिषेक किया गया। इस दौरान शोसियल डिस्टेंसिंग का पालन किया गया।
 कपाट खुलने के पश्चात सर्व प्रथम देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की ओर से रूद्राभिषेक पूजा संपन्न
की गयी। प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत सहित पर्यटन-धर्मस्व मंत्री सतपाल जी महाराज ने श्री केदारनाथ धाम के कपाट खुलने पर शुभकामनाएं दी है आशा प्रकट की है कि जल्द देश एवं विश्व से कोरोना का संकट समाप्त हो जायेगा तथा चार धाम यात्रा को गति मिलेगी।
 उल्लेखनीय है कि कोरोना से बचाव के मद्देनजर यात्राओं की अनुमति नहीं है अभी केवल कपाट खोले जा रहे है। ताकि धामों में पूजा अर्चना शुरू सके। विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल ने कपाट खुलने पर बधाई संदेश भेजा है। चारधाम विकास परिषद के उपाध्यक्ष आचार्य शिव प्रसाद ‌ममगाई‌ ने केदारनाथ धाम के कपाट खुलने पर बधाई दी है।
पर्यटन-धर्मस्व सचिव दिलीप जावलकर ने यात्रा संबंधी ब्यवस्थाओं हेतु ब्यापक दिशा निर्देश जारी किये हैं।ताकि कोरोना महामारी की समाप्ति के पश्चात उच्च स्तरीय दिशानिर्देशों के तहत प्रदेश में चारधाम यात्रा को पटरी पर लाया जा सके।
उल्लेखनीय है कि वुड स्टोन कंपनी  ने केदारनाथ में बर्फ के ग्लेशियरों को काट कर मंदिर तक पहुंचने हेतु  विषम परिस्थितियों में कार्यकर रास्ता बनाया।  आयुक्त गढ़वाल /  उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम बोर्ड के सीईओ रमन रविनाथ ने बताया कि  मार्च महीने से ही प्रशासन ने बुड स्टोन कंपनी को केदारनाथ पहुंच़ने हेतु मार्ग बनाने को कहा गया था।कंपनी ने कपाट खुलने से पहले मार्ग तैयार कर दिया,जबकि अभी भी केदारनाथ में 4 से 6 फीटतक बर्फ देखी जा सकती है।
 इन्हीं ग्लेशियरों को काटकर बनाये रास्तों से होकर  भगवान केदारनाथ की पंच मुखी डोली पैदल मार्ग से गौरीकुंड से  श्री केदारनाथ धाम पहुंची।
देवस्थानम  बोर्ड के मीडिया प्रभारी डा. हरीश गौड़ ने जानकारी दी कि कपाट खुलने के उपलक्ष्य में ऋषिकेश के दानीदाता सतीश कालड़ा द्वारा श्री केदारनाथ मंदिर को 10 क्विंटल गैंदा, गुलाब एवं अन्य फूलों से सजाया गया था।  रात्रि को मंदिर  बिजली की रोशनी से जगमगा रहा था।
श्री केदारनाथ धाम के कपाट खुलने के दौरान पिछले वर्षों की भांति सेना का बेंड शामिल नहीं हुआ। तथा बेहद सादगी पूर्वक मंदिर के कपाट खुले।
 
केदारनाथ धाम  विषयक---

केदारनाथ मन्दिर भारत के उत्तराखण्ड राज्य के रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है। उत्तराखण्ड में हिमालय पर्वत की गोद में केदारनाथ मन्दिर बारह ज्योतिर्लिंग में सम्मिलित होने के साथ चार धामऔर पंच केदार में से भी एक है। यहाँ की प्रतिकूल जलवायु के कारण यह मन्दिर अप्रैल से नवंबर माह के मध्‍य ही दर्शन के लिए खुलता है। पत्‍थरों से बने कत्यूरी शैली से बने इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण पाण्डव वंश के जनमेजय ने कराया था। यहाँ स्थित स्वयम्भू शिवलिंग अति प्राचीन है। आदि शंकराचार्य ने इस मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया।

