रुद्रप्रयाग:
भूपेंद्र भंडारी :
अलकनंदा और मन्दाकिनी के किनारे बने घाट जलमग्न, आगे क्या होगा?
मानसून काल शुरु होते ही केदारघाटी में संचालित हैली सेवाएं भी बंद हो गई हैं केदारनाथ यात्रा मार्ग के अनेकों जगहों से संचालित नौ हैली आपरंेटरों में से अब महज दो कंपनियां ही केदारघाटी में हैं इन कंपनियों के हैलीकाॅफटर भी तकनीकी खराबी के चलते उडाने नहीं भर पा रहे हैं। यात्रा काल में मोटा मुनाफा कमाकर मानसून काल से पहले ही हैली आपरेटर केदारघाटी को छोड देते हैं जब्कि यूकार्डा व हैली आपरेर्टस के बीच हुऐ समझोतों के अनुसार पूरे सीजन तक सभी कम्पनियां अपना एक हैली यहां नियमित सेवाओं व आपदा के दौरान बचाव के लिए रखेगें, मगर कंपनिया अपने समझोते से इतर हर वर्ष गायब हो जाती हैं। यात्रा काल के दौरान गुप्तकाशी से सोनप्रयाग तक हैली कंपनियों द्वारा तीर्थयात्रियों के साथ जमकर लूट मचाई जाती है और दोगुने से तीनगुने दामों तक यात्रियों से टिकटिंक के नाम पर पैसा वसूला जाता है।
मगर विषम परिस्थतियों में ये कंपनियां मौसम का बहाना बनाकर गायब हो जाती हैं। वहीं जिलाधिकारी का कहना है हैली संचालन को लेकर जो भी दिशा निर्देश यूकार्डा से प्रशासन को मिलते हैं उन्हीं के अनुसार हैली सेवाएं चलाई जाती हैं और कई बार यात्रियों की शिकायतों पर आपरेर्टस के विरुद्व कार्यवाही भी की जाती है।
कहा कि यूकार्डा व हैली कंपनियों के बीच हुए समझौते की कोई भी जानकारी प्रशासन को नहीं दी जाती है। और यदि इस तरह के समझौते का आदेश प्रशासन को प्राप्त होता है तो उसका कडाई से पालन करवाया जायेगा।
भूपेंद्र भंडारी :
अलकनंदा और मन्दाकिनी के किनारे बने घाट जलमग्न, आगे क्या होगा?
मानसून काल शुरु होते ही केदारघाटी में संचालित हैली सेवाएं भी बंद हो गई हैं केदारनाथ यात्रा मार्ग के अनेकों जगहों से संचालित नौ हैली आपरंेटरों में से अब महज दो कंपनियां ही केदारघाटी में हैं इन कंपनियों के हैलीकाॅफटर भी तकनीकी खराबी के चलते उडाने नहीं भर पा रहे हैं। यात्रा काल में मोटा मुनाफा कमाकर मानसून काल से पहले ही हैली आपरेटर केदारघाटी को छोड देते हैं जब्कि यूकार्डा व हैली आपरेर्टस के बीच हुऐ समझोतों के अनुसार पूरे सीजन तक सभी कम्पनियां अपना एक हैली यहां नियमित सेवाओं व आपदा के दौरान बचाव के लिए रखेगें, मगर कंपनिया अपने समझोते से इतर हर वर्ष गायब हो जाती हैं। यात्रा काल के दौरान गुप्तकाशी से सोनप्रयाग तक हैली कंपनियों द्वारा तीर्थयात्रियों के साथ जमकर लूट मचाई जाती है और दोगुने से तीनगुने दामों तक यात्रियों से टिकटिंक के नाम पर पैसा वसूला जाता है।
मगर विषम परिस्थतियों में ये कंपनियां मौसम का बहाना बनाकर गायब हो जाती हैं। वहीं जिलाधिकारी का कहना है हैली संचालन को लेकर जो भी दिशा निर्देश यूकार्डा से प्रशासन को मिलते हैं उन्हीं के अनुसार हैली सेवाएं चलाई जाती हैं और कई बार यात्रियों की शिकायतों पर आपरेर्टस के विरुद्व कार्यवाही भी की जाती है।
कहा कि यूकार्डा व हैली कंपनियों के बीच हुए समझौते की कोई भी जानकारी प्रशासन को नहीं दी जाती है। और यदि इस तरह के समझौते का आदेश प्रशासन को प्राप्त होता है तो उसका कडाई से पालन करवाया जायेगा।
केदारघाटी और चमोली जनपद के उपरी क्षेत्रों में हो रही बारिश के
चलते अलकनन्दा व मंदाकिनी नदियां उफान पर है । अभी बरसाती सीजन पूरी तरह
से शुरु नहीं हुआ है बावजूद इसके नदियों का जल स्तर हर दिन बढ़ रहा है और
दोनों नदियों के किनारे सट कर बने करोडों रुपये लागत के घाट व पार्क जलमग्न
हो चुके हैं। वहीं स्थानीय जनता ने घाटों के निर्माण पर सवाल उठाने शुरु
कर दिये हैं तो जिलाधिकारी ने भी स्वीकारा है कि घाटों का डिजायनिंग सही तरह
से नहीं बना है जिसके चलते घाट अभी से जलमग्न हो गये हैं।
रुद्रप्रयाग शहर अलकनंदा व मंदाकिनी नदी के तट पर बसा हुआ है और यहां पर
नदी तटों के सौन्दर्यीकरण को लेकर नमामि गंगे योजना के तहत दो शव दाह
ग्रहों के साथ ही पांच घाटों का निमार्ण कार्य करोडों रुपये लागत किया गया
गया है।
पूर्व में घाट निमार्ण के दौरान स्थानीय लोगों ने नदी के तल से
निर्माण कार्य को लेकर सवाल उठाये थे मगर योजना से जुडे इंजीनियरों ने किसी
की नहीं सुनी और निर्माण कार्य जारी रखा। जिसके चलते विकास का करोडों
रुपया अभी से जलमग्न हो चुका है।
अलकनंदा व मंदाकिनी के रोद्र रुप को तो
विश्व की जनता 2013 में देख चुकी है और हर वर्ष यहां पर नदियों का जलस्तर
खतरे के निशानों से उपर रहता है। तेज बहाव होने के कारण नदी किनारे के सारे
निर्माण कार्य ध्वस्त हो जाते हैं।
वहीं जिलाधिकारी, मंगेश घिल्डियाल ने भी स्वीकारा है कि घाट अभी से जलमग्न हो चुके हैं और
उनमें मलबा भरने व पानी के तेज बहाव से नुकशान होगा। कहा कि पूर्व में
निरीक्षण के दौरान कार्यदायी संस्था वेबकोस्ट के इंजीनियरों से इस बात पर
ब्यापक चर्चा हुई थी और उनका जबाब यही था कि एपू्रब्ड डिजायनिंग के अनुसार
ही कार्य होगा और इनकी सफाई नगर पालिका या संस्था द्वारा की जायेगी।
हरिद्वार बनारस की तर्ज पर पर्वतीय क्षेत्रों के लिए नदी तटों पर जिस तरह
की डिजायनिंग तैयार की गयी है वह ब्यवहारिक रुप से पहाडों में फिट नहीं
बैठती है बावजूद इसके विकास का पैसा आज यहां पूरी तरह से जलमग्न हो रखा है।
आने वाले दिनों में फिर से लाखों रुपये इन घाटों के सुधारीकरण व मलबा
हटानें पर खर्च होगा जो कि अनावश्यक रुप से सरकारी धन की बरबादी ही होगा।
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