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रुद्रप्रयाग;

भूपेंद्र भण्डारी


मधुमक्खी को किसान का सबसे बड़ा मित्र माना जाता है । फसल चक्र में खेती, फलों व सब्जियों की उत्पादकता के साथ उनकी पोषकता और गुणवत्ता बढाने में मघुमक्खी का बड़ा योगदान रहता है, लेकिन पहाड़ों में पायी जाने वाली पहाड़ी मधुमक्खी एपेक्स इंडिका विलुप्ती की कगार पर है ऐसे में पहाड़ की खेती की उत्पादक क्षमता में भी अब इसके दुषपरिणाम सामने आने लगे हैं। 
इसीलिए पहाड़ी मधुमक्खी एपेक्स इंडिका विलुप्ति होने के कगार पर है।
मिट्टी पत्थरों के पारम्परिक घर कम होने के कारण गायब होने लगी है, एपेक्स इंडिका। 
खेती में कीटनाशक का प्रयोग व रेडिएशन मधुमक्खियों के लिए सिद्ध हो रहा है घातक।
पहाड़ के ठण्डे पर्यावरण व दुर्गभ क्षेत्रों में कठिन जीवन जीने की आदि  थी ।
अब एपेक्स इंडिका के विकल्प के तौर पर पहाड़ में अन्य मधुमक्खियों को पालना असम्भव लग रहा है। 
एपेक्स इंडिका पूरी तरह से विलुप्त होने पर बिगड़ जायेगा पहाड़ का फसल चक्र। 

- मधुमक्खियां मात्र मीठा शहद पैदा करने वाला कीट नहीं है बल्कि हमारे पारिस्थितिक तन्त्र से जुडी अति महत्वपूर्ण कड़ी है, उत्तराखण्ड़ के पहाड़ों पर मधुमक्खियों के महत्व को समझते हुए हर पारम्पारिक मिट्टी पत्थरों से बने घरों में मधुमक्खियों के लिए एक विशेष स्थान बना होता था, ऐसे में सदियों से ही घर-घर में पहाड़ के ठण्डे वातावरण में अपने को आसानी से समावेश कर लेने वाली पहाड़ी मधुमक्खी एपेक्स इंडिका रहती थी, लेकिन अब परिस्थितियाॅ बदल गयी हैं, और लोग मिट्टी पत्थरों के परम्परागत घरों के जगहों लोग सीमेन्ट के पक्के मकान बना रहे हैं और इन मकानों में इन मुधुक्खियों का बसेरा समाप्त कर दिया है। ऐसे में इन्सानी आबादी के नजदीक अब पहाड़ी मघुमक्खीयों के लिए रहने के लिए वातानुकुलित स्थानों की कमी हो गयी है, जिसका सीधा असर घरों के आसपास की खेती व फल, सब्जीयों की उत्पादन पर पड़ा है, पहाड़ों में किसानों का कहना है कि एपेक्स इंडिका की संख्या में आई गिरावट के कारण अब उनकी कृषि उत्पादन क्षमता धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। 
- मालचन्द्र सिंह, मौन पालक का कहना है कि फलों, सब्जियों और बीजों में सूक्ष्म पोषक तत्वों की निर्भरता मधुमक्खी और अन्य कीटों के परागण पर होती है, यदि एक पौधे पर अच्छी तरह से परागण की क्रिया हुई है तो वह फलों और सब्जियों को और भी रसभरा बनाता है, पहाड़ी मधुमक्खी एपेक्स इंडिका की विलुप्ती की कगार पर पहुचने की स्थिति को देखते हुए विज्ञान व प्रोद्योगिकी विभाग देहरादून व उत्तराचंल उत्थान परिषद ने रूद्रप्रयाग के जखोली के बजीरा और इसके आस पास के अन्य कई गांवों में पहाड़ी मधुमक्खी एपेक्स इंडिका की जगह देशी मधुमक्खी मैलीफेरा के 150 बाक्स किसानों को प्रयोगित तौर पर वितरण किए, लेकिन मैलीफेरा मधुमक्खी पहाड़ी वातावरण में फिट नही बैठ पाई और 90 प्रतिशत मैलीफेरा मधुमक्खियों की मौत हो गयी और अब आने वाले दिनों बर्फबारी और भारी शीत लहर के कारण इन मधुमक्खियों को आभी कठिनायों का सामना करना पड़ सकता है। यूं कहें ये पूरी तरह खत्म भी हो सकती हैं।  
महावीर सिंह राणा, मौन पालक विशेषज्ञ काश्तकार का कहना है कि जानकारों का मानना है कि पहाड़ी मधुमक्खी एपेक्स इंडिका 5 किमी हवाई रेंज तक जाती है जबकि देशी मधुमक्खी मैलीफेरा मात्र डेढ किमी की हवाई रेंज तक ही जा सकती है, इसके अलावा देशी मधुमक्खी मैलीफेरा को पहाड़ी मधुमक्खी एपेक्स इंडिका की तरह दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में पहाडी फूलों, रास्तों का ज्ञान नही है, जिसके कारण मैलीफेरा न ही अपने लिए भोजन ढूंढ पा रही हैं और रास्तों का ज्ञान न होने के कारण न ही वापस अपने घरों को लौट पाती हैं ऐसे में पहाडों के फसल चक्र को बनाये रखने के लिए विलुप्त हो रही पहाड़ी मधुमक्खी एपेक्स इंडिका को ही संरक्षण की आवश्यकता है। जरूरत है सककारें इस ओर गम्भीर प्रयास करें। 

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