केदारनाथ की बड़ी महिमा है।इस मन्दिर की आयु के बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है, पर एक हजार वर्षों से केदारनाथ एक महत्वपूर्ण तीर्थयात्रा रहा है। राहुल सांकृत्यायन के अनुसार ये 12-13 वीं शताब्दी का है। ग्वालियर से मिली एक राजा भोज स्तुति के अनुसार उनका बनवाय हुआ है जो 1076-99काल के थे। एक मान्यतानुसार वर्तमान मंदिर 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा बनवाया गया जो पांडवों द्वारा द्वापर काल में बनाये गये पहले के मंदिर की बगल में है। ।
1882 के इतिहास के अनुसार साफ अग्रभाग के साथ मंदिर एक भव्य भवन था जिसके दोनों ओर पूजन मुद्रा में मूर्तियाँ हैं। “पीछे भूरे पत्थर से निर्मित एक टॉवर है इसके गर्भगृह की अटारी पर सोने का मुलम्मा चढ़ा है। मंदिर के सामने तीर्थयात्रियों के आवास के लिए पण्डों के पक्के मकान है। जबकि पूजारी या पुरोहित भवन के दक्षिणी ओर रहते हैं। श्री ट्रेल के अनुसार वर्तमान ढांचा हाल ही निर्मित है जबकि मूल भवन गिरकर नष्ट हो गये।


यह मन्दिर एक छह फीट ऊँचे चौकोर चबूतरे पर बना हुआ है। मन्दिर में मुख्य भाग मण्डप और गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है। बाहर प्रांगण में नन्दी बैल वाहन के रूप में विराजमान हैं। मन्दिर का निर्माण किसने कराया, इसका कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं मिलता है,  ऐसा कहा जाता है कि इसकी स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य ने की थी।

मन्दिर की पूजा श्री केदारनाथ द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक माना जाता है। प्रात:काल में शिव-पिण्ड को प्राकृतिक रूप से स्नान कराकर उस पर घी-लेपन किया जाता है। तत्पश्चात धूप-दीप जलाकर आरती उतारी जाती है। इस समय यात्री-गण मंदिर में प्रवेश कर पूजन कर सकते हैं, लेकिन संध्या के समय भगवान का श्रृंगार किया जाता है। उन्हें विविध प्रकार के चित्ताकर्षक ढंग से सजाया जाता है। भक्तगण दूर से केवल इसका दर्शन ही कर सकते हैं। केदारनाथ के पुजारी मैसूर के जंगम ब्राह्मण ही होते हैं।

कथा

    इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना का इतिहास संक्षेप में यह है कि हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित हैं।
    पंचकेदार की कथा ऐसी मानी जाती है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव भ्रातृहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन वे उन लोगों से रुष्ट थे। भगवान शंकर के दर्शन के लिए पांडव काशी गए, पर वे उन्हें वहां नहीं मिले।

वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे। भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहां से अंतध्र्यान हो कर केदार में जा बसे। दूसरी ओर, पांडव भी लगन के पक्के थे, वे उनका पीछा करते-करते केदार पहुंच ही गए। भगवान शंकर ने तब तक बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले। पांडवों को संदेह हो गया था। अत: भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाडों पर पैर फैला दिया। अन्य सब गाय-बैल तो निकल गए, पर शंकर जी रूपी बैल पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम बलपूर्वक इस बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंतध्र्यान होने लगा। तब भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का भाग पकड़ लिया। भगवान शंकर पांडवों की भक्ति, दृढ संकल्प देख कर प्रसन्न हो गए।

 उन्होंने तत्काल दर्शन देकर पांडवों को पाप मुक्त कर दिया। उसी समय से भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनके धड़ से ऊपर का भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ। अब वहां पशुपतिनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है। शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मद्महेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए। इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदार कहा जाता है। यहां शिवजी के भव्य मंदिर बने हुए हैं।

केदारनाथ मंदिर की उद्घाटन तिथि अक्षय तृतीया के शुभ दिन और महा शिवरात्रि पर हर साल घोषित की जाती है। और केदारनाथ मंदिर की समापन तिथि हर वर्ष नवंबर के आसपास दिवाली त्योहार के बाद भाई दूज के दिन होती है। इसके बाद मंदिर के द्वार शीत काल के लिए बंद कर दिए जाते हैं।


भगवान की पूजाओं के क्रम में प्रात:कालिक पूजा, महाभिषेक पूजा, अभिषेक, लघु रुद्राभिषेक, षोडशोपचार पूजन, अष्टोपचार पूजन, सम्पूर्ण आरती, पाण्डव पूजा, गणेश पूजा, श्री भैरव पूजा, पार्वती जी की पूजा, शिव सहस्त्रनाम आदि प्रमुख ह

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