लखनऊ :
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव सूबे में भाजपा के खिलाफ जीत दर्ज करने को किसी से भी हाथ मिलाने को तैयार हैं। वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोकदल के प्रभाव का लाभ भी लेने के प्रयास में हैं। आज लखनऊ में अखिलेश यादव ने राष्ट्रीय लोकदल के उपाध्यक्ष जयंत चौधरी से मुलाकात की। कैराना लोकसभा के साथ ही नूरपुर विधानसभा उपचुनाव में दोनों मिलकर मैदान में उतरेंगे। इन दोनों जगह पर प्रत्याशी की बाबत अब बसपा मुखिया मायावती से वार्ता के बाद आगे की रणनीति तय होगी।
लखनऊ में आज अखिलेश यादव ने राष्ट्रीय लोकदल के उपाध्यक्ष तथा पूर्व सांसद जयंत चौधरी से मुलाकात की। माना जा रहा है कि अखिलेश यादव ने शामली के कैराना लोकसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के बीच सहयोग को लेकर जयंत चौधरी से वार्ता की है। अगर इनमें सहमति बन जाती है तो कैराना लोकसभा और बिजनौर के नूरपुर विधानसभा उप चुनाव में सपा-आरएलडी साझा उम्मीदवार घोषित कर सकती है।
कैराना लोकसभा की सियासत इतिहास
कैराना लोकसभा सीट 1962 में वजूद में आई। तब से लेकर अब तक 14 बार चुनाव हो चुके हैं। कांग्रेस और भाजपा दो-दो बार चुनाव जीत सकी हैं। ये सीट अलग-अलग राजनीतिक दलों के खाते में जाती रही है। कैराना लोकसभा सीट पर पहली बार हुए चुनाव में निर्दलीय यशपाल सिंह ने जीत दर्ज की थी। 1967 में सोशलिस्ट पार्टी, 1971 में कांग्रेस, 1977 में जनता पार्टी, 1980 में जनता पार्टी (सेक्युलर), 1984 में कांग्रेस, 1989, 1991 में कांग्रेस, 1996 में सपा, 1998 में भाजपा, 1999 और 2004 में राष्ट्रीय लोकदल, 2009 में बसपा और 2014 में भाजपा ने जीत दर्ज कर चुकी है। भाजपा के हुकुम सिंह ने निधन से यह सीट खाली हो गई है।
कैराना का जातीय समीकरण
कैराना लोकसभा क्षेत्र में 17 लाख मतदाता हैं। जिनमें पांच लाख मुस्लिम, चार लाख बैकवर्ड (जाट, गुर्जर, सैनी, कश्यप, प्रजापति और अन्य शामिल) और डेढ़ लाख वोट जाटव दलित है और एक लाख के करीब गैरजाटव दलित मतदाता हैं। कैराना सीट गुर्जर बहुल मानी जाती है। यहां तीन लाख गुर्जर मतदाता हैं, इनमें हिंदू-मुस्लिम दोनों गुर्जर शामिल हैं। इस सीट पर गुर्जर समुदाय के उम्मीदवारों ने ज्यादातर बार जीत दर्ज की हैं।
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